भारत के विदेश मंत्री एस.जयशंकर (तस्वीर क्रेडिट @epanchjanya)

जयशंकर का फ्रांस और लक्जमबर्ग दौरा: रणनीतिक साझेदारी,वैश्विक मुद्दों और कूटनीतिक सहयोग को नई दिशा देने की तैयारी

नई दिल्ली,5 जनवरी (युआईटीवी)- भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर 4 से 9 जनवरी तक फ्रांस और लक्जमबर्ग के आधिकारिक दौरे पर रहेंगे। नए साल की शुरुआत के साथ होने वाला यह दौरा भारत की कूटनीतिक गतिविधियों के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है। यह जयशंकर का साल 2026 का पहला विदेश दौरा है और इसे भारत-फ्रांस रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने तथा यूरोपीय देशों के साथ सहयोग के नए रास्ते तलाशने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा जा रहा है। विदेश मंत्रालय के मुताबिक,इस यात्रा के दौरान द्विपक्षीय संबंधों,वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों,आर्थिक सहयोग और क्षेत्रीय स्थिरता से जुड़े कई मुद्दों पर गहन चर्चा होने वाली है।

फ्रांस के दौरे के दौरान जयशंकर फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से मुलाकात करेंगे। इसके साथ ही वह फ्रांस के विदेश मंत्री जीन नोएल बैरोट सहित शीर्ष नेतृत्व के साथ बातचीत करेंगे। दोनों देशों के बीच लंबे समय से चली आ रही रणनीतिक साझेदारी ने रक्षा,अंतरिक्ष,उन्नत तकनीक,ऊर्जा सुरक्षा और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग को नई मजबूती दी है। इस संदर्भ में मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि मुलाकातों में न केवल मौजूदा परियोजनाओं की समीक्षा की जाएगी,बल्कि भविष्य के लिए नई प्राथमिकताओं पर भी चर्चा की जाएगी।

विदेश मंत्रालय द्वारा जारी बयान के अनुसार,जयशंकर अपने फ्रांस प्रवास के दौरान फ्रेंच एम्बेसडर कॉन्फ्रेंस के 31वें संस्करण को गेस्ट ऑफ ऑनर के रूप में संबोधित करेंगे। यह मंच फ्रांस के कूटनीतिक समुदाय के लिए रणनीतिक विमर्श का एक महत्वपूर्ण अवसर माना जाता है,जहाँ अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य,बदलते वैश्विक समीकरण और विदेश नीति के रुझानों पर विचार किया जाता है। जयशंकर का संबोधन इस बात का संकेत है कि फ्रांस भारत को 21वीं सदी के वैश्विक साझेदार के रूप में कितना महत्व देता है। दोनों देशों के बीच गहरा भरोसा और साझा दृष्टि ही इस रिश्ते की सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है।

दूसरी ओर,जयशंकर लक्जमबर्ग की अपनी यात्रा के दौरान उपप्रधानमंत्री और विदेश मंत्री जेवियर बेटेल तथा वरिष्ठ नेतृत्व के साथ मुलाकात करेंगे। लक्जमबर्ग भले ही भौगोलिक रूप से छोटा देश हो,लेकिन यूरोपीय वित्तीय जगत में उसकी भूमिका बेहद प्रभावशाली है। इस मुलाकात में वित्तीय सहयोग,निवेश,डिजिटल अर्थव्यवस्था और नवाचार के नए अवसरों पर चर्चा की उम्मीद है। साथ ही,दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों को बढ़ाने और भारतीय कंपनियों के लिए यूरोपीय बाजारों तक पहुंच को आसान बनाने पर भी बात हो सकती है।

विदेश मंत्री अपने व्यस्त कार्यक्रम के बीच लक्जमबर्ग में बसे भारतीय समुदाय के सदस्यों से भी मुलाकात करेंगे। प्रवासी भारतीय लंबे समय से दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक और आर्थिक पुल का काम करते आए हैं। उनकी भूमिका न केवल आर्थिक गतिविधियों तक सीमित है,बल्कि वे भारत की छवि और मूल्यों के महत्वपूर्ण प्रतिनिधि भी हैं। ऐसे में जयशंकर की यह मुलाकात प्रवासी समुदाय के साथ भारत के रिश्ते को और गहरा करने के प्रयास के रूप में देखी जा रही है।

