नई दिल्ली,3 जून (युआईटीवी)- भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई ) की मौद्रिक नीति समिति की तीन दिवसीय बैठक बुधवार से शुरू हो गई है। ऐसे समय में हो रही यह बैठक देश और दुनिया के आर्थिक जगत की निगाहों का केंद्र बनी हुई है,जब पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव,ऊर्जा बाजार में अस्थिरता और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं ने आर्थिक परिदृश्य को जटिल बना दिया है। बैठक के समापन के बाद शुक्रवार को भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा नीतिगत फैसलों की घोषणा करेंगे। विशेषज्ञों और वित्तीय बाजारों की राय है कि केंद्रीय बैंक इस बार रेपो दर में किसी प्रकार का बदलाव नहीं करेगा और मौजूदा ब्याज दरों को बरकरार रख सकता है।
मौद्रिक नीति समिति की यह समीक्षा ऐसे दौर में हो रही है,जब वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंताएँ बढ़ा दी हैं,जिसका सीधा प्रभाव दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ सकता है। भारत जैसे ऊर्जा आयात पर निर्भर देश के लिए तेल की बढ़ती कीमतें महँगाई,व्यापार घाटे और आर्थिक विकास पर दबाव डाल सकती हैं। यही कारण है कि इस बार आरबीआई के फैसले के साथ-साथ उसके आर्थिक दृष्टिकोण और भविष्य के संकेतों पर भी विशेष नजर रहेगी।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि हाल के महीनों में महँगाई की स्थिति अपेक्षाकृत नियंत्रित रहने के बावजूद वैश्विक जोखिमों ने केंद्रीय बैंक के लिए चुनौतियाँ बढ़ा दी हैं। इसलिए आरबीआई फिलहाल सतर्क रुख अपनाना चाहेगा और ब्याज दरों में किसी भी प्रकार के जल्दबाजी वाले बदलाव से बच सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि केंद्रीय बैंक का मुख्य उद्देश्य आर्थिक वृद्धि और मूल्य स्थिरता के बीच संतुलन बनाए रखना होगा।
वैश्विक वित्तीय संस्थानों और शोध एजेंसियों ने भी अनुमान जताया है कि रेपो दर में यथास्थिति बनाए रखी जा सकती है। एचएसबीसी की मुख्य भारत अर्थशास्त्री प्रांजुल भंडारी के अनुसार,निकट भविष्य में भारतीय रिजर्व बैंक ब्याज दरों को स्थिर रखने की नीति अपना सकता है। हालाँकि,उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यदि वैश्विक परिस्थितियाँ और महँगाई का दबाव बढ़ता है,तो केंद्रीय बैंक का रुख पहले की तुलना में अधिक सतर्क और कुछ हद तक सख्त हो सकता है।
भंडारी का कहना है कि वित्तीय बाजार फिलहाल वर्ष 2026 की चौथी तिमाही से सीमित स्तर पर ब्याज दरों में कटौती की संभावना देख रहे हैं। बाजार की धारणा यह नहीं है कि केंद्रीय बैंक निकट भविष्य में आक्रामक मौद्रिक सख्ती करेगा,बल्कि परिस्थितियों के अनुसार संतुलित नीति अपनाएगा। उनका मानना है कि इस बार आरबीआई द्वारा जारी किए जाने वाले संशोधित आर्थिक अनुमानों पर विशेष ध्यान रहेगा,क्योंकि इन्हीं के आधार पर भविष्य की मौद्रिक नीति की दिशा का संकेत मिलेगा।
विशेषज्ञों के अनुसार सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि भारतीय रिजर्व बैंक ऊर्जा क्षेत्र में उत्पन्न जोखिमों का किस प्रकार आकलन करता है। यदि केंद्रीय बैंक अपने कच्चे तेल के औसत मूल्य अनुमान को बढ़ाता है,तो इसका सीधा प्रभाव महँगाई के अनुमान पर पड़ सकता है। वर्तमान परिस्थितियों में यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊँचे स्तर पर बनी रहती हैं,तो उपभोक्ता वस्तुओं और परिवहन लागत में वृद्धि देखने को मिल सकती है,जिससे आम लोगों पर भी असर पड़ेगा।
भंडारी के अनुसार यदि तेल की औसत कीमत का अनुमान बढ़ाया जाता है,तो महँगाई का अनुमान भी पहले के स्तर से बढ़कर लगभग पाँच प्रतिशत तक पहुँच सकता है। यह स्थिति आरबीआई के लिए चुनौतीपूर्ण होगी,क्योंकि केंद्रीय बैंक का प्रमुख लक्ष्य महँगाई को नियंत्रित दायरे में बनाए रखना है। महँगाई में वृद्धि होने पर ब्याज दरों में कटौती की संभावना और कम हो जाती है।
