नई दिल्ली,28 मई (युआईटीवी)- देश की कभी सबसे चर्चित एडटेक कंपनियों में शामिल रही बायजू एक बार फिर गंभीर विवादों के केंद्र में आ गई है। कंपनी के संस्थापक रवींद्रन को सिंगापुर की एक अदालत ने संपत्ति के खुलासे से जुड़े मामले में अदालत की अवमानना का दोषी ठहराते हुए छह महीने जेल की सजा सुनाई है। इस फैसले के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कई लोगों ने इसे भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम के लिए एक बड़ी चेतावनी बताया है,जबकि कुछ लोगों ने बायजू के तेज विस्तार और आक्रामक कारोबारी रणनीति पर सवाल उठाए हैं।
सिंगापुर की अदालत के इस फैसले ने उस कंपनी की मुश्किलों को और बढ़ा दिया है,जिसे कभी भारत के सबसे सफल स्टार्टअप्स में गिना जाता था। बायजू ने ऑनलाइन शिक्षा के क्षेत्र में तेजी से पहचान बनाई थी और महामारी के दौरान इसका विस्तार अभूतपूर्व गति से हुआ था,लेकिन पिछले कुछ वर्षों में कंपनी लगातार वित्तीय संकट,निवेशकों के साथ विवाद,कर्मचारियों की छंटनी और कानूनी मामलों में उलझती चली गई।
रिपोर्टों के अनुसार,अदालत ने रवींद्रन को अधिकारियों के सामने सरेंडर करने,कानूनी खर्चों का भुगतान करने और बीयर इन्वेस्टको प्राइवेट लिमिटेड में अपनी हिस्सेदारी से जुड़े दस्तावेज जमा करने का आदेश दिया है। यह कंपनी एक ऐसी कॉर्पोरेट इकाई बताई जा रही है,जिसके पास संबंधित व्यावसायिक हिस्सेदारी और शेयर मौजूद थे। अदालत का मानना है कि संपत्ति और स्वामित्व से जुड़े जरूरी दस्तावेजों के खुलासे में पर्याप्त सहयोग नहीं किया गया,जिसके कारण अदालत की अवमानना का मामला बना।
इस घटनाक्रम के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर बड़ी संख्या में यूजर्स ने अपनी प्रतिक्रियाएँ दीं। कई लोगों ने इसे एक ऐसे स्टार्टअप की कहानी बताया,जिसने तेजी से सफलता हासिल करने की कोशिश में अपने मूल उद्देश्य को पीछे छोड़ दिया। एक यूजर ने लिखा कि बायजू की शुरुआत बच्चों को बेहतर शिक्षा देने के मकसद से हुई थी,लेकिन बाद में कंपनी अत्यधिक विस्तार और लगातार बढ़ती वैल्यूएशन की दौड़ में फँस गई। उसने कहा कि यह युवाओं और उद्यमियों के लिए एक महत्वपूर्ण केस स्टडी है कि किस तरह अत्यधिक महत्वाकांक्षा और दबाव किसी कंपनी को उसके असली उद्देश्य से दूर ले जा सकता है।
एक अन्य यूजर ने लिखा कि अदालत की अवमानना के लिए जेल की सजा मिलना बेहद गंभीर मामला है। उसके अनुसार,इसका मतलब यह है कि अदालत ने माना कि संस्थापक ने न्यायिक आदेशों का पालन नहीं किया या जरूरी जानकारी छिपाई। उसने कहा कि अब यह मामला केवल कारोबारी विफलता तक सीमित नहीं रह गया है,बल्कि कानूनी और आपराधिक पहलुओं तक पहुँच चुका है।
कुछ लोगों ने सजा की गंभीरता को लेकर भी चर्चा की। एक सोशल मीडिया पोस्ट में कहा गया कि सिंगापुर की अदालत द्वारा लगाया गया आर्थिक दंड काफी बड़ा है,लेकिन छह महीने की जेल की सजा अपेक्षाकृत कम मानी जा सकती है। वहीं कुछ यूजर्स ने यह सवाल भी उठाया कि बायजू को आखिर एक टेक्नोलॉजी कंपनी के रूप में कैसे पेश किया गया,जबकि उसका मुख्य काम ट्यूशन और अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराना था।
