नेपाल में बाढ़

‘दान नहीं, बल्कि नैतिक ज़िम्मेदारी’—नेपाल ने रसुवा में अचानक आई बाढ़ के लिए चीन, अमेरिका और भारत से मुआवज़े की माँग की

नई दिल्ली,4 सितंबर (युआईटीवी)- चीन,अमेरिका और भारत जैसे ज़्यादा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन करने वाले देशों से जलवायु-संबंधी मुआवज़े की अपनी माँग को नेपाल ने और तेज़ कर दिया है। यह कदम देश के रसुवा ज़िले में आई विनाशकारी अचानक बाढ़ और ग्लेशियर से जुड़ी आपदा के बाद उठाया गया है। नेपाल का कहना है कि उसे जिस मदद की ज़रूरत है,उसे सिर्फ़ मानवीय दान के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए,बल्कि जलवायु परिवर्तन के असमान असर से पैदा हुई व्यापक नैतिक और कानूनी ज़िम्मेदारी के हिस्से के तौर पर देखा जाना चाहिए।

नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल का कहना है कि हिमालयी देश ग्लोबल ग्रीनहाउस-गैस उत्सर्जन में बहुत कम योगदान देता है,फिर भी उसे जलवायु परिवर्तन के कारण सबसे गंभीर नतीजों का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि नेपाल को एक ऐसे वैश्विक संकट का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है,जिसे पैदा करने में उसकी भूमिका न के बराबर थी।

यह देश बढ़ते तापमान,ग्लेशियर के पिघलने,पहाड़ों की अस्थिर ढलानों और मौसम की चरम घटनाओं के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील है। खनाल के अनुसार,विनाशकारी बाढ़ यह दिखाती है कि संवेदनशील देशों को केवल आपातकालीन राहत से कहीं अधिक की आवश्यकता है और उन्हें जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले दीर्घकालिक नुकसान और क्षति के लिए सहायता मिलनी चाहिए।

अगस्त के आखिर में हुई इस तबाही की वजह हिमालयी इलाके में ग्लेशियर का टूटना और बर्फ,चट्टान,कीचड़ और पानी का ज़बरदस्त बहाव था। चीन के साथ नेपाल की सीमा के पास बसा रसुवा ज़िला सबसे ज़्यादा प्रभावित इलाकों में से एक था।

इस बाढ़ ने घरों,सड़कों,पुलों और ज़रूरी बुनियादी ढाँचों को तबाह कर दिया,साथ ही कई पनबिजली परियोजनाओं को भी भारी नुकसान पहुँचाया। पनबिजली परियोजनाओं की सुरंगों में सैकड़ों कर्मचारियों के फँसे होने या लापता होने की खबर मिली,जिससे बचाव कार्य बहुत मुश्किल हो गया। इस बड़ी तबाही में 1,000 से ज़्यादा लोगों की मौत की खबर है और हज़ारों लोग अभी भी लापता हैं,जबकि बचाव और राहत का काम जारी है।

नेपाल ने खास तौर पर चीन,भारत और अमेरिका का ज़िक्र किया है क्योंकि ये देश दुनिया में सबसे ज़्यादा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जित करने वाले देशों में शामिल हैं। काठमांडू का तर्क ‘जलवायु न्याय’ के सिद्धांत पर आधारित है: जिन देशों ने वैश्विक उत्सर्जन में बड़ी भूमिका निभाई है, उन्हें उन देशों की मदद में ज़्यादा योगदान देना चाहिए जो जलवायु से जुड़ी आपदाओं से बुरी तरह प्रभावित होते हैं।

नेपाल का यह कहना नहीं है कि रसुवा में आई बाढ़ के लिए सीधे तौर पर ये देश ज़िम्मेदार हैं। बल्कि,सरकार जलवायु से जुड़ी आपदाओं के बार-बार आने और उनकी गंभीरता को ग्लोबल वार्मिंग से जोड़ रही है और ज़्यादा उत्सर्जन करने वाले प्रमुख देशों से ज़्यादा वित्तीय ज़िम्मेदारी उठाने की माँग कर रही है।

मुआवज़े की माँग के साथ-साथ नेपाल ने अंतर्राष्ट्रीय मदद के लिए आभार भी जताया है। प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह ने आपदा के बाद तुरंत मदद के लिए भारत और चीन का धन्यवाद किया और कहा कि उनकी सरकार मदद और रिकवरी के कामों में तेज़ी लाने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ मिलकर काम कर रही है।

भारत और चीन बचाव और राहत कार्यों में भी शामिल रहे हैं। चीन और भारत के विशेषज्ञों ने क्षतिग्रस्त पनबिजली संयंत्रों में फँसे लोगों की तलाश कर रही नेपाली टीमों की मदद की है।

काठमांडू की व्यापक माँग अंतर्राष्ट्रीय “नुकसान और क्षति” फ्रेमवर्क से जुड़ी है,जो जलवायु परिवर्तन के कारण गंभीर और कभी न ठीक होने वाले नुकसान का सामना कर रहे देशों के लिए आर्थिक मदद की वकालत करता है।

नेपाल अब केवल तत्काल भोजन,चिकित्सा और बचाव कार्य से आगे की सोच रहा है और आपदा से प्रभावित बुनियादी ढाँचे और समुदायों के पुनर्निर्माण के लिए अंतर्राष्ट्रीय मदद चाहता है। पुनर्निर्माण की लागत अरबों डॉलर तक पहुँच सकती है,जिससे सीमित आर्थिक संसाधनों वाले देश पर और अधिक दबाव पड़ेगा।

नेपाल की इस माँग से उस व्यापक वैश्विक बहस को और बल मिलने की संभावना है कि जब कमज़ोर देश लगातार विनाशकारी जलवायु आपदाओं का सामना करते हैं,तो इसकी कीमत किसे चुकानी चाहिए। काठमांडू के लिए,रसुवा की आपदा केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं है,बल्कि हिमालयी समुदायों के सामने बढ़ते खतरों की एक चेतावनी भी है।

साथ ही,इस आपदा ने मज़बूत क्षेत्रीय सहयोग की ज़रूरत को भी उजागर किया है। नेपाल चीन से ग्लेशियर की गतिविधियों और ऊपरी इलाकों में जल स्तर के बारे में बेहतर और तत्काल जानकारी (रियल-टाइम जानकारी) चाहता है,जबकि चीन-नेपाल सीमा पर शुरुआती चेतावनी देने वाले बुनियादी ढाँचे को फिर से बनाने की योजनाएँ भी तैयार की जा रही हैं।

अभी सबसे ज़रूरी काम बचे हुए लोगों को बचाना,लापता लोगों का पता लगाना और ज़रूरी बुनियादी ढाँचे को बहाल करना है। लेकिन मुआवज़े की नेपाल की माँग यह संकेत देती है कि राहत और पुनर्निर्माण के साथ-साथ,जलवायु से जुड़ी जवाबदेही भी हिमालयी आपदाओं के प्रति उसकी कूटनीतिक प्रतिक्रिया का एक अहम हिस्सा बनती जा रही है।