मुंबई,11 सितंबर (युआईटीवी)- भारत के वित्तीय बाजार में तकनीक आधारित बदलाव को नई दिशा देते हुए भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा और भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड के अध्यक्ष तुहिन कांत पांडे ने गुरुवार को ग्लोबल फिनटेक फेस्ट 2026 के दौरान देश के पहले टोकनाइज्ड कॉरपोरेट बॉन्ड पायलट कार्यक्रम की शुरुआत की। इस पहल को वित्तीय बाजारों में ब्लॉकचेन तकनीक और केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा यानी डिजिटल रुपए के इस्तेमाल की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है। इस व्यवस्था के जरिए प्रतिभूतियों के लेनदेन और उनके निपटान को अधिक आधुनिक,पारदर्शी और तकनीक आधारित बनाने की कोशिश की जा रही है।
पायलट परियोजना के शुरुआती चरण में कॉरपोरेट बॉन्ड को शामिल किया गया है। इसके तहत टोकनाइज्ड प्रतिभूतियों और परिसंपत्तियों के निपटान में ब्लॉकचेन तकनीक के साथ डिजिटल रुपए का इस्तेमाल किया जाएगा। टोकनाइजेशन की प्रक्रिया में किसी वित्तीय परिसंपत्ति का डिजिटल स्वरूप तैयार किया जाता है,जिसे निर्धारित तकनीकी ढांचे के भीतर लेनदेन और निपटान के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे वित्तीय बाजार में लेनदेन की प्रक्रिया को अधिक कुशल बनाने और उसके अलग-अलग चरणों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने की संभावनाएँ पैदा होती हैं।
फिलहाल यह प्रयोग कॉरपोरेट बॉन्ड तक सीमित रहेगा,लेकिन भविष्य में इसके दायरे को बढ़ाने की संभावना है। इसके तहत शेयर, म्यूचुअल फंड की यूनिट और इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रिसीप्ट जैसी अन्य वित्तीय परिसंपत्तियों को भी शामिल किया जा सकता है। यदि इस तकनीक का इस्तेमाल व्यापक स्तर पर सफल रहता है,तो इससे वित्तीय परिसंपत्तियों के कारोबार और निपटान की मौजूदा व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
ग्लोबल फिनटेक फेस्ट को संबोधित करते हुए आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि यह आयोजन अब महज उद्योग जगत का सम्मेलन नहीं रह गया है। यह ऐसा मंच बन चुका है, जहाँ वित्तीय क्षेत्र से जुड़े विभिन्न पक्ष भविष्य की वित्तीय व्यवस्था को आकार देने वाले विचारों, तकनीकों और संभावनाओं पर चर्चा करते हैं। उनके मुताबिक, वित्तीय क्षेत्र में तेजी से हो रहे तकनीकी बदलाव के बीच भारत के सामने डिजिटल वित्त को और अधिक व्यापक तथा समावेशी बनाने का अवसर है।
उन्होंने भारत में डिजिटल वित्तीय परिवर्तन की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए कहा कि देश में वित्तीय सेवाओं की पहुंच पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ी है। प्रधानमंत्री जन धन योजना के तहत अब करीब 57 करोड़ खाते हैं। इसके अलावा लगभग 25 करोड़ सूक्ष्म बीमा पॉलिसियां और अटल पेंशन योजना के तहत करीब 9 करोड़ लाभार्थी जुड़े हुए हैं। डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में भी भारत ने बड़ी प्रगति की है और यूपीआई पर लगभग 80 करोड़ लेनदेन दर्ज किए जा रहे हैं।
मल्होत्रा ने कहा कि इन आँकडों की अहमियत केवल इनके बड़े पैमाने में नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि डिजिटल वित्त अब आम लोगों के रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बन चुका है। बैंकिंग,भुगतान, बीमा और अन्य वित्तीय सेवाओं तक पहुँच पहले की तुलना में अधिक आसान हुई है। सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के बीच सहयोग ने इस बदलाव को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