भारत और फ्रांस के बीच पिछले कुछ वर्षों में लगातार बढ़ते संपर्क इस यात्रा की पृष्ठभूमि को और मजबूत बनाते हैं। पिछले साल जोहान्सबर्ग में जी20 समिट के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की मुलाकात ने द्विपक्षीय रिश्तों को नई ऊर्जा दी थी। उस समय प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि भारत-फ्रांस की साझेदारी वैश्विक भलाई के लिए एक मजबूत ताकत बन चुकी है। यह टिप्पणी इस बात का संकेत थी कि दोनों देश न केवल द्विपक्षीय स्तर पर,बल्कि बहुपक्षीय मंचों पर भी साथ मिलकर काम करने के इच्छुक हैं।

सिर्फ उच्चस्तरीय बैठकों तक बात सीमित नहीं रही। सितंबर 2025 में हुई फोन पर बातचीत के दौरान भी दोनों नेताओं ने यूक्रेन संकट,क्षेत्रीय स्थिरता और शांति बहाली के प्रयासों पर अपने विचार साझा किए थे। इस दौरान भारत ने स्पष्ट रूप से बातचीत और कूटनीति के जरिए समाधान का समर्थन दोहराया। अगस्त 2025 में हुई एक अन्य बातचीत में भी दोनों देशों ने रक्षा,विज्ञान,तकनीक और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में प्रगति का आकलन किया।

इन वार्ताओं के केंद्र में “होराइजन 2047 रोडमैप”, “इंडो-पैसिफिक रोडमैप” और “डिफेंस इंडस्ट्रियल रोडमैप” जैसे दीर्घकालिक ढाँचे मौजूद रहे हैं। ये पहलें दर्शाती हैं कि भारत और फ्रांस का सहयोग केवल वर्तमान परियोजनाओं तक सीमित नहीं है,बल्कि आने वाले दशकों के लिए भी एक साझा दृष्टि पर आधारित है। खासतौर पर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में दोनों देशों का सहयोग समुद्री सुरक्षा,आपूर्ति श्रृंखला स्थिरता और नियम-आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के संरक्षण के लिए अहम माना जाता है।

जयशंकर की यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है,जब वैश्विक परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। यूक्रेन युद्ध,पश्चिम एशिया में तनाव,ऊर्जा सुरक्षा,जलवायु परिवर्तन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी उभरती तकनीकों पर वैश्विक बहस लगातार तेज हो रही है। इन सभी मुद्दों पर भारत और फ्रांस अक्सर एक-दूसरे के करीब खड़े दिखाई देते हैं। इसलिए माना जा रहा है कि पेरिस और लक्जमबर्ग में होने वाली चर्चाएँ केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं रहेंगी,बल्कि व्यापक वैश्विक चुनौतियों के समाधान के लिए भी महत्वपूर्ण संकेत देंगी।

कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह दौरा यूरोप में भारत की सक्रिय भूमिका को और मजबूत करेगा। फ्रांस,यूरोपीय संघ के भीतर भारत का एक प्रमुख साझेदार है,जबकि लक्जमबर्ग निवेश और वित्तीय संबंधों का अहम केंद्र है। दोनों देशों के साथ बढ़ता सहयोग भारत की “मल्टी-अलाइनमेंट” रणनीति का हिस्सा है,जिसमें अलग-अलग क्षेत्रों और संगठनों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने पर जोर दिया जाता है।

आने वाले दिनों में इस यात्रा के नतीजों पर सबकी निगाहें टिकी रहेंगी। यह दौरा न केवल कूटनीतिक कैलेंडर की शुरुआत भर है,बल्कि उस व्यापक रणनीति का हिस्सा भी है,जिसके जरिए भारत अपने मित्र देशों के साथ विश्वास,सहयोग और साझा हितों पर आधारित रिश्तों को नई ऊँचाई देना चाहता है।