मुंबई,27 अक्टूबर (युआईटीवी)- बॉलीवुड अभिनेता टाइगर श्रॉफ से जुड़े फायरिंग मामले में मुंबई क्राइम ब्रांच की जाँच लगातार आगे बढ़ रही है। इस मामले में गिरफ्तार चार आरोपियों को सोमवार को मुंबई की अदालत में दोबारा पेश किया गया। अदालत ने कुणाल संजय, सुमित सरोलिया, राधा वर्मा और बबीता राव को 28 अक्टूबर तक पुलिस हिरासत में भेज दिया है। इन चारों पर कथित तौर पर फायरिंग में इस्तेमाल किए गए हथियार उपलब्ध कराने और पूरी साजिश में भूमिका निभाने का आरोप है। वहीं, मुंबई क्राइम ब्रांच ने आरोपियों की पुलिस हिरासत 31 अक्टूबर तक बढ़ाने की माँग की थी,ताकि मामले से जुड़े विभिन्न पहलुओं की गहराई से जाँच की जा सके।
पुलिस का कहना है कि आरोपियों के मोबाइल फोन से मिले वॉयस नोट्स इस मामले की जाँच में महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। इन रिकॉर्डिंग में कथित तौर पर हथियारों की खरीद, उनकी डिलीवरी और घटना के बाद उन्हें वापस लौटाने से संबंधित बातचीत शामिल है। जाँच एजेंसी इन संदेशों के आधार पर यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि हथियारों की व्यवस्था किसने की, उन्हें किन लोगों तक पहुँचाया गया और फायरिंग के बाद उन्हें कहाँ रखा गया।
मुंबई क्राइम ब्रांच के मुताबिक, आरोपियों के मोबाइल फोन से मिले वॉयस नोट्स में हथियारों की व्यवस्था और उनकी आवाजाही को लेकर निर्देश दिए जाने की बात सामने आई है। पुलिस इन रिकॉर्डिंग की सत्यता और उनमें मौजूद आवाजों की पहचान करने के लिए जाँच कर रही है। इसके लिए आरोपियों के वॉयस सैंपल लेने की जरूरत भी बताई गई है,ताकि रिकॉर्डिंग में मौजूद आवाजों का मिलान किया जा सके।
पुलिस का दावा है कि आरोपियों ने अनिल पंडित के कहने पर कथित तौर पर शूटर्स को हथियार उपलब्ध कराए थे। आरोप है कि उन्हें यह निर्देश भी दिया गया था कि फायरिंग की घटना को अंजाम देने के बाद हथियार वापस कर दिए जाएँ। जाँच एजेंसी इस पूरे घटनाक्रम की कड़ियों को जोड़ने की कोशिश कर रही है,ताकि यह स्पष्ट हो सके कि हथियारों की आपूर्ति से लेकर घटना के बाद उन्हें वापस लेने तक किसकी क्या भूमिका थी।
क्राइम ब्रांच वॉयस नोट्स के अलावा पैसों के लेन-देन की भी जाँच कर रही है। पुलिस यह पता लगाना चाहती है कि हथियारों की व्यवस्था करने और उन्हें शूटर्स तक पहुंचाने के बदले किसी तरह का भुगतान किया गया था या नहीं। इस सिलसिले में पैसों के लेन-देन का पूरा विवरण जुटाने की कोशिश की जा रही है। साथ ही,हथियारों के मौजूदा ठिकाने का पता लगाना भी जाँच का एक अहम हिस्सा है।
जाँच एजेंसी के सामने यह पता लगाने की चुनौती है कि कथित साजिश में शामिल लोगों के बीच किस तरह संपर्क हुआ और घटना के बाद हथियारों को छिपाने या वापस करने की क्या योजना बनाई गई थी। पुलिस हिरासत के दौरान इन सवालों के जवाब हासिल करने के लिए आरोपियों से पूछताछ की जा रही है।
अदालत में सुनवाई के दौरान आरोपियों के वकील अजिंक्य मिर्गल ने पुलिस की ओर से आगे की हिरासत मांगे जाने के आधारों पर सवाल उठाए। उन्होंने दलील दी कि चारों आरोपियों की हिरासत बढ़ाने के लिए पुलिस ने अपनी रिमांड रिपोर्ट में लगभग एक जैसे कारण दिए हैं। उनके मुताबिक,रिपोर्ट का अध्ययन करने पर पता चलता है कि अधिकांश आधार समान हैं और केवल कुछ बिंदुओं को अलग तरीके से पेश किया गया है।
मिर्गल ने कहा कि हिरासत की माँग के लिए पुलिस ने मुख्य रूप से दो अलग-अलग जरूरतों का उल्लेख किया है। इनमें आरोपियों के वॉयस सैंपल लेना और घटनास्थल से जुड़े कुछ अन्य पहलुओं की जाँच करना शामिल है। उन्होंने यह भी बताया कि पुलिस आरोपियों को कथित तौर पर स्थानीय स्तर पर मिली मदद के स्रोत का पता लगाना चाहती है।
