जालंधर के गुरिंदर वीर (तस्वीर क्रेडिट@snp_inc)

जालंधर के गुरिंदर वीर ने रचा इतिहास, 10.09 सेकंड में 100 मीटर दौड़ पूरी कर तोड़ा राष्ट्रीय रिकॉर्ड,कॉमनवेल्थ गेम्स और ओलंपिक पर नजर

जालंधर,25 मई (युआईटीवी)- पंजाब की धरती ने देश को हमेशा ऐसे खिलाड़ी दिए हैं,जिन्होंने अपने दम पर भारत का नाम दुनिया भर में रोशन किया है। अब इसी सूची में एक और नाम तेजी से उभरकर सामने आया है। जालंधर के युवा धावक गुरिंदर वीर सिंह ने भारतीय एथलेटिक्स में नया इतिहास रचते हुए 100 मीटर दौड़ में राष्ट्रीय रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया है। राँची में आयोजित 29वें नेशनल सीनियर फेडरेशन कप में गुरिंदर ने महज 10.09 सेकंड में दौड़ पूरी कर ऐसा कारनामा किया,जिसने पूरे देश को गर्व महसूस कराया। उनके इस प्रदर्शन ने न केवल भारत में स्प्रिंटिंग के स्तर को नई ऊँचाई दी है,बल्कि कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए उनका टिकट भी पक्का कर दिया है।

राँची के ट्रैक पर जैसे ही फाइनल रेस शुरू हुई,सभी की निगाहें युवा धावकों पर टिकी थीं,लेकिन जब रेस खत्म हुई और टाइमिंग बोर्ड पर 10.09 सेकंड चमका,तो स्टेडियम तालियों से गूँज उठा। गुरिंदर वीर ने न सिर्फ दौड़ जीती,बल्कि भारतीय एथलेटिक्स इतिहास में अपना नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज करा लिया। यह समय भारत के लिए अब तक के सबसे तेज समयों में शामिल हो गया है। खास बात यह रही कि उन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए तय 10.16 सेकंड के क्वालीफिकेशन समय को भी आसानी से पीछे छोड़ दिया।

गुरिंदर वीर की इस उपलब्धि के बाद पंजाब में जश्न का माहौल बन गया। जालंधर स्थित उनके घर के बाहर लोगों की भीड़ जुटने लगी। रिश्तेदार,पड़ोसी और खेल प्रेमी लगातार परिवार को बधाई देने पहुँचने लगे,लेकिन इस ऐतिहासिक जीत के बाद गुरिंदर ने सबसे पहले जिस व्यक्ति को फोन किया,वह थीं उनकी माँ गुरविंदर कौर। भावुक आवाज में गुरिंदर ने माँ से पूछा, “देखी मेरी रेस?” माँ ने खुशी से भरकर जवाब दिया, “हाँ बेटा,तूने कमाल कर दिया।” यह पल पूरे परिवार के लिए बेहद भावुक और गर्व से भरा हुआ था।

इसके बाद जब पिता कमलजीत सिंह से बात हुई तो गुरिंदर मुस्कुराते हुए बोले, “डेडी दस्स फेर किदां?” बेटे की इस बात ने परिवार को भावुक कर दिया। घर में खुशी का माहौल ऐसा था कि करीब 90 वर्षीय दादी चरण कौर ने अपने पोते को लड्डू खिलाकर आशीर्वाद दिया। परिवार की आँखों में खुशी के आँसू थे,क्योंकि वर्षों की मेहनत आखिरकार रंग लाई थी।

गुरिंदर वीर की सफलता के पीछे उनके परिवार की खेल पृष्ठभूमि का भी बड़ा योगदान रहा है। उनके दादा तरसेम सिंह कबड्डी खिलाड़ी रह चुके हैं,जबकि पिता कमलजीत सिंह पंजाब पुलिस में एएसआई रहे हैं और वॉलीबॉल खिलाड़ी भी रह चुके हैं। खेल का माहौल बचपन से ही गुरिंदर के आसपास था। परिवार ने हमेशा उन्हें प्रोत्साहित किया और यही वजह रही कि उन्होंने बहुत छोटी उम्र में ही अपने भीतर छिपी प्रतिभा को पहचान लिया।

गुरिंदर के पिता ने बताया कि बचपन से ही बेटे को दौड़ने का बहुत शौक था। गाँव की गलियों,खेतों और पगडंडियों में वह घंटों दौड़ता रहता था। कई बार गाँव के छोटे कुत्ते उसके पीछे दौड़ पड़ते और वह उनसे बचने के लिए और तेज भागता। परिवार को तभी महसूस हो गया था कि बेटे के अंदर असाधारण गति है और अगर सही दिशा मिले तो वह बड़ा खिलाड़ी बन सकता है।

करीब 12 साल की उम्र में गुरिंदर ने गंभीरता से ट्रेनिंग शुरू कर दी। पिता उसे अपने साथ मैदान में ले जाते और दौड़ का अभ्यास करवाते थे। शुरुआत में दोनों साथ दौड़ते थे,लेकिन कुछ समय बाद बेटा अपने पिता को भी पीछे छोड़ने लगा। धीरे-धीरे गुरिंदर की रफ्तार और आत्मविश्वास दोनों बढ़ते गए। उन्होंने खुद को पूरी तरह खेल के प्रति समर्पित कर दिया।

