वॉशिंगटन,3 जून (युआईटीवी)- अमेरिका ने वैश्विक व्यापार व्यवस्था में जबरन श्रम से जुड़े मुद्दों को लेकर एक बड़ा और संभावित रूप से दूरगामी कदम उठाया है। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय ने 1974 के ट्रेड एक्ट की धारा 301 के तहत भारत सहित 60 देशों और अर्थव्यवस्थाओं पर अतिरिक्त शुल्क लगाने का प्रस्ताव रखा है। यह प्रस्ताव उन देशों के खिलाफ लाया गया है,जिन पर आरोप है कि उन्होंने जबरन श्रम से तैयार उत्पादों के आयात को रोकने के लिए पर्याप्त और प्रभावी कदम नहीं उठाए हैं। यदि यह प्रस्ताव लागू होता है,तो इससे अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संबंधों,निर्यात गतिविधियों और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।
अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय द्वारा जारी बयान के अनुसार,कई देशों में ऐसी व्यवस्थाएँ पर्याप्त रूप से विकसित नहीं हैं,जो यह सुनिश्चित कर सकें कि उनके बाजारों में जबरन श्रम से निर्मित वस्तुओं का प्रवेश न हो। अमेरिका का मानना है कि इस प्रकार के उत्पाद वैश्विक बाजार में निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा को प्रभावित करते हैं और उन देशों तथा कंपनियों को अनुचित लाभ प्रदान करते हैं,जो श्रम मानकों का पालन नहीं करते। इसी आधार पर अमेरिका ने धारा 301 के तहत कार्रवाई का प्रस्ताव तैयार किया है।
धारा 301 अमेरिकी व्यापार कानून का एक महत्वपूर्ण प्रावधान है,जिसके माध्यम से अमेरिका उन विदेशी नीतियों और व्यापारिक प्रथाओं के खिलाफ कदम उठा सकता है,जिन्हें वह अनुचित,भेदभावपूर्ण या अमेरिकी व्यापार हितों के लिए नुकसानदायक मानता है। अतीत में भी अमेरिका इस प्रावधान का उपयोग कई व्यापारिक विवादों में कर चुका है। अब जबरन श्रम के मुद्दे को लेकर इस प्रावधान का उपयोग किए जाने से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि वाशिंगटन इस विषय को वैश्विक व्यापार नीति के केंद्र में रखना चाहता है।
अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि राजदूत जैमीसन ग्रीर ने इस प्रस्ताव का बचाव करते हुए कहा कि अमेरिका के प्रमुख व्यापारिक साझेदार देशों द्वारा जबरन श्रम से बने सामानों के आयात को रोकने में विफल रहना स्वीकार नहीं किया जा सकता। उनके अनुसार,ऐसी स्थिति में अमेरिकी श्रमिकों और उद्योगों को वैश्विक बाजार में असमान प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि यदि कुछ देश सस्ते श्रम या जबरन श्रम से निर्मित वस्तुओं को अपने बाजारों में प्रवेश करने देते हैं,तो इसका असर उन देशों के श्रमिकों पर पड़ता है,जो श्रम अधिकारों और कानूनी मानकों का पालन करते हैं।
ग्रीर ने कहा कि अमेरिका अब इस प्रकार की असमानता को और अधिक समय तक स्वीकार करने के पक्ष में नहीं है। उन्होंने यह भी माना कि कुछ देशों ने जबरन श्रम से बने उत्पादों के आयात को रोकने के लिए शुरुआती कदम उठाए हैं और कुछ व्यापारिक समझौतों के तहत आवश्यक प्रतिबद्धताएँ भी की हैं। हालाँकि,उनका कहना था कि अभी भी वैश्विक स्तर पर बहुत कुछ किया जाना बाकी है और सभी व्यापारिक साझेदारों को यह सुनिश्चित करना होगा कि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार किसी भी रूप में जबरन श्रम को बढ़ावा न दे।
प्रस्तावित योजना के अनुसार,जिन देशों ने जबरन श्रम से निर्मित वस्तुओं के आयात पर प्रतिबंध लगाने की दिशा में कदम उठाए हैं या ऐसे प्रतिबंध लागू करने का वादा किया है, अथवा सीमित स्तर पर कुछ व्यवस्थाएँ लागू की हैं,उन पर 10 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लगाने का प्रस्ताव है। वहीं जिन देशों के बारे में अमेरिका का मानना है कि उन्होंने पर्याप्त कार्रवाई नहीं की है,उन पर 12.5 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लगाया जा सकता है।