बचाव पक्ष का तर्क था कि घटना को हुए काफी समय बीत चुका है। पुलिस दूसरे राज्यों में जाकर जाँच करने और वहां से आरोपियों को गिरफ्तार कर मुंबई लाने में सक्षम है। ऐसे में मुंबई में ही आरोपियों को कथित तौर पर किसने और किस तरह मदद पहुँचाई,इसका पता लगाने के लिए लंबी पुलिस हिरासत की जरूरत पर सवाल उठता है।
मिर्गल ने अदालत में दलील दी कि स्थानीय मदद के स्रोत का पता लगाना पुलिस के अधिकार क्षेत्र में आने वाला काम है और इसके लिए आरोपियों की हिरासत को लंबे समय तक बढ़ाना उचित आधार नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि वॉयस सैंपल लेने की आवश्यकता का हवाला देकर 31 अक्टूबर तक हिरासत माँगना भी जरूरी नहीं है।
बचाव पक्ष ने इस तरह पुलिस की ओर से प्रस्तुत आधारों की पर्याप्तता पर सवाल उठाते हुए कहा कि जाँच के लिए जरूरी प्रक्रियाएँ पूरी करने के नाम पर लंबी हिरासत की माँग को उचित ठहराया जाना चाहिए। हालाँकि,अदालत ने आरोपियों को 28 अक्टूबर तक पुलिस हिरासत में भेजने का आदेश दिया।
मामले में आरोपी सुमित सरोलिया की ओर से पेश हुए वकील विकेश मेहरा ने भी पुलिस के आरोपों को चुनौती दी। उन्होंने अदालत में कहा कि सुमित सोनीपत का रहने वाला है और पुलिस उसकी कथित भूमिका को लेकर पर्याप्त ठोस सबूत पेश नहीं कर पाई है।
मेहरा के अनुसार,पुलिस ने दावा किया है कि सुमित, कुणाल के साथ अमृतसर गया था। हालाँकि, बचाव पक्ष का कहना है कि इस यात्रा की पुष्टि करने वाला कोई ठोस सबूत सामने नहीं रखा गया है। वकील ने कहा कि पुलिस के पास कॉल डिटेल्स जरूर हैं,लेकिन केवल कॉल रिकॉर्ड के आधार पर सुमित की कथित संलिप्तता को साबित नहीं किया जा सकता।
उन्होंने दलील दी कि सुमित के खिलाफ ऐसा कोई बड़ा या निर्णायक सबूत नहीं है,जिससे यह स्थापित हो सके कि वह फायरिंग की कथित साजिश का हिस्सा था। बचाव पक्ष के मुताबिक,पुलिस को उसकी भूमिका के संबंध में ठोस तथ्य प्रस्तुत करने चाहिए।
हालाँकि,पुलिस मामले में आरोपियों के बीच संपर्क, कथित यात्रा, हथियारों की आपूर्ति और घटना से जुड़े अन्य पहलुओं की जाँच कर रही है। कॉल डिटेल्स और मोबाइल फोन से प्राप्त डिजिटल साक्ष्यों को भी इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। इन साक्ष्यों से आरोपियों की भूमिका किस हद तक स्थापित होती है,यह जाँच और आगे की कानूनी प्रक्रिया में स्पष्ट होगा।
इस मामले में पुलिस की जाँच अब केवल फायरिंग की घटना तक सीमित नहीं है। क्राइम ब्रांच यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि हथियार कहाँ से आए,उन्हें शूटर्स तक पहुँचाने में किन लोगों ने भूमिका निभाई और घटना के बाद उन्हें वापस लेने की कथित व्यवस्था कैसे की गई।
पुलिस आरोपियों के मोबाइल फोन से मिले वॉयस नोट्स की पहचान और उनके बीच हुई बातचीत की कड़ियों को जोड़ रही है। इसके साथ ही पैसों के लेन-देन की जाँच और हथियारों के ठिकाने का पता लगाने पर भी ध्यान दिया जा रहा है। स्थानीय स्तर पर मदद मिलने के आरोप की जाँच भी आगे की कार्रवाई का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
दूसरी ओर,बचाव पक्ष का कहना है कि आरोपियों को लंबे समय तक पुलिस हिरासत में रखने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हैं। वकीलों ने आरोपियों की भूमिका और पुलिस की ओर से पेश किए गए साक्ष्यों पर सवाल उठाए हैं। ऐसे में मामले की जाँच के साथ-साथ अदालत में पुलिस और बचाव पक्ष की दलीलें भी महत्वपूर्ण रहेंगी।
फिलहाल, अदालत के आदेश के अनुसार चारों आरोपी 28 अक्टूबर तक पुलिस हिरासत में रहेंगे। मुंबई क्राइम ब्रांच इस अवधि में वॉयस नोट्स की जाँच,आवाजों के मिलान,पैसों के लेन-देन, हथियारों के ठिकाने और कथित स्थानीय मदद से जुड़े सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करेगी। वहीं, आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों की पुष्टि जाँच और न्यायिक प्रक्रिया के दौरान सामने आने वाले साक्ष्यों के आधार पर ही होगी।
