इजरायल में संसदीय चुनाव के लिए मतदान शुरू, नेतन्याहू और आइजनकोट के बीच मुकाबला (तस्वीर क्रेडिट@AliTallat1)

इजरायल में संसदीय चुनाव के लिए मतदान शुरू, नेतन्याहू और आइजनकोट के बीच मुकाबला; युद्ध और सुरक्षा बने बड़े मुद्दे

तेल अवीव,27 अक्टूबर (युआईटीवी)- इजरायल में मंगलवार को संसदीय चुनाव के लिए मतदान शुरू हो गया है। देश के करीब 73 लाख मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे,जिनमें पाँच लाख से अधिक युवा पहली बार वोट डालने जा रहे हैं। इस चुनाव को प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है। उनका मुकाबला पूर्व सेना प्रमुख आइजनकोट से है। दोनों नेताओं का सैन्य पृष्ठभूमि से जुड़ाव रहा है और दोनों ने अपने करीबी परिजनों को संघर्षों में खोया है। ऐसे में चुनाव के दौरान राष्ट्रीय सुरक्षा, युद्ध की स्थिति और सैन्य नीतियों को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है।

इजरायल में यह चुनाव ऐसे समय हो रहा है,जब सात अक्टूबर 2023 को हमास के हमलों के बाद शुरू हुए संघर्षों और क्षेत्रीय युद्धों का असर देश की राजनीति पर बना हुआ है। मतदाताओं के सामने केवल सरकार चुनने का सवाल नहीं है,बल्कि उन्हें यह भी तय करना है कि देश की सुरक्षा, सैन्य व्यवस्था और आंतरिक चुनौतियों से निपटने के लिए किस राजनीतिक नेतृत्व पर भरोसा किया जाए।

प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू इस चुनाव में अपनी राजनीतिक पकड़ बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। उनके सामने पूर्व सेना प्रमुख आइजनकोट चुनौती पेश कर रहे हैं। दोनों नेताओं की निजी जिंदगी भी इजरायल के सैन्य इतिहास से जुड़ी रही है,जिसके कारण सुरक्षा और युद्ध से जुड़े मुद्दे चुनावी चर्चा के केंद्र में हैं।

नेतन्याहू के भाई योनातन 1976 में युगांडा के एंटेबे में बंधकों को छुड़ाने के लिए चलाए गए सैन्य अभियान के दौरान मारे गए थे। वहीं,आइजनकोट ने सात अक्टूबर 2023 को हमास के हमलों के बाद शुरू हुए युद्ध के दौरान अपने बेटे को खो दिया। दोनों नेताओं के परिवारों ने देश के सैन्य संघर्षों की कीमत चुकाई है।

हालाँकि,चुनाव में मतदाताओं का फैसला केवल नेताओं की निजी पृष्ठभूमि के आधार पर नहीं होगा। देश की सुरक्षा व्यवस्था, युद्ध से निपटने की रणनीति,सैन्य सेवा से जुड़े नियम और सरकार की नीतियाँ भी परिणामों को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे में दोनों पक्षों के लिए मतदाताओं का विश्वास हासिल करना महत्वपूर्ण है।

इजरायल की संसद को नेसेट कहा जाता है। इसमें कुल 120 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए किसी पार्टी या गठबंधन को कम से कम 61 सांसदों का समर्थन हासिल करना होता है। देश की राजनीतिक व्यवस्था की एक खास बात यह है कि अपने 76 साल के इतिहास में अब तक किसी भी राजनीतिक पार्टी ने अकेले अपने दम पर संसद में बहुमत हासिल नहीं किया है।

इसका मतलब है कि चुनाव में सबसे अधिक सीटें जीतने वाली पार्टी के लिए भी सरकार बनाने के लिए अन्य दलों का समर्थन जरूरी हो सकता है। इसी वजह से इजरायल में चुनावी नतीजों के बाद गठबंधन की राजनीति बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। छोटी पार्टियों का समर्थन भी सरकार गठन की प्रक्रिया में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।

भारत में इजरायली दूतावास की प्रवक्ता मिशेल सिरोटा ने आईएएनएस से बातचीत में इजरायल की चुनावी व्यवस्था के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि वहाँ मतदाता किसी एक व्यक्ति के बजाय राजनीतिक पार्टी को वोट देते हैं। चुनाव से पहले प्रत्येक पार्टी अपने उम्मीदवारों की सूची तैयार करती है। पूरे देश में उस पार्टी को मिलने वाले वोटों के अनुपात के आधार पर संसद में उसकी सीटें तय होती हैं।

इस व्यवस्था में मतदाता सीधे किसी एक निर्वाचन क्षेत्र के उम्मीदवार को चुनने के बजाय पार्टी की सूची के पक्ष में मतदान करते हैं। इसके बाद पार्टियों को मिले कुल वैध मतों के अनुपात के आधार पर संसद में प्रतिनिधित्व दिया जाता है।

इजरायल की चुनावी व्यवस्था के तहत किसी राजनीतिक दल को संसद में प्रतिनिधित्व पाने के लिए कुल वैध मतों में से कम-से-कम 3.25 प्रतिशत वोट हासिल करना जरूरी है। यदि कोई पार्टी इस निर्धारित सीमा से कम वोट प्राप्त करती है,तो उसे संसद में कोई सीट नहीं मिलती।

