अमेरिका-ईरान समझौते से तेल बाजार को राहत, अमेरिका-ईरान तनाव से कच्चे तेल में उछाल (तस्वीर क्रेडिट@rashtra_press)

अमेरिका-ईरान तनाव से कच्चे तेल में उछाल, ब्रेंट 105 डॉलर के पार; वैश्विक महँगाई बढ़ने का खतरा

नई दिल्ली,11 सितंबर (युआईटीवी)- अंतर्राष्ट्रीय कच्चे तेल बाजार में गुरुवार को एक बार फिर जोरदार तेजी देखने को मिली। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने वैश्विक तेल आपूर्ति को लेकर चिंताओं को गहरा कर दिया है। इसके चलते ब्रेंट क्रूड की कीमत 105 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गई। बाजार में तेजी के पीछे केवल भू-राजनीतिक तनाव ही जिम्मेदार नहीं है,बल्कि चीन की मजबूत तेल खरीदारी और सऊदी अरब के उत्पादन में आई भारी गिरावट ने भी कीमतों को ऊपर पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी से दुनिया भर में ऊर्जा लागत बढ़ने और महँगाई पर दबाव बढ़ने की आशंका पैदा हो गई है।

कारोबार के दौरान ब्रेंट क्रूड वायदा में करीब 2.63 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई और कीमत लगभग 104 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुँच गई। इससे पहले पिछले कारोबारी सत्र में भी ब्रेंट क्रूड ने 100 डॉलर प्रति बैरल का महत्वपूर्ण स्तर पार किया था। यह जुलाई के बाद पहली बार था जब वैश्विक तेल बेंचमार्क इस स्तर के ऊपर पहुँचा। मौजूदा तेजी के साथ कच्चे तेल की कीमतें मई के बाद अपने सबसे ऊँचे स्तर पर पहुँच गई हैं। बाजार में यह धारणा मजबूत हो रही है कि यदि पश्चिम एशिया में सैन्य तनाव लंबे समय तक जारी रहता है,तो तेल की कीमतों में और उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।

कच्चे तेल की कीमतों में इस तेजी का असर केवल पेट्रोल और डीजल तक सीमित रहने की आशंका नहीं है। तेल की कीमत बढ़ने से परिवहन,विनिर्माण, बिजली और विभिन्न औद्योगिक गतिविधियों की लागत बढ़ सकती है। इसके अलावा प्राकृतिक गैस और अन्य ऊर्जा उत्पादों की कीमतों पर भी दबाव पड़ सकता है। इससे दुनिया के कई देशों में महँगाई की समस्या और गंभीर हो सकती है। केंद्रीय बैंकों के लिए भी ऐसी स्थिति चुनौतीपूर्ण होगी, क्योंकि ऊर्जा कीमतों में तेजी मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने की कोशिशों को प्रभावित कर सकती है।

पिछले करीब एक सप्ताह में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर तेजी से बढ़ा है। इससे पहले दोनों देशों के बीच अपेक्षाकृत शांत अवधि देखने को मिली थी,लेकिन हाल के घटनाक्रमों ने स्थिति को फिर से तनावपूर्ण बना दिया है। फिलहाल तत्काल समाधान की संभावना कम नजर आ रही है। ईरान की ओर से भी सख्त रुख अपनाया गया है। एक वरिष्ठ ईरानी अधिकारी ने कहा है कि तेहरान अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी के सामने झुकने वाला नहीं है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर अमेरिका ईरानी क्षेत्र पर हमले जारी रखता है,तो ईरान की ओर से जवाबी कार्रवाई और तेज की जा सकती है।

बाजार के लिए चिंता इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि पश्चिम एशिया दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा आपूर्ति क्षेत्रों में शामिल है। इस क्षेत्र में सैन्य संघर्ष बढ़ने की स्थिति में तेल उत्पादन और निर्यात के साथ-साथ समुद्री परिवहन भी प्रभावित हो सकता है। तेल टैंकरों की आवाजाही में बाधा आने या प्रमुख समुद्री मार्गों पर जोखिम बढ़ने से वैश्विक बाजार में आपूर्ति की चिंता और गहरा सकती है। यही वजह है कि किसी भी नए सैन्य घटनाक्रम का सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर देखने को मिल रहा है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयानों ने भी बाजार की चिंता बढ़ाई है। ट्रंप ने संकेत दिया है कि अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनावों के बाद तक भी चल सकता है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि निकट भविष्य में पेट्रोल की कीमतों में बड़ी राहत मिलना मुश्किल हो सकता है। इन बयानों से बाजार में यह धारणा मजबूत हुई है कि मौजूदा संघर्ष जल्द समाप्त होने वाला नहीं है और ऊर्जा बाजार पर इसका दबाव लंबे समय तक बना रह सकता है।

अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष अब सातवें महीने में पहुँच चुका है। दोनों देशों के बीच स्थायी समझौते की कोशिशें सफल नहीं हो सकी हैं। अगस्त के अंत में तनाव दोबारा बढ़ने के बाद खाड़ी क्षेत्र से होने वाली तेल आपूर्ति की सुरक्षा को लेकर चिंताएँ और बढ़ गईं। इससे निवेशकों ने भविष्य में संभावित आपूर्ति बाधाओं को ध्यान में रखते हुए तेल की कीमतों में जोखिम प्रीमियम जोड़ना शुरू कर दिया है।

अगस्त की शुरुआत में दर्ज निचले स्तरों की तुलना की जाए तो ब्रेंट क्रूड की कीमतों में अब तक करीब 30 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो चुकी है। इतनी तेज वृद्धि से संकेत मिलता है कि बाजार भू-राजनीतिक जोखिम को लेकर काफी संवेदनशील बना हुआ है। यदि संघर्ष और लंबा खिंचता है तथा तेल उत्पादन या निर्यात सुविधाओं पर सीधा असर पड़ता है,तो कीमतों में और तेजी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

तेल बाजार पर दबाव बढ़ाने वाला एक और महत्वपूर्ण कारण सऊदी अरब के उत्पादन में आई भारी गिरावट है। गुरुवार को प्रकाशित पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक,अगस्त में सऊदी अरब का तेल उत्पादन घटकर 62 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया। यह वर्ष 2026 का उसका सबसे निचला मासिक उत्पादन स्तर बताया गया है। जुलाई के मुकाबले सऊदी अरब के उत्पादन में करीब 23 प्रतिशत की कमी आई है। दुनिया के प्रमुख तेल उत्पादकों में शामिल सऊदी अरब के उत्पादन में इतनी बड़ी गिरावट ने वैश्विक बाजार में आपूर्ति को लेकर चिंताओं को और बढ़ा दिया है।

सऊदी अरब के उत्पादन में कमी ऐसे समय आई है,जब यमन के ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों की गतिविधियाँ भी क्षेत्रीय ऊर्जा सुरक्षा के लिए चिंता का कारण बनी हुई हैं। हूती समूह ने सऊदी अरब के पश्चिमी तट से होने वाली तेल आपूर्ति को निशाना बनाने की धमकी दी है। यदि इस तरह के हमले या हमले की आशंकाएँ बढ़ती हैं,तो तेल परिवहन की सुरक्षा पर असर पड़ सकता है। इससे सऊदी अरब के उन निर्यात मार्गों पर भी दबाव बढ़ सकता है,जिन्हें होर्मुज जलडमरूमध्य के वैकल्पिक रास्तों के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है।

चीन की मजबूत तेल खरीदारी भी बाजार में तेजी का एक अहम कारण बनी हुई है। दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा उपभोक्ताओं में शामिल चीन की ओर से मजबूत मांग रहने पर वैश्विक तेल बाजार में उपलब्ध आपूर्ति पर दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में पश्चिम एशिया से जुड़ी आपूर्ति संबंधी चिंताओं और चीन की मजबूत खरीदारी का असर एक साथ दिखाई दे रहा है। इससे बाजार में कीमतों के ऊँचे बने रहने की संभावना बढ़ गई है।

कच्चे तेल की मौजूदा तेजी भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों के लिए भी महत्वपूर्ण चुनौती बन सकती है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल महँगा होने से आयात बिल बढ़ सकता है और इसका असर घरेलू अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। महँगे कच्चे तेल से परिवहन और उत्पादन लागत बढ़ने के साथ महँगाई पर भी दबाव आ सकता है। इसके अलावा रुपये और चालू खाते पर भी अप्रत्यक्ष असर पड़ने की संभावना रहती है। यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक 100 डॉलर से ऊपर बनी रहती हैं,तो ऊर्जा आयात पर निर्भर अर्थव्यवस्थाओं के लिए स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो सकती है।

फिलहाल अंतर्राष्ट्रीय बाजार की नजर अमेरिका और ईरान के बीच आगे होने वाले घटनाक्रमों पर टिकी हुई है। यदि दोनों देशों के बीच तनाव कम होता है और बातचीत की कोई ठोस संभावना बनती है,तो कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव कुछ कम हो सकता है। इसके विपरीत सैन्य गतिविधियाँ बढ़ने या तेल आपूर्ति मार्गों पर किसी तरह का सीधा खतरा पैदा होने की स्थिति में कीमतों में और तेज उछाल देखने को मिल सकता है।

कुल मिलाकर,कच्चे तेल की कीमतों में मौजूदा तेजी कई कारकों का परिणाम है। अमेरिका-ईरान तनाव, पश्चिम एशिया में ऊर्जा आपूर्ति को लेकर बढ़ती चिंता, सऊदी अरब के उत्पादन में बड़ी गिरावट और चीन की मजबूत खरीदारी ने बाजार को प्रभावित किया है। ब्रेंट क्रूड का 105 डॉलर के स्तर के पार जाना वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी है। यदि यह तेजी लंबे समय तक बनी रहती है,तो इसका असर केवल ऊर्जा बाजार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि महँगाई , आर्थिक वृद्धि और कंपनियों की लागत पर भी व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।