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वैश्विक तनाव के बीच भारत का विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ा,682 अरब डॉलर के पार पहुँचा रिजर्व

नई दिल्ली,6 जून (युआईटीवी)- मध्य पूर्व में जारी भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच भारत के लिए एक सकारात्मक आर्थिक खबर सामने आई है। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी ताजा आँकड़ों के अनुसार,29 मई को समाप्त हुए सप्ताह में देश का विदेशी मुद्रा भंडार 938 मिलियन डॉलर बढ़कर 682.321 अरब डॉलर पर पहुँच गया है। विदेशी मुद्रा भंडार में यह वृद्धि ऐसे समय में दर्ज की गई है,जब दुनिया के कई हिस्सों में आर्थिक अस्थिरता और बाजारों में उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि विदेशी मुद्रा भंडार का मजबूत स्तर भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिरता और बाहरी झटकों से निपटने की क्षमता को दर्शाता है।

भारतीय रिजर्व बैंक के आँकड़ों के मुताबिक विदेशी मुद्रा भंडार में बढ़ोतरी का सबसे बड़ा योगदान विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों यानी फॉरेन करेंसी एसेट्स से आया है। समीक्षा सप्ताह के दौरान इन परिसंपत्तियों का मूल्य 3.116 अरब डॉलर बढ़कर 546.148 अरब डॉलर हो गया। विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियां देश के कुल विदेशी मुद्रा भंडार का सबसे बड़ा हिस्सा होती हैं और इनमें विभिन्न प्रमुख वैश्विक मुद्राएँ शामिल रहती हैं। इनमें अमेरिकी डॉलर के अलावा यूरो, जापानी येन और ब्रिटिश पाउंड जैसी प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय मुद्राएँ शामिल होती हैं। इन सभी मुद्राओं का मूल्यांकन डॉलर के संदर्भ में किया जाता है।

विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों में हुई बढ़ोतरी यह संकेत देती है कि भारत के पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा उपलब्ध है और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय लेनदेन को लेकर उसकी स्थिति मजबूत बनी हुई है। यह स्थिति न केवल निवेशकों का भरोसा बढ़ाती है,बल्कि वैश्विक बाजारों में भारत की आर्थिक साख को भी मजबूत करती है।

हालाँकि,विदेशी मुद्रा भंडार के दूसरे सबसे बड़े घटक स्वर्ण भंडार यानी गोल्ड रिजर्व में इस दौरान कुछ गिरावट दर्ज की गई। भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार स्वर्ण भंडार का मूल्य 2.186 अरब डॉलर घटकर 112.600 अरब डॉलर रह गया। सोने की अंतर्राष्ट्रीय कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक बाजार की परिस्थितियों का असर अक्सर गोल्ड रिजर्व के मूल्यांकन पर पड़ता है। इसके बावजूद भारत का स्वर्ण भंडार अब भी मजबूत स्तर पर बना हुआ है और विदेशी मुद्रा भंडार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है।

आँकड़ों के अनुसार विशेष आहरण अधिकार यानी एसडीआर का मूल्य इस अवधि में स्थिर रहा और यह 18.747 अरब डॉलर पर कायम रहा। एसडीआर अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा सदस्य देशों को प्रदान की जाने वाली एक विशेष आरक्षित संपत्ति होती है,जिसका उपयोग जरूरत पड़ने पर विदेशी मुद्रा की उपलब्धता बढ़ाने के लिए किया जा सकता है।

इसके अलावा अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष में भारत की रिजर्व स्थिति में भी मामूली सुधार दर्ज किया गया। यह 8 मिलियन डॉलर बढ़कर 4.826 अरब डॉलर हो गई। यद्यपि यह विदेशी मुद्रा भंडार का अपेक्षाकृत छोटा हिस्सा है,लेकिन यह भी भारत की अंतरराष्ट्रीय वित्तीय स्थिति का महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है।

अर्थशास्त्रियों का कहना है कि किसी भी देश के लिए विदेशी मुद्रा भंडार उसकी आर्थिक मजबूती का एक महत्वपूर्ण पैमाना होता है। यह केवल एक वित्तीय आँकड़ा नहीं होता,बल्कि यह देश की बाहरी आर्थिक चुनौतियों से निपटने की क्षमता को भी दर्शाता है। जब किसी देश के पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार होता है,तो वह वैश्विक बाजार में आने वाले उतार-चढ़ाव,आयात संबंधी दबाव और वित्तीय संकट जैसी परिस्थितियों का बेहतर तरीके से सामना कर सकता है।

विदेशी मुद्रा भंडार का एक प्रमुख उपयोग देश की मुद्रा को स्थिर बनाए रखना भी है। यदि किसी कारणवश अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये पर दबाव बढ़ता है और उसकी कीमत तेजी से गिरने लगती है,तो भारतीय रिजर्व बैंक विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग कर बाजार में डॉलर की आपूर्ति बढ़ा सकता है। इससे रुपये को अत्यधिक कमजोर होने से रोका जा सकता है और विनिमय दर में स्थिरता बनाए रखी जा सकती है।

यही कारण है कि विदेशी मुद्रा भंडार को किसी देश की आर्थिक सुरक्षा कवच के रूप में भी देखा जाता है। मजबूत रिजर्व देश को वैश्विक आर्थिक संकटों के दौरान आत्मविश्वास प्रदान करता है और निवेशकों को यह भरोसा देता है कि अर्थव्यवस्था बाहरी झटकों का सामना करने में सक्षम है।

विशेषज्ञों का मानना है कि विदेशी मुद्रा भंडार में लगातार वृद्धि यह भी संकेत देती है कि देश में विदेशी मुद्रा की आवक मजबूत बनी हुई है। निर्यात,विदेशी निवेश,प्रेषण और विभिन्न आर्थिक गतिविधियों के माध्यम से डॉलर और अन्य विदेशी मुद्राओं का प्रवाह जारी रहने से रिजर्व मजबूत होता है। इससे न केवल वित्तीय स्थिरता बढ़ती है,बल्कि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को भी समर्थन मिलता है।

विदेशी मुद्रा भंडार का ऊँचा स्तर आयात पर निर्भर क्षेत्रों के लिए भी राहत का कारण बनता है। भारत जैसे देश,जो ऊर्जा और कई अन्य आवश्यक वस्तुओं के लिए आयात पर निर्भर हैं,उनके लिए पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार होना बेहद महत्वपूर्ण है। इससे आयात भुगतान सुचारु रूप से किए जा सकते हैं और वैश्विक बाजार में किसी भी प्रकार की अनिश्चितता का असर सीमित किया जा सकता है।

इस बीच,वैश्विक चुनौतियों और क्षेत्रीय तनावों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन मजबूत बना हुआ है। हाल के आर्थिक आँकड़े बताते हैं कि वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान देश की सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर 7.7 प्रतिशत रही है। यह वृद्धि दर दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में काफी बेहतर मानी जा रही है और यह भारत की मजबूत आर्थिक नींव को दर्शाती है।

मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव,अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में अनिश्चितता और वैश्विक आर्थिक चुनौतियों के बीच विदेशी मुद्रा भंडार का बढ़ना भारत के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। यह न केवल देश की वित्तीय स्थिति को मजबूत बनाता है,बल्कि वैश्विक निवेशकों के बीच भारत की विश्वसनीयता को भी बढ़ाता है। आने वाले समय में यदि विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत स्तर पर बना रहता है और आर्थिक विकास की गति जारी रहती है,तो भारत वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में और अधिक प्रभावशाली भूमिका निभाने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।