अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग (तस्वीर क्रेडिट@rashtra_press)

संयुक्त राष्ट्र के अगले महासचिव की तलाश तेज,सात उम्मीदवारों के बीच मुकाबला; अमेरिका-चीन की भूमिका पर नजर

न्यूयॉर्क,22 सितंबर (युआईटीवी)- संयुक्त राष्ट्र के अगले महासचिव के चुनाव को लेकर कूटनीतिक हलचल तेज हो गई है। मौजूदा महासचिव एंतोनियो गुटेरेस का दूसरा पाँच वर्षीय कार्यकाल 31 दिसंबर 2026 को समाप्त हो जाएगा और नए महासचिव का कार्यकाल 1 जनवरी 2027 से शुरू होना है। ऐसे में संयुक्त राष्ट्र के अगले प्रमुख के चयन की प्रक्रिया अब निर्णायक चरण की ओर बढ़ रही है। सुरक्षा परिषद में तीन दौर के अनौपचारिक गुप्त मतदान हो चुके हैं,लेकिन अब तक किसी एक उम्मीदवार को ऐसा समर्थन नहीं मिला है,जिससे चयन की तस्वीर पूरी तरह स्पष्ट हो सके। तीसरे मतदान के बाद चिली की पूर्व राष्ट्रपति मिशेल बाचेलेट ने अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली,जिससे मैदान में सात उम्मीदवार रह गए हैं।

संयुक्त राष्ट्र के अगले महासचिव का चयन सामान्य चुनाव की तरह नहीं होता। इसकी प्रक्रिया में पहले सदस्य देश उम्मीदवारों के नाम प्रस्तावित करते हैं। इसके बाद उम्मीदवार महासभा के सामने अपनी प्राथमिकताओं और संयुक्त राष्ट्र के भविष्य को लेकर अपनी दृष्टि रखते हैं। 2026 की प्रक्रिया में उम्मीदवारों के साथ संवाद के कई दौर आयोजित किए गए और जुलाई में पहली बार लगभग एक दशक बाद संयुक्त राष्ट्र महासभा परिसर में सार्वजनिक टाउन हॉल भी आयोजित किया गया। इसके बाद सुरक्षा परिषद ने उम्मीदवारों की स्वीकार्यता का आकलन करने के लिए अनौपचारिक स्ट्रॉ पोल शुरू किए।

स्ट्रॉ पोल औपचारिक चुनाव नहीं होते। इनका उद्देश्य यह समझना होता है कि सुरक्षा परिषद के सदस्य किस उम्मीदवार को आगे बढ़ाने के पक्ष में हैं और किसे लेकर उन्हें आपत्ति है। मतदान में सदस्य किसी उम्मीदवार के लिए ‘प्रोत्साहित’, ‘हतोत्साहित’ या ‘कोई राय नहीं’ जैसे विकल्प चुनते हैं। इस प्रक्रिया से उम्मीदवारों की स्थिति और संभावित आपत्तियों का प्रारंभिक अंदाजा लगाया जाता है। अंतिम निर्णय हालाँकि सुरक्षा परिषद की औपचारिक सिफारिश और उसके बाद महासभा की नियुक्ति से होता है।

सुरक्षा परिषद में 15 सदस्य होते हैं। इनमें अमेरिका, चीन, रूस, फ्रांस और ब्रिटेन पांच स्थायी सदस्य हैं, जबकि 10 सदस्य अस्थायी होते हैं। किसी उम्मीदवार को सुरक्षा परिषद से आगे बढ़ने के लिए कम-से-कम नौ सदस्यों का समर्थन हासिल करना होता है और पांच स्थायी सदस्यों में से किसी को भी वीटो का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। सुरक्षा परिषद द्वारा नाम की सिफारिश किए जाने के बाद 193 सदस्यीय संयुक्त राष्ट्र महासभा उस उम्मीदवार की नियुक्ति करती है। इसलिए महासचिव के चयन में केवल कुल समर्थन ही नहीं,बल्कि स्थायी सदस्यों की स्वीकार्यता भी महत्वपूर्ण होती है।

तीसरे स्ट्रॉ पोल में कोस्टा रिका की रेबेका ग्रिन्सपैन को नौ ‘प्रोत्साहित’ वोट मिले। गुयाना की कैरोलिन रोड्रिग्स-बिर्केट को आठ वोट मिले। दोनों उम्मीदवारों के बीच अंतर सीमित रहा। अन्य उम्मीदवारों की स्थिति भी मतदान में अलग-अलग रही,जिससे यह संकेत मिला कि अभी किसी एक नाम पर व्यापक सहमति नहीं बनी है। चूँकि,मतदान गोपनीय होते हैं, इसलिए सार्वजनिक रूप से सामने आने वाले आँकड़े सुरक्षा परिषद के भीतर चल रही पूरी बातचीत को नहीं दर्शाते।

