वाशिंगटन,27 अक्टूबर (युआईटीवी)- अमेरिका में तीन नवंबर को होने वाले मध्यावधि चुनावों से पहले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनकी रिपब्लिकन पार्टी की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। हालिया जनमत सर्वेक्षणों में ट्रंप के कामकाज को लेकर असंतोष सामने आया है। महँगाई, ईंधन की बढ़ती कीमतों, टैरिफ युद्ध और ईरान के साथ संघर्ष का असर अमेरिकी मतदाताओं की सोच पर पड़ता दिखाई दे रहा है। चुनाव से पहले सामने आए आँकड़े संकेत दे रहे हैं कि प्रतिनिधि सभा में डेमोक्रेटिक पार्टी बहुमत हासिल कर सकती है। हालाँकि,सीनेट की तस्वीर अभी स्पष्ट नहीं है और वहाँ दोनों दलों के बीच कड़ा मुकाबला होने की संभावना बनी हुई है।
इन चुनावों का महत्व केवल सीटों की संख्या तक सीमित नहीं है। परिणाम यह तय करने में अहम भूमिका निभाएँगे कि ट्रंप अपने दूसरे कार्यकाल के बाकी दो वर्षों में कितनी आसानी से अपनी नीतियों को आगे बढ़ा पाएँगे। यदि डेमोक्रेट्स प्रतिनिधि सभा या सीनेट में से किसी एक सदन पर भी नियंत्रण हासिल कर लेते हैं,तो वे राष्ट्रपति के विधायी एजेंडे को चुनौती दे सकते हैं। वहीं,रिपब्लिकन पार्टी के लिए दोनों सदनों में अपना प्रभाव बनाए रखना प्रशासन की योजनाओं को आगे बढ़ाने के लिहाज से महत्वपूर्ण होगा।
अमेरिका में मध्यावधि चुनाव राष्ट्रपति के चार साल के कार्यकाल के बीच में होते हैं। इस दौरान प्रतिनिधि सभा की सभी 435 सीटों और सीनेट की लगभग एक-तिहाई सीटों के लिए मतदान होता है। इन चुनावों के नतीजे राष्ट्रपति की लोकप्रियता के साथ-साथ उनकी पार्टी की राजनीतिक ताकत का भी संकेत देते हैं। ट्रंप ने खुद इन चुनावों को अपने प्रशासन के शुरुआती 20 महीनों के कामकाज पर जनमत संग्रह बताया है। उन्होंने अपने समर्थकों से अपील की है कि वे मतदान इस तरह करें,जैसे राष्ट्रपति पद के लिए खुद उनका नाम चुनाव मैदान में हो।
जनमत सर्वेक्षणों के अनुसार,ट्रंप के कामकाज को लेकर मतदाताओं के बीच असंतोष बढ़ा है। विभिन्न सर्वेक्षणों के आँकड़ों को एकत्र करने वाले रियल क्लियर पॉलिटिक्स के मुताबिक,संभावित मतदाताओं में लगभग 38.2 प्रतिशत लोग ट्रंप के कामकाज से संतुष्ट हैं, जबकि 60.2 प्रतिशत ने असंतोष जताया है। ये आँकड़े ऐसे समय सामने आए हैं,जब रिपब्लिकन उम्मीदवारों को चुनाव प्रचार के दौरान राष्ट्रपति की नीतियों का बचाव करना पड़ रहा है।
आर्थिक स्थिति को लेकर मतदाताओं की नाराजगी भी रिपब्लिकन पार्टी के लिए चुनौती बनती दिख रही है। सर्वेक्षण के अनुसार,लगभग 57 प्रतिशत लोगों का मानना है कि ट्रंप की नीतियों के कारण उनकी आर्थिक स्थिति पहले से खराब हुई है। यह आँकड़ा बताता है कि घरेलू खर्च और रोजमर्रा की जरूरतों की कीमतें चुनावी चर्चा के प्रमुख मुद्दे बन गए हैं।
ट्रंप ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने, घरेलू उद्योगों को बढ़ावा देने और आम नागरिकों के खर्च को कम करने पर जोर दिया था,लेकिन ईंधन की कीमतों और कई जरूरी वस्तुओं के महँगे होने से इन वादों पर सवाल उठ रहे हैं। मतदाता केवल आर्थिक विकास के दावों को नहीं,बल्कि अपनी जेब पर पड़ने वाले वास्तविक असर को भी ध्यान में रख रहे हैं।
हालाँकि,जनमत सर्वेक्षणों को चुनाव के अंतिम नतीजे नहीं माना जा सकता। मतदान में भाग लेने वाले लोगों की संख्या, अलग-अलग राज्यों में उम्मीदवारों की लोकप्रियता और अनिश्चित मतदाताओं का अंतिम फैसला परिणामों को प्रभावित कर सकता है। इसके बावजूद, लगातार सामने आ रहे असंतोष के आँकड़े रिपब्लिकन पार्टी के लिए चिंता का विषय बने हुए हैं।