आरबीआई गवर्नर के अनुसार, भारत में डिजिटल वित्तीय व्यवस्था के विस्तार ने वित्तीय समावेशन को मजबूत करने के लिए नई संभावनाएँ पैदा की हैं। अब अगली चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि वित्तीय सेवाएँ प्रत्येक व्यक्ति को जरूरत के समय और उसकी सुविधा के अनुसार उपलब्ध हों। उनका जोर ऐसी व्यवस्था विकसित करने पर रहा जिसमें लोगों को बैंकिंग और अन्य वित्तीय सेवाओं के लिए भौगोलिक या प्रक्रियागत बाधाओं का सामना न करना पड़े।
उन्होंने कहा कि महिलाओं, छोटे कारोबारियों, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों और किसानों तक छोटे ऋण की पहुँच बढ़ाना अभी भी एक बड़ी चुनौती है। पारंपरिक वित्तीय संस्थानों के लिए इस वर्ग तक पहुँच बनाने में लागत,जोखिम और दस्तावेजी प्रक्रियाएँ जैसी कई बाधाएँ सामने आती हैं। ऐसे में फिनटेक कंपनियाँ तकनीक की मदद से इन चुनौतियों को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
फिनटेक कंपनियाँ आँकड़ों और डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल करके ग्राहकों की जरूरतों को बेहतर तरीके से समझ सकती हैं। इससे छोटे कारोबारियों और उन लोगों तक वित्तीय सेवाएँ पहुँचाने में मदद मिल सकती है,जो पारंपरिक बैंकिंग व्यवस्था से पूरी तरह नहीं जुड़ पाए हैं। हालाँकि,तकनीक के विस्तार के साथ जोखिम भी बढ़ते हैं और इन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
संजय मल्होत्रा ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि वित्तीय क्षेत्र में नवाचार जितना जरूरी है, उतना ही महत्वपूर्ण लोगों का भरोसा भी है। उनका कहना था कि किसी भी वित्तीय व्यवस्था की सफलता केवल उसकी तकनीकी क्षमता से तय नहीं होती। लोगों को यह विश्वास होना चाहिए कि उनके पैसे, आँकड़े और लेनदेन सुरक्षित हैं। यदि यह भरोसा कमजोर पड़ता है,तो अत्याधुनिक तकनीक के बावजूद किसी नई व्यवस्था को व्यापक स्वीकार्यता हासिल करना मुश्किल होगा।
उन्होंने पारदर्शिता,वित्तीय समावेशन और साइबर सुरक्षा को फिनटेक क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण प्राथमिकताएँ बताया। डिजिटल वित्त के बढ़ते इस्तेमाल के साथ साइबर अपराध,डेटा सुरक्षा और तकनीकी गड़बड़ियों से जुड़े जोखिम भी सामने आते हैं। ऐसे में वित्तीय संस्थानों और फिनटेक कंपनियों को मजबूत सुरक्षा व्यवस्था के साथ काम करना होगा। उपभोक्ताओं को यह भरोसा दिलाना भी जरूरी होगा कि डिजिटल माध्यम से किए जाने वाले उनके लेनदेन सुरक्षित हैं और किसी समस्या की स्थिति में प्रभावी समाधान उपलब्ध है।
मल्होत्रा ने कहा कि भरोसा तैयार होने में वर्षों लगते हैं,लेकिन उसे बहुत कम समय में नुकसान पहुँच सकता है। इसलिए वित्तीय तकनीक के विकास के साथ जिम्मेदारी और सुरक्षा को भी समान महत्व देना होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल तेज और आधुनिक तकनीक तैयार कर लेना पर्याप्त नहीं है। उस तकनीक का इस्तेमाल लोगों के हित में सुरक्षित और भरोसेमंद तरीके से होना भी उतना ही आवश्यक है।
उन्होंने इसे एक उदाहरण के जरिए समझाते हुए कहा कि यदि कोई वित्तीय प्रणाली प्रकाश की गति से काम करती है,लेकिन लोगों का भरोसा हासिल नहीं कर पाती, तो उसे व्यापक स्वीकार्यता नहीं मिलेगी। उनके इस संदेश का सीधा संकेत यह है कि वित्तीय तकनीक का भविष्य केवल गति और सुविधा पर निर्भर नहीं करेगा,बल्कि विश्वास, सुरक्षा और समावेशन भी उसकी सफलता के प्रमुख आधार होंगे।
टोकनाइज्ड कॉरपोरेट बॉन्ड का पायलट इसी व्यापक बदलाव की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयोग है। ब्लॉकचेन और डिजिटल रुपए को प्रतिभूति निपटान से जोड़ने की यह पहल आने वाले समय में वित्तीय बाजार के संचालन के तरीके को बदलने की संभावनाएँ तलाश रही है। यदि पायलट से सकारात्मक परिणाम सामने आते हैं,तो अन्य परिसंपत्तियों तक इसका विस्तार भारत के डिजिटल वित्तीय ढाँचे को और मजबूत कर सकता है। इस तरह आरबीआई और सेबी की यह पहल तकनीकी नवाचार के साथ वित्तीय बाजार में पारदर्शिता,दक्षता और भरोसे को मजबूत करने की दिशा में एक नया अध्याय खोल सकती है।