इस नियम का चुनावी समीकरणों पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। गठबंधन बनाने की कोशिश कर रहे राजनीतिक दलों के लिए केवल लोकप्रियता हासिल करना पर्याप्त नहीं होता,बल्कि उन्हें यह भी सुनिश्चित करना पड़ता है कि वे न्यूनतम मत प्रतिशत की सीमा पार कर सकें।

इजरायल की बहुदलीय व्यवस्था के कारण अलग-अलग विचारधाराओं और सामाजिक समूहों का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टियां चुनाव में हिस्सा लेती हैं। परिणामस्वरूप,किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत मिलना कठिन होता है और सरकार बनाने के लिए कई दलों के बीच सहमति बनाना जरूरी हो जाता है।

मतदान और मतगणना पूरी होने के बाद सरकार गठन की प्रक्रिया शुरू होगी। इस दौरान इजरायल के राष्ट्रपति की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। राष्ट्रपति राजनीतिक दलों के साथ विचार-विमर्श करने के बाद यह तय करेंगे कि किस नेता या पार्टी को गठबंधन बनाकर सरकार बनाने का पहला अवसर दिया जाए।

निर्धारित प्रक्रिया के तहत सरकार बनाने का अवसर मिलने के बाद संबंधित नेता के पास गठबंधन तैयार करने और संसद में बहुमत का समर्थन जुटाने के लिए 28 दिन का समय होगा। इस अवधि में वह दूसरी पार्टियों से बातचीत कर उन्हें अपने साथ शामिल करने की कोशिश कर सकता है।

यदि पहला प्रयास सफल नहीं होता है,तो दूसरी सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने का अवसर मिल सकता है,लेकिन यदि गठबंधन बनाने की कोशिशें विफल रहती हैं और कोई भी पक्ष बहुमत जुटाने में सफल नहीं होता,तो 90 दिनों के भीतर दोबारा मतदान कराने की स्थिति बन सकती है।

इस प्रक्रिया के कारण चुनाव का अंतिम परिणाम केवल सीटों की संख्या से तय नहीं होता। पार्टियों के बीच बातचीत, साझा नीतियों पर सहमति और गठबंधन की संभावनाएं भी सरकार के गठन में अहम भूमिका निभाती हैं।

चुनाव से पहले सामने आए छह ओपिनियन पोल में से चार में आइजनकोट के गठबंधन को अधिक सीटें मिलने का अनुमान जताया गया है। दूसरी ओर,एक सर्वेक्षण में नेतन्याहू के गठबंधन को बढ़त दिखाई गई,जबकि एक अन्य सर्वेक्षण में उसे बहुमत के करीब या बहुमत हासिल करते हुए दिखाया गया है।

इन सर्वेक्षणों से संकेत मिलता है कि चुनावी मुकाबला कड़ा हो सकता है। हालाँकि, ओपिनियन पोल केवल मतदाताओं की संभावित पसंद का अनुमान देते हैं। वास्तविक परिणाम मतदान के बाद मतगणना और गठबंधन की स्थिति स्पष्ट होने पर ही सामने आएंगे।

इजरायल की राजनीतिक व्यवस्था में गठबंधन का महत्व देखते हुए सीटों का अनुमान भी अपने आप में सरकार गठन की गारंटी नहीं देता। अंतिम तस्वीर इस बात पर निर्भर करेगी कि अलग-अलग दल कितनी सीटें हासिल करते हैं और वे किसके साथ मिलकर सरकार बनाने को तैयार होते हैं।

इस चुनाव में सात अक्टूबर 2023 के बाद शुरू हुए क्षेत्रीय संघर्षों का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। लंबे समय से जारी सुरक्षा चुनौतियों ने मतदाताओं की प्राथमिकताओं को प्रभावित किया है। ऐसे में सरकार की युद्ध नीति,देश की आंतरिक सुरक्षा और भविष्य में संघर्षों से निपटने की रणनीति चुनावी बहस के महत्वपूर्ण विषय हैं।

इसके अलावा हरेदी समुदाय को सैन्य सेवा से मिलने वाली विशेष छूट भी एक बड़ा मुद्दा है। इस समुदाय के सैन्य सेवा संबंधी नियमों और छूट को लेकर इजरायल में लंबे समय से बहस होती रही है। चुनाव के दौरान इस विषय पर राजनीतिक दलों के रुख का असर गठबंधन की संभावनाओं पर भी पड़ सकता है।

मतदाता यह भी देखेंगे कि नई सरकार सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने,सामाजिक मतभेदों को संभालने और देश में स्थिरता बनाए रखने के लिए क्या कदम उठाती है। युद्ध के प्रभाव और आंतरिक राजनीतिक चुनौतियों के बीच नई सरकार के सामने कई महत्वपूर्ण फैसले लेने की जिम्मेदारी होगी।

कुल मिलाकर,इजरायल का यह संसदीय चुनाव केवल नेतन्याहू और आइजनकोट के बीच मुकाबला नहीं है,बल्कि देश की भविष्य की सुरक्षा और राजनीतिक दिशा तय करने की प्रक्रिया भी है। अब सभी की नजरें मतदान के परिणामों और उसके बाद होने वाली गठबंधन वार्ताओं पर टिकी हैं। चुनावी नतीजे यह तय करेंगे कि इजरायल में अगली सरकार किसके नेतृत्व में बनेगी और वह युद्ध, सुरक्षा तथा सैन्य सेवा जैसे संवेदनशील मुद्दों पर किस तरह आगे बढ़ेगी।