कोलंबो,1 अगस्त (युआईटीवी)- श्रीलंका के इतिहास के सबसे भीषण आतंकी हमलों में से एक माने जाने वाले वर्ष 2019 के ईस्टर संडे सीरियल बम धमाकों के मामले में एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सामने आया है। तीन न्यायाधीशों वाली हाईकोर्ट की विशेष पीठ ने तत्कालीन पुलिस महानिरीक्षक (आईजीपी) पुजित जयसुंदरा को अपने संवैधानिक और प्रशासनिक दायित्वों का गंभीर उल्लंघन करने का दोषी मानते हुए मौत की सजा सुनाई है। अदालत ने कहा कि उनके पास हमलों से पहले स्पष्ट खुफिया चेतावनियाँ मौजूद थीं,लेकिन उन्होंने समय रहते कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की,जिसके कारण सैकड़ों निर्दोष लोगों की जान चली गई। अदालत के अनुसार यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं थी,बल्कि ऐसी गंभीर लापरवाही थी जिसने देश की सुरक्षा व्यवस्था को पूरी तरह विफल साबित किया।
यह फैसला शुक्रवार को विशेष पीठ द्वारा सुनाया गया। न्यायाधीश प्रियंता लियानागे और न्यायाधीश तिलकरत्ने बंडारा ने बहुमत से फैसला सुनाते हुए जयसुंदरा को दोषी ठहराया, जबकि न्यायाधीश विराज वीरासूर्या ने इस निर्णय से असहमति जताते हुए अलग फैसला दिया। बहुमत के निर्णय में कहा गया कि तत्कालीन पुलिस प्रमुख के रूप में जयसुंदरा की पहली जिम्मेदारी देश के नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना थी,लेकिन उन्होंने इस जिम्मेदारी का निर्वहन करने में गंभीर लापरवाही बरती।
अदालत ने अपने विस्तृत फैसले में कहा कि 20 अप्रैल 2019 की शाम, यानी हमलों से एक दिन पहले,तत्कालीन स्टेट इंटेलिजेंस सर्विस के निदेशक निलंता जयवर्धने ने जयसुंदरा को स्पष्ट रूप से आगाह किया था कि अगले दिन कैथोलिक चर्चों और पर्यटक होटलों को आत्मघाती हमलों का निशाना बनाया जा सकता है। खुफिया एजेंसियों के पास इस संभावित खतरे से जुड़ी पर्याप्त जानकारी थी और संबंधित अधिकारियों को इसकी सूचना भी दे दी गई थी। इसके बावजूद पुलिस प्रमुख के स्तर पर न तो सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की गई,न ही संवेदनशील स्थानों पर विशेष सतर्कता बरती गई और न ही हमलों को रोकने के लिए कोई प्रभावी रणनीति लागू की गई।
अदालत ने माना कि यदि समय रहते आवश्यक कदम उठाए जाते तो हमलों के प्रभाव को कम किया जा सकता था या उन्हें रोका भी जा सकता था। न्यायालय ने कहा कि अपराधों की रोकथाम और आम नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना पुलिस प्रमुख का संवैधानिक और कानूनी दायित्व था। ऐसे पद पर बैठे अधिकारी से अपेक्षा की जाती है कि वह खुफिया चेतावनियों को अत्यंत गंभीरता से लेते हुए तत्काल कार्रवाई करे,लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं किया गया।
पीठ की अध्यक्षता कर रहे न्यायाधीश प्रियंता लियानागे ने कहा कि जब देश की सुरक्षा से जुड़ी विश्वसनीय जानकारी पहले से उपलब्ध थी,तब संबंधित अधिकारी का निष्क्रिय रहना गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है। अदालत ने जयसुंदरा को अपने कर्तव्यों की घोर उपेक्षा करने के साथ-साथ हत्या में सहायता और उकसावे का दोषी भी करार दिया। न्यायालय का मानना था कि उनकी लापरवाही के कारण हमलावर अपनी योजना को अंजाम देने में सफल रहे और बड़ी संख्या में लोगों की जान चली गई। अपराध की गंभीरता को देखते हुए विशेष पीठ ने उन्हें मौत की सजा सुनाने का निर्णय लिया।