रवींद्रन ने इस पूरे मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि यह केवल एक प्रक्रियात्मक विवाद है और इसे गलत तरीके से पेश किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि यह मामला दस्तावेजों के खुलासे से जुड़ी कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है और इसमें धोखाधड़ी या किसी वित्तीय अपराध का कोई ठोस आरोप नहीं लगाया गया है। उन्होंने कहा कि उन्हें 15 जून को अदालत में पेश होने का निर्देश दिया गया है और उनके पास फैसले के खिलाफ अपील करने के विकल्प उपलब्ध हैं।
रवींद्रन ने यह भी दावा किया कि कर्ज देने वाली संस्थाएँ,जिनमें जीएलएएस ट्रस्ट और कतर निवेश प्राधिकरण शामिल हैं,पहले से ही संस्थापकों के साथ समझौते पर बातचीत कर रही हैं। उनके अनुसार,सिद्धांत रूप में समझौता लगभग तय हो चुका है और केवल कुछ छोटे मुद्दों पर सहमति बननी बाकी है। उन्होंने आरोप लगाया कि जब समझौते की दिशा में बातचीत चल रही है,तब इस मामले को भ्रामक तरीके से पेश किया जा रहा है।
उन्होंने यह भी कहा कि न तो उन्हें और न ही अन्य संस्थापकों को विवादित फंड का कोई व्यक्तिगत लाभ मिला है। उनके मुताबिक,कंपनी और निवेशकों के बीच चल रहे विवाद को व्यक्तिगत लाभ के रूप में प्रस्तुत करना गलत है। हालाँकि,अदालत के फैसले और निवेशकों की कानूनी कार्रवाई ने बायजू के भविष्य को लेकर नई अनिश्चितता पैदा कर दी है।
रिपोर्टों के अनुसार,सिंगापुर में कानूनी कार्रवाई कतर निवेश प्राधिकरण की एक सहयोगी कंपनी द्वारा शुरू की गई थी। यह निवेश उस समय किया गया था,जब बायजू अपने कारोबारी ढाँचे में बड़े बदलाव कर रही थी और लागत कम करने के लिए कर्मचारियों की छंटनी तथा पुनर्गठन की प्रक्रिया से गुजर रही थी।
बायजू का पतन भारतीय स्टार्टअप जगत में सबसे चर्चित घटनाओं में से एक बन गया है। कुछ साल पहले तक कंपनी को भारत का सबसे मूल्यवान एडटेक स्टार्टअप माना जाता था। महामारी के दौरान ऑनलाइन शिक्षा की माँग बढ़ने के साथ कंपनी ने तेजी से विस्तार किया। इस दौरान उसने कई कंपनियों का अधिग्रहण किया और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश की। लेकिन अत्यधिक विस्तार,बढ़ते कर्ज और निवेशकों के साथ विवादों ने धीरे-धीरे कंपनी की वित्तीय स्थिति को कमजोर कर दिया।
विशेषज्ञों का मानना है कि बायजू का मामला भारतीय स्टार्टअप इकोसिस्टम के लिए एक बड़ा सबक है। उनका कहना है कि केवल तेज ग्रोथ और ऊंची वैल्यूएशन पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय कंपनियों को टिकाऊ कारोबारी मॉडल,पारदर्शिता और वित्तीय अनुशासन पर अधिक ध्यान देना चाहिए। कई विश्लेषकों ने यह भी कहा कि निवेशकों और स्टार्टअप संस्थापकों के बीच पारदर्शी संबंध और जवाबदेही की कमी अक्सर ऐसे संकटों को जन्म देती है।
यह घटनाक्रम दिसंबर 2025 में डेलावेयर कोर्ट द्वारा दिए गए उस फैसले के कुछ महीनों बाद सामने आया है,जिसमें अदालत ने रवींद्रन के खिलाफ दिए गए अपने पहले के एक अरब डॉलर के फैसले को पलट दिया था। अदालत ने यह फैसला नए तथ्यों और दस्तावेजों की समीक्षा के बाद लिया था। हालाँकि,अब सिंगापुर की अदालत के नए आदेश ने एक बार फिर बायजू और उसके संस्थापकों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
फिलहाल यह मामला केवल एक कंपनी के कानूनी विवाद तक सीमित नहीं माना जा रहा,बल्कि इसे भारतीय स्टार्टअप संस्कृति,निवेश मॉडल और तेज विस्तार की रणनीति से जुड़े व्यापक सवालों के रूप में देखा जा रहा है। आने वाले दिनों में अदालत की आगे की कार्यवाही और निवेशकों के साथ संभावित समझौते पर सभी की नजर रहेगी।
