नीरव मोदी (तस्वीर क्रेडिट@BeingArun28)

नीरव मोदी को लंदन हाईकोर्ट से बड़ा झटका,प्रत्यर्पण के खिलाफ याचिका खारिज

नई दिल्ली/लंदन, 26 मार्च (युआईटीवी)- भगोड़े हीरा कारोबारी नीरव मोदी को एक बार फिर बड़ा कानूनी झटका लगा है। लंदन स्थित हाईकोर्ट की किंग्स बेंच डिवीजन ने भारत में उनके प्रत्यर्पण आदेश के खिलाफ कार्यवाही दोबारा शुरू करने की उनकी याचिका को खारिज कर दिया है। इस फैसले के साथ ही नीरव मोदी के लिए ब्रिटेन में कानूनी राहत पाने की संभावनाएँ और सीमित हो गई हैं और भारत प्रत्यर्पण की प्रक्रिया को मजबूती मिली है।

इस मामले में ब्रिटेन की अदालत में सुनवाई के दौरान क्राउन अभियोजन सेवा के वकील ने भारत का पक्ष मजबूती से रखा। इस पूरी कानूनी प्रक्रिया में केंद्रीय जाँच ब्यूरो की एक विशेष टीम ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। टीम में वे जाँच अधिकारी भी शामिल थे,जो सुनवाई में सहयोग देने के लिए विशेष रूप से लंदन पहुँचे थे। सीबीआई अधिकारियों ने अदालत में नीरव मोदी के दावों का विस्तार से खंडन करते हुए ठोस साक्ष्य और तर्क प्रस्तुत किए।

नीरव मोदी की ओर से यह याचिका ब्रिटेन के एक अन्य चर्चित मामले,यानी संजय भंडारी से जुड़े फैसले के आधार पर दायर की गई थी। भंडारी मामले में ब्रिटिश हाईकोर्ट ने मानवीय आधार पर प्रत्यर्पण को रोक दिया था,क्योंकि उन्होंने यह तर्क दिया था कि भारत लौटने पर उन्हें यातना का सामना करना पड़ सकता है। इसी मिसाल का हवाला देते हुए नीरव मोदी ने भी दावा किया कि भारत प्रत्यर्पित किए जाने पर उनके साथ अमानवीय व्यवहार हो सकता है।

हालाँकि,अदालत ने इस तर्क को पर्याप्त नहीं माना। किंग्स बेंच डिवीजन ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि नीरव मोदी द्वारा प्रस्तुत किए गए आधार ऐसे नहीं हैं,जो मामले को दोबारा खोलने के लिए आवश्यक “असाधारण परिस्थितियों” की श्रेणी में आते हों। अदालत ने यह भी कहा कि पहले दिए गए प्रत्यर्पण आदेश में किसी प्रकार की कानूनी त्रुटि या नई परिस्थिति सामने नहीं आई है,जिसके आधार पर पुनर्विचार किया जा सके।

यह फैसला न केवल नीरव मोदी के लिए बड़ा झटका है,बल्कि भारत की जाँच एजेंसियों के लिए भी एक महत्वपूर्ण सफलता माना जा रहा है। लंबे समय से भारत सरकार और जाँच एजेंसियाँ उन्हें देश वापस लाने के प्रयास कर रही हैं,ताकि उन पर चल रहे मामलों की सुनवाई भारत में हो सके।

गौरतलब है कि नीरव मोदी पंजाब नेशनल बैंक से जुड़े बहुचर्चित घोटाले के मुख्य आरोपी हैं। उन पर आरोप है कि उन्होंने बैंक के नाम पर फर्जी गारंटी (लेटर ऑफ अंडरटेकिंग) जारी कराकर विदेशी बैंकों से भारी भरकम ऋण प्राप्त किया। इस घोटाले की राशि हजारों करोड़ रुपये बताई जाती है,जिसने भारतीय बैंकिंग प्रणाली को बड़ा झटका दिया था।

सीबीआई द्वारा जाँच शुरू किए जाने से ठीक पहले,नीरव मोदी जनवरी 2018 में भारत छोड़कर फरार हो गए थे। इसके बाद 2019 में उन्हें यूनाइटेड किंगडम में गिरफ्तार किया गया। तब से वे वहाँ की जेल में बंद हैं और लगातार अपने प्रत्यर्पण को रोकने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं।

ब्रिटिश अदालतों ने पहले ही उनके प्रत्यर्पण को मंजूरी दे दी थी और भारत सरकार द्वारा दिए गए आश्वासनों को स्वीकार किया था। इन आश्वासनों में यह सुनिश्चित किया गया था कि भारत में उन्हें न्यायिक प्रक्रिया के तहत निष्पक्ष सुनवाई मिलेगी और उनके साथ अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप व्यवहार किया जाएगा। इन आधारों पर अदालत ने पहले भी उनकी कई अपीलों को खारिज कर दिया था।

हालिया फैसले में अदालत ने यह भी संकेत दिया कि केवल किसी अन्य मामले के आधार पर समान परिस्थितियों का दावा करना पर्याप्त नहीं होता,जब तक कि ठोस और विशिष्ट साक्ष्य प्रस्तुत न किए जाएँ। इस प्रकार,संजय भंडारी मामले का हवाला नीरव मोदी के लिए कारगर साबित नहीं हुआ।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले के बाद नीरव मोदी के पास कानूनी विकल्प काफी सीमित रह गए हैं। हालाँकि,वे अब भी कुछ अंतिम कानूनी उपायों का सहारा ले सकते हैं, लेकिन इस निर्णय ने उनके प्रत्यर्पण की राह को और स्पष्ट कर दिया है।

भारत में इस फैसले को एक बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है। इससे यह संदेश जाता है कि आर्थिक अपराधों में शामिल लोगों को न्याय से बचने का मौका नहीं मिलेगा,चाहे वे विदेश में ही क्यों न छिपे हों। यह फैसला उन सभी मामलों के लिए भी महत्वपूर्ण है,जहाँ भारत भगोड़ों को वापस लाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की अपेक्षा करता है।

लंदन हाईकोर्ट का यह निर्णय नीरव मोदी के खिलाफ चल रही कानूनी प्रक्रिया में एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि उन्हें कब भारत प्रत्यर्पित किया जाता है और यहाँ की अदालतों में उनके खिलाफ चल रहे मामलों का क्या निष्कर्ष निकलता है।