अमेरिकी मतदाताओं की नाराजगी के पीछे आर्थिक दबाव एक प्रमुख कारण बताया जा रहा है। उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार,महँगाई दर अगस्त के 3.4 प्रतिशत से बढ़कर पिछले महीने 3.7 प्रतिशत तक पहुँच गई। इसके साथ ही पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वृद्धि ने आम लोगों के घरेलू बजट पर दबाव बढ़ाया है।
ईंधन महँगा होने का असर केवल वाहन चलाने वालों तक सीमित नहीं रहता। परिवहन लागत बढ़ने से खाद्य पदार्थों, उपभोक्ता वस्तुओं और अन्य जरूरी सामान की कीमतों पर भी प्रभाव पड़ सकता है। इससे उन परिवारों को अधिक परेशानी होती है,जिनकी आय का बड़ा हिस्सा किराया, भोजन, यात्रा और ऊर्जा जैसी बुनियादी जरूरतों पर खर्च होता है।
ट्रंप ने वर्ष 2024 के राष्ट्रपति चुनाव प्रचार के दौरान पेट्रोल की कीमत दो डॉलर प्रति गैलन तक लाने का वादा किया था,लेकिन उपलब्ध आँकड़ों में पेट्रोल की औसत कीमत 4.28 डॉलर प्रति गैलन और डीजल की कीमत 6.28 डॉलर प्रति गैलन बताई गई है। इस अंतर ने राष्ट्रपति के आर्थिक वादों और मौजूदा परिस्थितियों के बीच तुलना को चुनावी बहस का हिस्सा बना दिया है।
डीजल की कीमतों में वृद्धि का प्रभाव माल ढुलाई, कृषि, निर्माण और अन्य व्यावसायिक गतिविधियों पर भी पड़ सकता है। जब परिवहन महँगा होता है,तो कंपनियों की लागत बढ़ती है और उसका कुछ हिस्सा उपभोक्ताओं तक पहुँच सकता है। ऐसे में ईंधन की कीमतें मतदाताओं के लिए केवल एक आर्थिक आँकड़ा नहीं,बल्कि रोजमर्रा के जीवन से जुड़ा सवाल बन जाती हैं।
इसके अलावा, ट्रंप प्रशासन की टैरिफ नीति को लेकर भी बहस चल रही है। आयातित वस्तुओं पर शुल्क लगाने का उद्देश्य घरेलू उद्योगों को संरक्षण देना और अमेरिकी उत्पादन को बढ़ावा देना बताया गया है। हालाँकि,आयात पर लगने वाले शुल्क का कुछ बोझ कारोबारियों और उपभोक्ताओं पर भी पड़ सकता है। यदि कंपनियों की लागत बढ़ती है,तो वे वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि कर सकती हैं। यही वजह है कि टैरिफ युद्ध का असर चुनावी माहौल में एक महत्वपूर्ण मुद्दे के रूप में उभर रहा है।
अमेरिकी मतदाताओं के असंतोष में ईरान के साथ संघर्ष और उसके आर्थिक प्रभावों की भी भूमिका बताई जा रही है। पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने से ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता पैदा हो सकती है। तेल की आपूर्ति, परिवहन मार्गों और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर चिंताएँ बढ़ने पर पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों पर दबाव पड़ सकता है।
ट्रंप प्रशासन की विदेश नीति को लेकर रिपब्लिकन पार्टी के भीतर भी मतभेद के संकेत सामने आए हैं। कुछ उम्मीदवारों ने राष्ट्रपति की नीतियों से दूरी बनाते हुए स्पष्ट किया है कि वे अपने राज्य और मतदाताओं के हितों के आधार पर फैसले लेंगे। न्यू हैम्पशायर से रिपब्लिकन सीनेट उम्मीदवार जॉन सुनुनु ने अपने चुनावी विज्ञापन में कहा कि यदि राष्ट्रपति की नीतियाँ उनके राज्य के लिए नुकसानदायक होंगी, तो वह उनका विरोध करेंगे। उन्होंने ईरान में युद्ध और कनाडा के साथ व्यापार युद्ध का विरोध करने का भी उल्लेख किया।
इस तरह के बयान बताते हैं कि कुछ रिपब्लिकन उम्मीदवार स्थानीय मतदाताओं के सामने अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान प्रस्तुत करना चाहते हैं। राष्ट्रपति की लोकप्रियता में गिरावट के समय उम्मीदवारों के लिए यह तय करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है कि वे ट्रंप के साथ कितनी निकटता बनाए रखें और किन मुद्दों पर उनसे अलग रुख अपनाएँ।