हालाँकि,इस मामले में सभी न्यायाधीश एकमत नहीं थे। न्यायाधीश विराज वीरासूर्या ने अपने अलग फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष जयसुंदरा के खिलाफ लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित करने में सफल नहीं हुआ। उनके अनुसार उपलब्ध साक्ष्य इतने मजबूत नहीं थे कि आरोपी को दोषी ठहराया जा सके। इसी आधार पर उन्होंने जयसुंदरा को सभी आरोपों से बरी करने का मत व्यक्त किया। इसके बावजूद बहुमत का फैसला मान्य होने के कारण मौत की सजा का आदेश प्रभावी माना गया।
इस महत्वपूर्ण मामले में अदालत को पूरा फैसला सुनाने में चार घंटे से अधिक का समय लगा। फैसले के दौरान न्यायाधीशों ने उपलब्ध दस्तावेजों,खुफिया रिपोर्टों,गवाहों के बयान और प्रशासनिक जिम्मेदारियों से जुड़े कानूनी पहलुओं का विस्तार से उल्लेख किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि सुरक्षा से जुड़े मामलों में उच्च पदस्थ अधिकारियों की जवाबदेही तय होना आवश्यक है ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
इसी दिन बाद में अदालत ने वर्ष 2019 के आतंकी हमलों से पहले मिली खुफिया चेतावनियों पर कार्रवाई न करने के मामले में तत्कालीन रक्षा सचिव हेमासिरी फर्नांडो को भी दोषी ठहराया। अदालत ने माना कि रक्षा सचिव के रूप में उनकी भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी थी कि उपलब्ध खुफिया सूचनाओं के आधार पर आवश्यक सुरक्षा उपाय सुनिश्चित किए जाते। ऐसा न करने को अदालत ने गंभीर लापरवाही माना और उन्हें भी मौत की सजा सुनाई।
वर्ष 2019 के ईस्टर संडे आत्मघाती हमले श्रीलंका के इतिहास की सबसे भयावह आतंकी घटनाओं में गिने जाते हैं। 21 अप्रैल 2019 को ईस्टर पर्व के अवसर पर देश के विभिन्न हिस्सों में एक साथ कई आत्मघाती विस्फोट किए गए थे। इन हमलों का मुख्य निशाना कैथोलिक चर्च और विदेशी पर्यटकों से भरे होटल थे। विस्फोटों में 260 से अधिक लोगों की मौत हुई थी,जबकि 500 से अधिक लोग घायल हुए थे। मृतकों में श्रीलंका के नागरिकों के अलावा कई विदेशी नागरिक भी शामिल थे। इस घटना ने पूरे विश्व को झकझोर दिया था और श्रीलंका की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हुए थे।
हमलों के बाद गठित विभिन्न जांच समितियों और आयोगों ने बार-बार इस बात की ओर संकेत किया था कि सुरक्षा एजेंसियों को पहले से संभावित हमलों की जानकारी थी। कई रिपोर्टों में यह भी सामने आया कि विदेशी खुफिया एजेंसियों की ओर से भी श्रीलंका को संभावित खतरे के बारे में चेतावनी दी गई थी। इसके बावजूद संबंधित विभागों के बीच समन्वय की कमी,समय पर निर्णय न लिए जाने और प्रशासनिक लापरवाही के कारण हमलों को रोका नहीं जा सका।
ताजा न्यायिक फैसला श्रीलंका की न्याय व्यवस्था में जवाबदेही तय करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। अदालत ने अपने निर्णय के माध्यम से यह स्पष्ट संदेश दिया है कि यदि कोई वरिष्ठ अधिकारी अपनी जिम्मेदारियों का गंभीर उल्लंघन करता है और उसके परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर जनहानि होती है,तो उसे कानून के दायरे में लाया जाएगा,चाहे उसका पद कितना भी ऊँचा क्यों न रहा हो।
हालाँकि, इस फैसले के बाद आगे की कानूनी प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण होगी। दोषी ठहराए गए अधिकारियों के पास उच्च अदालत में अपील करने का अधिकार है। ऐसे में आने वाले समय में इस मामले की सुनवाई उच्च न्यायिक स्तर पर भी हो सकती है। इसके बावजूद फिलहाल विशेष पीठ का यह फैसला वर्ष 2019 के ईस्टर संडे आतंकी हमलों से जुड़े सबसे महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णयों में शामिल हो गया है और इसे श्रीलंका में प्रशासनिक जवाबदेही तथा राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में एक ऐतिहासिक मिसाल के रूप में देखा जा रहा है।