भारत को इसी दूसरी श्रेणी में रखा गया है,जिसके कारण भारतीय निर्यातकों और व्यापारिक समुदाय के बीच इस प्रस्ताव को लेकर चिंता बढ़ गई है। यदि यह शुल्क लागू होता है,तो अमेरिका को निर्यात किए जाने वाले कुछ भारतीय उत्पादों की लागत बढ़ सकती है,जिससे उनकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता प्रभावित हो सकती है। अमेरिका भारत का एक प्रमुख व्यापारिक साझेदार है और दोनों देशों के बीच पिछले कुछ वर्षों में व्यापारिक संबंधों में लगातार विस्तार हुआ है। ऐसे में इस प्रस्ताव के संभावित प्रभावों पर विशेष नजर रखी जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रस्ताव केवल आर्थिक कदम नहीं है,बल्कि वैश्विक श्रम मानकों को लेकर अमेरिका की व्यापक रणनीति का हिस्सा भी है। हाल के वर्षों में दुनिया भर में आपूर्ति श्रृंखलाओं की पारदर्शिता,श्रमिक अधिकारों और मानवाधिकारों से जुड़े मुद्दों को लेकर जागरूकता बढ़ी है। कई पश्चिमी देशों ने कंपनियों और आयातकों पर यह जिम्मेदारी डाली है कि वे यह सुनिश्चित करें कि उनके उत्पादों के निर्माण में जबरन श्रम या मानवाधिकार उल्लंघन शामिल न हो।
अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय ने एक विशेष टेक्सटाइल तंत्र का भी प्रस्ताव रखा है। इस व्यवस्था के तहत कुछ देशों से आने वाले कपड़ा और परिधान उत्पादों की एक निर्धारित मात्रा को अपेक्षाकृत कम धारा-301 टैरिफ दर पर अमेरिका में प्रवेश की अनुमति दी जा सकती है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना बताया गया है कि व्यापार पूरी तरह बाधित न हो और उन उद्योगों को कुछ राहत मिल सके,जो श्रम मानकों के अनुपालन की दिशा में प्रयास कर रहे हैं।
यह प्रस्ताव ऐसे समय आया है,जब वैश्विक व्यापार पहले से ही कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। भू-राजनीतिक तनाव,आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान,ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव और संरक्षणवादी नीतियों ने अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को प्रभावित किया है। ऐसे माहौल में अतिरिक्त शुल्क लगाए जाने की संभावना कई देशों के निर्यातकों के लिए नई चुनौतियाँ पैदा कर सकती है।
अमेरिका ने इस प्रस्ताव पर अंतिम निर्णय लेने से पहले सार्वजनिक परामर्श प्रक्रिया शुरू करने का फैसला किया है। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय के अनुसार, 7 जुलाई 2026 को इस विषय पर सार्वजनिक सुनवाई आयोजित की जाएगी। इस दौरान उद्योग जगत,व्यापारिक संगठनों, श्रमिक समूहों और अन्य हितधारकों से सुझाव और टिप्पणियाँ प्राप्त की जाएँगी। इसके बाद प्राप्त प्रतिक्रियाओं का अध्ययन कर अंतिम निर्णय लिया जाएगा।
फिलहाल यह प्रस्ताव चर्चा और समीक्षा के चरण में है,लेकिन इसने वैश्विक व्यापार जगत का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया है। भारत सहित कई देशों के लिए यह एक महत्वपूर्ण विकास है,क्योंकि इससे उनके निर्यात, व्यापारिक रणनीतियों और अमेरिका के साथ आर्थिक संबंधों पर प्रभाव पड़ सकता है। आने वाले सप्ताहों में यह स्पष्ट होगा कि संबंधित देश इस प्रस्ताव पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं और अमेरिका अंतिम रूप से किस दिशा में आगे बढ़ता है। हालाँकि,इतना तय है कि जबरन श्रम और श्रमिक अधिकारों का मुद्दा अब वैश्विक व्यापार नीति में पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर चुका है।