ट्रंप ने रूस और यूक्रेन से जुड़े मुद्दों पर भी अलग-अलग समय पर अपनी नीतियों और प्रस्तावों को लेकर बयान दिए हैं। प्रस्तुत विवरण के मुताबिक,उन्होंने रूस पर यूक्रेन पर हमले के कारण लगाए गए प्रतिबंधों को हटाने की बात कही है और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ डीजल खरीदने के समझौते का भी जिक्र किया है। वहीं,भारत पर लगाए गए भारी शुल्क को लेकर भी उनकी व्यापार नीति चर्चा में रही है। इन मुद्दों ने विदेश नीति और आर्थिक फैसलों के बीच संबंध को चुनावी बहस में महत्वपूर्ण बना दिया है।
चुनाव पूर्व अनुमानों में प्रतिनिधि सभा पर नियंत्रण को लेकर डेमोक्रेटिक पार्टी की स्थिति मजबूत बताई जा रही है। रियल क्लियर पॉलिटिक्स के आँकड़ों में डेमोक्रेट्स को 435 सदस्यीय सदन में 227 सीटें मिलने का अनुमान दिया गया है। इस आकलन में लगभग 25 सीटों को अनिश्चित श्रेणी में रखा गया है,जहाँ दोनों दलों के उम्मीदवारों के बीच मुकाबला करीबी माना जा रहा है।
कुक पॉलिटिकल रिपोर्ट का अनुमान भी डेमोक्रेट्स के पक्ष में बढ़त का संकेत देता है। इसके अनुसार,डेमोक्रेटिक पार्टी को लगभग 220 सीटें मिल सकती हैं, जबकि 17 सीटों पर मुकाबले को लेकर स्पष्ट तस्वीर नहीं है। रिपोर्ट की संपादक एरिन कोवे ने कहा है कि प्रतिनिधि सभा में अपना नियंत्रण बनाए रखने के लिए रिपब्लिकन पार्टी के पास रास्ता अब काफी सीमित रह गया है।
सीबीएस न्यूज के आकलन में डेमोक्रेट्स को 229 और रिपब्लिकन पार्टी को 206 सीटें मिलने की संभावना जताई गई है। हालाँकि,इस आकलन में यह भी कहा गया है कि रिपब्लिकन पार्टी के पास बहुमत बरकरार रखने का एक संकरा रास्ता अभी मौजूद हो सकता है। अनिश्चित मतदाताओं का रुख और करीबी मुकाबलों के नतीजे इस स्थिति को बदल सकते हैं।
इन अनुमानों में एक महत्वपूर्ण अंतर भी दिखाई देता है। कुछ विश्लेषकों को डेमोक्रेट्स की स्पष्ट बढ़त नजर आ रही है,जबकि अन्य बड़े पैमाने पर एकतरफा जीत की संभावना से इनकार करते हैं। ऐसे में यह कहना जल्दबाजी होगी कि चुनाव का परिणाम पहले से तय है। सीटों का अंतिम बँटवारा उन क्षेत्रों पर निर्भर करेगा, जहां दोनों दलों के उम्मीदवारों के बीच अंतर बहुत कम है।
यदि डेमोक्रेट्स प्रतिनिधि सभा में बहुमत हासिल कर लेते हैं,तो यह अमेरिकी राजनीति के उस सामान्य रुझान के अनुरूप होगा,जिसमें राष्ट्रपति की पार्टी अक्सर मध्यावधि चुनावों में सीटें गंवाती है। लेकिन बहुमत का आकार भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा। मामूली बहुमत और बड़ी बढ़त के राजनीतिक प्रभाव अलग-अलग हो सकते हैं। अधिक सीटों के साथ डेमोक्रेट्स को विधायी एजेंडे, निगरानी और जाँच संबंधी कार्यवाही में अधिक अवसर मिल सकते हैं।
प्रतिनिधि सभा के विपरीत, सीनेट के चुनावों में किसी एक दल की स्पष्ट बढ़त का अनुमान लगाना कठिन बना हुआ है। इस बार सीनेट की 100 सीटों में से 35 सीटों पर चुनाव हो रहे हैं। सीनेटरों का कार्यकाल छह साल का होता है और हर दो वर्ष में लगभग एक-तिहाई सीटों पर मतदान कराया जाता है।
सीबीएस न्यूज के आकलन में उन सीटों को भी शामिल किया गया है,जिन पर इस बार चुनाव नहीं हो रहे हैं। इसके मुताबिक,डेमोक्रेट्स के पास 46 और रिपब्लिकन पार्टी के पास 44 सीटें हैं,जबकि बाकी सीटों का अंतिम राजनीतिक संतुलन चुनावी मुकाबलों और स्वतंत्र सदस्यों की स्थिति पर निर्भर करेगा। सीनेट में बहुमत के लिए 51 सीटों की जरूरत पड़ सकती है, हालाँकि,सदन के संचालन और उपराष्ट्रपति की भूमिका के कारण कुछ परिस्थितियों में बहुमत का गणित अलग हो सकता है।