इस बीच केयरएज रेटिंग्स की एक रिपोर्ट ने भी महँगाई को लेकर चिंता व्यक्त की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सामान्य से कम मानसून की आशंका और हाल में ईंधन की खुदरा कीमतों में हुई वृद्धि के कारण महँगाई का दबाव बढ़ सकता है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में मानसून का प्रदर्शन खाद्य कीमतों को प्रभावित करता है। यदि वर्षा सामान्य से कम रहती है,तो कृषि उत्पादन प्रभावित हो सकता है और खाद्य वस्तुओं की कीमतों में तेजी आ सकती है।
रिपोर्ट के अनुसार थोक महँगाई में होने वाली वृद्धि का असर खुदरा महँगाई पर अपेक्षा से अधिक तेजी से दिखाई दे सकता है। पिछले कुछ वर्षों में देखा गया है कि उत्पादन और परिवहन लागत में वृद्धि अंततः उपभोक्ताओं तक पहुँचती है। इससे रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतें बढ़ जाती हैं और आम लोगों की क्रय शक्ति पर असर पड़ता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि वर्तमान समय में महँगाई का प्रमुख कारण माँग में वृद्धि नहीं,बल्कि आपूर्ति पक्ष से जुड़े कारक हैं।
केयरएज रेटिंग्स ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 6.7 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है। हालाँकि,यह अनुमान इस शर्त पर आधारित है कि कच्चे तेल की औसत कीमत लगभग 90 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी रहे। यदि तेल की कीमतों में अधिक वृद्धि होती है,तो आर्थिक विकास की रफ्तार पर असर पड़ सकता है।
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यदि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष लंबा खिंचता है और कच्चे तेल की कीमतें 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच जाती हैं,तो देश की आर्थिक वृद्धि दर घटकर लगभग 6 प्रतिशत रह सकती है। इससे निवेश,उपभोग और औद्योगिक गतिविधियों पर दबाव बढ़ सकता है। साथ ही सरकार और केंद्रीय बैंक दोनों के सामने आर्थिक स्थिरता बनाए रखने की चुनौती भी बढ़ जाएगी।
एसबीआई रिसर्च ने भी अपने आकलन में कहा है कि लगातार बने हुए महँगाई जोखिमों और वैश्विक अनिश्चितताओं को देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक रेपो दर में कोई बदलाव नहीं करेगा। संस्था का मानना है कि केंद्रीय बैंक फिलहाल स्थिति पर नजर बनाए रखेगा और भविष्य के आँकड़ों के आधार पर निर्णय लेगा।
एसबीआई रिसर्च ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर 6.6 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है,जबकि वित्त वर्ष 2025-26 के लिए यह लगभग 7.5 प्रतिशत रह सकती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि ईंधन कीमतों में वृद्धि और वैश्विक आर्थिक झटकों के कारण उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महँगाई कई तिमाहियों तक पाँच प्रतिशत से ऊपर बनी रह सकती है।
वहीं,एमके ग्लोबल फाइनेंशियल सर्विसेज ने भी ब्याज दरों में किसी बदलाव की संभावना से इनकार किया है। ब्रोकरेज फर्म का मानना है कि हाल के दिनों में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में कुछ नरमी आई है और बाहरी आर्थिक परिस्थितियों में भी आंशिक सुधार देखा गया है। इससे भारतीय रिजर्व बैंक को राहत मिली है और उसे ब्याज दरों को स्थिर रखने के लिए अतिरिक्त गुंजाइश प्राप्त हुई है।
ब्रोकरेज का कहना है कि यदि आने वाले महीनों में तेल की कीमतों में और गिरावट आती है तथा पश्चिम एशिया में तनाव कम होता है,तो भारतीय रुपया मजबूत हो सकता है। इससे आयात लागत में कमी आएगी और महँगाई पर दबाव भी घटेगा। ऐसी स्थिति में आरबीआई को लंबे समय तक स्थिर मौद्रिक नीति बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
कुल मिलाकर,मौद्रिक नीति समिति की यह बैठक ऐसे समय हो रही है,जब घरेलू अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत मजबूत दिखाई दे रही है,लेकिन वैश्विक चुनौतियाँ लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे में बाजार और निवेशकों की नजर केवल ब्याज दरों पर नहीं,बल्कि आरबीआई के भविष्य के संकेतों,महँगाई अनुमान,विकास दर के आकलन और वैश्विक जोखिमों पर उसके दृष्टिकोण पर भी टिकी हुई है। शुक्रवार को होने वाली घोषणा से यह स्पष्ट हो जाएगा कि भारतीय रिजर्व बैंक आने वाले महीनों में आर्थिक स्थिरता और विकास के बीच संतुलन बनाने के लिए किस रणनीति को अपनाने जा रहा है।