गुरिंदर वीर की सफलता के पीछे उनकी कठिन मेहनत और अनुशासित जीवनशैली का भी बड़ा हाथ है। वह रोज करीब आठ घंटे अभ्यास करते थे। सुबह की दौड़ से लेकर जिम ट्रेनिंग,स्ट्रेंथ वर्कआउट और तकनीकी अभ्यास तक,हर चीज पर उनका पूरा ध्यान रहता था। वह अपनी फिटनेस को लेकर बेहद गंभीर थे और खाने-पीने से लेकर आराम तक हर चीज का विशेष ध्यान रखते थे।

उनकी माँ गुरविंदर कौर ने बताया कि बेटे की डाइट पर परिवार हमेशा खास ध्यान देता था। घर का शुद्ध घी,दूध,ड्राई फ्रूट,पिन्नियाँ और खजूर की बर्फी उसकी ताकत का बड़ा आधार बने। जब गुरिंदर 2014 में जालंधर ट्रेनिंग के लिए गए,तब परिवार हर हफ्ते दो बार उनके लिए घर का पौष्टिक खाना लेकर पहुँचता था। माँ ने कहा कि बेटे ने अपनी फिटनेस और शरीर को इस स्तर तक पहुँचाने के लिए बहुत त्याग किया है। वह घर से दूर रहकर भी सिर्फ अपने लक्ष्य पर फोकस करता था।

गुरिंदर का आत्मविश्वास उनकी सोच में भी साफ दिखाई देता है। फाइनल रेस से पहले उन्होंने अपने चेस्ट नंबर के पीछे 10.10 सेकंड का लक्ष्य लिख रखा था। यानी उन्हें पहले से भरोसा था कि वह इस समय को जरूर हासिल करेंगे,लेकिन फाइनल में उन्होंने खुद को भी पीछे छोड़ दिया और 10.09 सेकंड का नया राष्ट्रीय रिकॉर्ड बना डाला। रेस खत्म होने के बाद जब उन्होंने अपनी छाती पर लगे नंबर की तरफ इशारा किया,तो वह पल दर्शकों के लिए बेहद खास बन गया।

उनकी इस उपलब्धि पर पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने भी सोशल मीडिया पर बधाई दी। मुख्यमंत्री ने कहा कि पंजाब के इस गबरू ने दो दिनों के भीतर दूसरा राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़कर पूरे देश और दुनिया में पंजाब का नाम रोशन किया है। उन्होंने कहा कि गुरिंदर वीर की मेहनत और लगन युवा खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा है और पूरा पंजाब उनकी इस उपलब्धि पर गर्व महसूस कर रहा है।

अंतर्राष्ट्रीय एथलेटिक्स कोच सरबजीत सिंह ने भी गुरिंदर की जमकर तारीफ की। उन्होंने कहा कि 10.09 सेकंड का समय भारतीय एथलेटिक्स के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है। लंबे समय तक भारत में 100 मीटर दौड़ में विश्व स्तर के प्रदर्शन की कमी महसूस की जाती रही,लेकिन अब गुरिंदर वीर ने यह साबित कर दिया है कि भारतीय धावक भी दुनिया के बड़े मंच पर चुनौती देने की क्षमता रखते हैं।

कोच ने कहा कि कॉमनवेल्थ गेम्स का क्वालीफिकेशन समय 10.16 सेकंड था और गुरिंदर ने उसे काफी बेहतर समय के साथ पार किया है। उनके अनुसार अब गुरिंदर एशिया के शीर्ष धावकों में शामिल हो चुके हैं। हालाँकि,उन्होंने यह भी कहा कि यह केवल शुरुआत है। असली लक्ष्य ओलंपिक,एशियन गेम्स और कॉमनवेल्थ गेम्स में पदक जीतना होगा।

गुरिंदर वीर महान धावक मिल्खा सिंह और दुनिया के सबसे तेज धावक उसैन बोल्ट को अपना आदर्श मानते हैं। वह हमेशा कहते रहे हैं कि उनका सपना अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत का झंडा ऊँचा करना है। अब उनके हालिया प्रदर्शन ने यह साबित कर दिया है कि वह केवल सपने नहीं देख रहे,बल्कि उन्हें पूरा करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।

राँची में बना यह राष्ट्रीय रिकॉर्ड भारतीय एथलेटिक्स के लिए नई उम्मीद लेकर आया है। गुरिंदर वीर सिंह की सफलता ने यह संदेश दिया है कि अगर प्रतिभा को सही दिशा,मेहनत और परिवार का समर्थन मिले तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं होता। आने वाले समय में पूरे देश की नजर अब इस युवा धावक पर रहेगी,जिससे उम्मीद की जा रही है कि वह अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भी भारत के लिए नया इतिहास रचेगा।