सीनेट में नियंत्रण बदलने से राष्ट्रपति के प्रशासनिक और विधायी एजेंडे पर असर पड़ सकता है। इस सदन की भूमिका कई महत्वपूर्ण नियुक्तियों और विधायी प्रक्रियाओं में होती है। इसलिए यदि किसी एक दल को प्रतिनिधि सभा में बढ़त मिलती है,लेकिन सीनेट दूसरे दल के नियंत्रण में रहती है,तो वॉशिंगटन में राजनीतिक संतुलन और अधिक जटिल हो सकता है।
कम लोकप्रियता के संकेतों के बीच ट्रंप ने अपना चुनाव प्रचार उन राज्यों पर अधिक केंद्रित किया है,जहाँ रिपब्लिकन पार्टी को परंपरागत रूप से समर्थन मिलता रहा है। अमेरिकी राजनीति में रिपब्लिकन समर्थक राज्यों को रेड स्टेट्स और डेमोक्रेट्स के मजबूत राज्यों को ब्लू स्टेट्स कहा जाता है। ट्रंप इन रैलियों के जरिए रिपब्लिकन उम्मीदवारों के पक्ष में समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहे हैं।
उन्होंने अपनी चुनावी सभाओं को ‘ट्रंपापालूजा’ नाम दिया है और दावा किया है कि जिन उम्मीदवारों की स्थिति पहले कमजोर थी,वे उनकी रैलियों के बाद बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। ये सभाएं अलास्का से लेकर टेक्सास तक आयोजित की जा रही हैं। हालाँकि,रैलियों में भीड़ जुटना और चुनाव में सीट जीतना दो अलग-अलग बातें हैं। किसी उम्मीदवार के प्रदर्शन पर स्थानीय मुद्दों, मतदाता भागीदारी और प्रतिद्वंद्वी की ताकत का भी असर पड़ता है।
अलास्का के सीनेट चुनाव को लेकर भी एक असामान्य कानूनी कदम चर्चा में है। उपलब्ध विवरण के मुताबिक,ट्रंप प्रशासन के न्याय विभाग ने चुनाव परिणामों की आधिकारिक घोषणा रोकने के उद्देश्य से मुकदमा दायर करने जैसा कदम उठाया है। विवाद का संबंध मतपत्र पर डैन एस. सुलिवन और डैनियल जे. सुलिवन नाम वाले उम्मीदवारों की मौजूदगी से है। प्रशासन की दलील है कि समान नामों के कारण मतदाताओं में भ्रम पैदा हो सकता है। इस मामले का परिणाम चुनाव प्रक्रिया और मतगणना की आधिकारिक घोषणा को प्रभावित कर सकता है।
मध्यावधि चुनावों के लिए मतदान पहले ही शुरू हो चुका है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, सोमवार तक लगभग तीन करोड़ अमेरिकी नागरिक पोस्टल बैलेट या मतदान केंद्रों के माध्यम से अपना वोट डाल चुके थे। अमेरिका में कुल पंजीकृत मतदाताओं की संख्या लगभग 21.7 करोड़ बताई गई है।
मध्यावधि चुनावों में मतदान प्रतिशत आम तौर पर राष्ट्रपति चुनावों की तुलना में कम रहता है। वर्ष 2022 में मतदान लगभग 46.2 प्रतिशत रहा था,जबकि 2018 में यह करीब 50 प्रतिशत दर्ज किया गया था। इस बार महँगाई, ईंधन की कीमतों, व्यापार नीति और विदेश नीति को लेकर मतदाताओं की प्रतिक्रिया मतदान में भागीदारी को प्रभावित कर सकती है।
कुल मिलाकर, चुनाव से पहले सामने आए सर्वेक्षण ट्रंप और रिपब्लिकन पार्टी के लिए चुनौतीपूर्ण माहौल की ओर संकेत कर रहे हैं। प्रतिनिधि सभा में डेमोक्रेट्स की बढ़त के अनुमान और सीनेट में अनिश्चित मुकाबला अमेरिकी राजनीति के अगले चरण को महत्वपूर्ण बनाते हैं। यदि डेमोक्रेट्स किसी एक सदन पर भी नियंत्रण हासिल करते हैं, तो ट्रंप प्रशासन को अपने फैसलों और विधायी योजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए अधिक राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ सकता है। हालाँकि,अंतिम तस्वीर मतगणना के बाद ही साफ होगी।