मिशेल बाचेलेट का चुनावी दौड़ से हटना इस प्रक्रिया में हालिया महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। चिली की पूर्व राष्ट्रपति और संयुक्त राष्ट्र की पूर्व मानवाधिकार प्रमुख बाचेलेट ने 20 सितंबर को अपनी उम्मीदवारी वापस लेने की घोषणा की। तीसरे स्ट्रॉ पोल में उन्हें केवल एक ‘प्रोत्साहित’ वोट मिला,जबकि 11 सदस्यों ने ‘हतोत्साहित’ विकल्प चुना और तीन ने कोई राय नहीं दी। जुलाई में उन्हें छह ‘प्रोत्साहित’ वोट मिले थे,जबकि अगस्त के मतदान में यह संख्या घटकर दो रह गई थी। उनके हटने के बाद उम्मीदवारों की संख्या सात हो गई है।

मौजूदा उम्मीदवारों में लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई क्षेत्र की मजबूत मौजूदगी दिखाई देती है। कोस्टा रिका की रेबेका ग्रिन्सपैन संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास संस्था की प्रमुख रह चुकी हैं। गुयाना की कैरोलिन रोड्रिग्स-बिर्केट लंबे समय से कूटनीतिक क्षेत्र में सक्रिय रही हैं। अर्जेंटीना के राफेल ग्रॉसी अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के प्रमुख हैं। इक्वाडोर की मारिया फर्नांडा एस्पिनोसा संयुक्त राष्ट्र महासभा की पूर्व अध्यक्ष और इक्वाडोर की पूर्व विदेश मंत्री रह चुकी हैं। इक्वाडोर की इवोन बाक़ी और सेनेगल के पूर्व राष्ट्रपति मैकी साल भी इस दौड़ में शामिल हैं। युगांडा के पूर्व विदेश मंत्री ओलारा ओटुनु का नाम भी उम्मीदवारों में रहा है। हालिया स्ट्रॉ पोल के बाद इनमें से कुछ नामों की स्थिति मजबूत या कमजोर हुई है, लेकिन अभी अंतिम तस्वीर तय नहीं हुई है।

इस चुनाव का एक अहम पहलू क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व भी है। संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में अब तक कोई महिला महासचिव नहीं रही है। मौजूदा दौड़ में कई प्रमुख महिला उम्मीदवारों की मौजूदगी ने इस पहलू को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। हालाँकि,उम्मीदवार की नियुक्ति किसी एक क्षेत्रीय या लैंगिक मानदंड के आधार पर नहीं होती। अंतिम फैसला सदस्य देशों के राजनीतिक समर्थन, सुरक्षा परिषद की सहमति और स्थायी सदस्यों की स्वीकार्यता के बीच संतुलन पर निर्भर करता है।

अमेरिका और चीन की भूमिका इस पूरी प्रक्रिया में विशेष महत्व रखती है। दोनों देश सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य हैं और उनके पास वीटो अधिकार है। ऐसे में किसी भी उम्मीदवार को अंतिम चरण तक पहुँचने के लिए दोनों समेत सभी स्थायी सदस्यों की आपत्तियों को ध्यान में रखना होगा। यही कारण है कि स्ट्रॉ पोल में कुल समर्थन के साथ-साथ यह देखना भी महत्वपूर्ण है कि किसी उम्मीदवार को स्थायी सदस्यों की ओर से विरोध का सामना तो नहीं करना पड़ रहा।

चीन ने महासचिव पद के उम्मीदवारों के साथ बातचीत भी की है। चीनी विदेश मंत्रालय के अनुसार, विदेश मंत्री वांग यी ने जून में रेबेका ग्रिन्सपैन और मारिया फर्नांडा एस्पिनोसा के साथ अलग-अलग बैठकें की थीं। इन बैठकों में बहुपक्षवाद और संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को मजबूत करने की आवश्यकता पर चर्चा हुई थी। इससे यह स्पष्ट होता है कि प्रमुख शक्तियाँ उम्मीदवारों की प्राथमिकताओं और उनके दृष्टिकोण को समझने के लिए पहले से संपर्क कर रही हैं।

दूसरी ओर,संयुक्त राष्ट्र इस समय गंभीर वित्तीय दबाव का सामना कर रहा है। संगठन के सामने सदस्य देशों से मिलने वाले योगदान में देरी,संसाधनों की कमी और प्रशासनिक खर्च को लेकर लगातार चुनौतियां बनी हुई हैं। अमेरिका लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र का सबसे बड़ा वित्तीय योगदानकर्ता रहा है,लेकिन मौजूदा अमेरिकी प्रशासन ने संगठन की फंडिंग और कार्यप्रणाली में बदलाव की मांग की है। इसके तहत संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न एजेंसियों के कामकाज की समीक्षा, प्रशासनिक ढाँचे को सरल बनाने और संसाधनों के इस्तेमाल में बदलाव पर जोर दिया जा रहा है।

‘यूएन80’ पहल के तहत भी संयुक्त राष्ट्र के कामकाज में सुधार को लेकर चर्चा चल रही है। इसका उद्देश्य संगठन को अधिक प्रभावी बनाने,अनावश्यक प्रशासनिक बोझ कम करने और उपलब्ध संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल सुनिश्चित करना है। ऐसे में नए महासचिव के सामने केवल राजनीतिक और कूटनीतिक चुनौतियाँ ही नहीं होंगी,बल्कि संगठन की वित्तीय स्थिति और प्रशासनिक सुधार भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ होंगी।

संयुक्त राष्ट्र की वित्तीय स्थिति का संबंध उसकी वैश्विक भूमिका से भी जुड़ा है। संगठन को शांति अभियानों, मानवीय सहायता, विकास कार्यक्रमों, स्वास्थ्य, जलवायु और अन्य क्षेत्रों में बड़े स्तर पर काम करना पड़ता है। इसके लिए पर्याप्त और समय पर वित्तीय संसाधनों की जरूरत होती है। ऐसे में अगले महासचिव को सदस्य देशों के बीच संसाधनों और जिम्मेदारियों को लेकर सहमति बनाने की चुनौती का सामना करना पड़ेगा।

अगले महासचिव के सामने वैश्विक स्तर पर कई गंभीर संकट भी होंगे। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष, जलवायु परिवर्तन, वैश्विक स्वास्थ्य संबंधी खतरे और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी नई तकनीकों से जुड़े सवाल संयुक्त राष्ट्र के एजेंडे में प्रमुख बने हुए हैं। इसके अलावा सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों के बीच बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा भी संगठन की निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करती है। कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर परिषद में सहमति नहीं बन पाने के कारण संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को लेकर भी बहस होती रही है।

ऐसे वातावरण में नए महासचिव से सदस्य देश ऐसी कूटनीतिक भूमिका की अपेक्षा करेंगे, जो अलग-अलग शक्तियों और क्षेत्रों के बीच संवाद बनाए रखने में सक्षम हो। उन्हें एक तरफ सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों के बीच मतभेदों से निपटना होगा,वहीं दूसरी तरफ विकासशील देशों, वैश्विक दक्षिण और छोटे देशों की प्राथमिकताओं को भी अंतर्राष्ट्रीय एजेंडे में जगह देनी होगी।

फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि अगला महासचिव कौन होगा। तीसरे स्ट्रॉ पोल के बाद रेबेका ग्रिन्सपैन और कैरोलिन रोड्रिग्स-बिर्केट को अपेक्षाकृत अधिक समर्थन मिला है,लेकिन किसी उम्मीदवार के लिए आवश्यक व्यापक सहमति अभी सामने नहीं आई है। साथ ही चयन प्रक्रिया में आगे और बदलाव की संभावना बनी हुई है। नए उम्मीदवार सामने आ सकते हैं और मौजूदा उम्मीदवारों में से कुछ अपनी दावेदारी वापस भी ले सकते हैं।

अंततः महासचिव का नाम सुरक्षा परिषद की औपचारिक सिफारिश के जरिए सामने आएगा। इसके लिए कम-से-कम नौ सदस्यों का समर्थन और पाँच स्थायी सदस्यों की ओर से वीटो का अभाव आवश्यक होगा। उसके बाद महासभा नियुक्ति की औपचारिक प्रक्रिया पूरी करेगी। मौजूदा घटनाक्रम को देखते हुए आने वाले महीनों में कूटनीतिक बातचीत, उम्मीदवारों के बीच समर्थन का पुनर्गठन और स्थायी सदस्यों की सहमति इस चुनाव की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। एंतोनियो गुटेरेस का कार्यकाल समाप्त होने से पहले नए महासचिव के नाम पर सहमति बनाना संयुक्त राष्ट्र के लिए अगले नेतृत्व की शुरुआत की तैयारी का अहम चरण होगा।