भारतीय शेयर बाजार

वैश्विक दबाव के बीच शेयर बाजार में भारी गिरावट,सेंसेक्स 707 अंक टूटा; निफ्टी 23,300 के नीचे,धातु और रियल्टी शेयरों में सबसे ज्यादा बिकवाली

मुंबई,11 सितंबर (युआईटीवी)- भारतीय शेयर बाजार ने शुक्रवार को कमजोर शुरुआत की। घरेलू बाजार पर वैश्विक स्तर पर बने नकारात्मक माहौल और मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव का असर साफ दिखाई दिया। शुरुआती कारोबार में प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स और निफ्टी दोनों में करीब एक प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। बाजार में चौतरफा बिकवाली के कारण बड़े शेयरों के साथ-साथ मझोली और छोटी कंपनियों के शेयरों पर भी दबाव देखने को मिला। निवेशकों की नजर कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और अमेरिकी बॉन्ड प्रतिफल में तेजी पर बनी हुई है, क्योंकि इन दोनों कारकों का असर आने वाले समय में भारतीय अर्थव्यवस्था और कंपनियों की कमाई पर पड़ सकता है।

शुक्रवार सुबह 9 बजकर 16 मिनट पर सेंसेक्स 707 अंक यानी 0.95 प्रतिशत की गिरावट के साथ 74,192 के स्तर पर कारोबार कर रहा था। वहीं, निफ्टी 238 अंक यानी करीब एक प्रतिशत टूटकर 23,238 के स्तर पर पहुँच गया। बाजार खुलते ही बिकवाली का दबाव इतना व्यापक रहा कि अधिकांश प्रमुख क्षेत्रों के सूचकांक लाल निशान में चले गए।

शुरुआती कारोबार में धातु और रियल्टी क्षेत्र सबसे ज्यादा दबाव में नजर आए। निफ्टी धातु और निफ्टी रियल्टी दोनों में दो प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई और ये बाजार के प्रमुख कमजोर क्षेत्रों में शामिल रहे। इसके अलावा निफ्टी इंडिया मैन्युफैक्चरिंग,निफ्टी कंज्यूमर ड्यूरेबल्स,निफ्टी फाइनेंशियल सर्विसेज,निफ्टी ऑटो,निफ्टी कमोडिटीज, निफ्टी प्राइवेट बैंक,निफ्टी पीएसयू बैंक,निफ्टी इंडिया डिफेंस,निफ्टी सर्विसेज,निफ्टी इन्फ्रा,निफ्टी फार्मा और निफ्टी हेल्थकेयर जैसे सूचकांकों में भी कमजोरी रही। इस दौरान केवल निफ्टी आईटी हरे निशान में कारोबार करता नजर आया।

बाजार में दबाव केवल बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं रहा। मझोले और छोटे शेयरों में भी निवेशकों ने जमकर बिकवाली की। निफ्टी मिडकैप 100 सूचकांक 868 अंक यानी 1.40 प्रतिशत की गिरावट के साथ 61,488 पर पहुँच गया। इसी तरह निफ्टी स्मॉलकैप 100 सूचकांक में 284 अंक यानी 1.33 प्रतिशत की कमजोरी रही और यह 19,756 के स्तर पर कारोबार कर रहा था। इससे संकेत मिलता है कि निवेशकों के बीच जोखिम को लेकर सतर्कता बढ़ी हुई है और बाजार में फिलहाल सुरक्षित विकल्पों की तलाश तेज हो गई है।

सेंसेक्स में शामिल कुछ चुनिंदा कंपनियों के शेयरों में खरीदारी देखने को मिली। टेक महिंद्रा, इन्फोसिस, एचसीएल टेक, आईटीसी, भारती एयरटेल, टीसीएस और अदाणी पोर्ट्स बढ़त के साथ कारोबार कर रहे थे। हालाँकि, इन कंपनियों की तेजी बाजार में व्यापक दबाव को दूर करने के लिए पर्याप्त नहीं रही। दूसरी ओर बजाज फाइनेंस, एमएंडएम, अल्ट्राटेक सीमेंट, एक्सिस बैंक, टाटा स्टील, इंडिगो, कोटक महिंद्रा बैंक, एलएंडटी, एचडीएफसी बैंक, टाइटन, इटरनल, सन फार्मा, बजाज फिनसर्व, आईसीआईसीआई बैंक, एनटीपीसी, एशियन पेंट्स और मारुति सुजुकी जैसे शेयरों में गिरावट दर्ज की गई।

भारतीय बाजार में आई इस कमजोरी के पीछे वैश्विक संकेतों की भी अहम भूमिका रही। एशियाई बाजारों में शुक्रवार को ज्यादातर प्रमुख सूचकांक लाल निशान में कारोबार कर रहे थे। टोक्यो, शंघाई, हांगकांग, बैंकॉक, सोल और जकार्ता के बाजारों में कमजोरी रही। इससे भारतीय निवेशकों की धारणा पर भी नकारात्मक असर पड़ा। इससे पहले अमेरिकी शेयर बाजार भी गुरुवार को गिरावट के साथ बंद हुए थे। डॉव जोंस में 0.60 प्रतिशत और नैस्डैक में 0.65 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई थी।

बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक,मध्य पूर्व में बढ़ता तनाव वैश्विक वित्तीय बाजारों के लिए नई चुनौती बनकर उभर रहा है। भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने की स्थिति में कच्चे तेल की आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ सकती है,जिसका सीधा असर तेल की कीमतों पर पड़ता है। ब्रेंट क्रूड की कीमत बढ़कर करीब 108 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गई है। यदि कच्चे तेल की कीमत लंबे समय तक इस ऊँचे स्तर पर बनी रहती है या इसमें और तेजी आती है,तो भारत के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करता है। ऐसे में अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल महँगा होने से देश के आयात बिल पर दबाव बढ़ सकता है। इसका असर चालू खाते, महँगाई और आर्थिक वृद्धि पर पड़ने की आशंका रहती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तेल की ऊँची कीमत लंबे समय तक बनी रही,तो इसका प्रभाव भारत की सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर के साथ-साथ कंपनियों की कमाई पर भी दिखाई दे सकता है। खासतौर पर परिवहन, विनिर्माण और उन क्षेत्रों पर दबाव बढ़ सकता है जिनकी लागत सीधे ऊर्जा कीमतों से जुड़ी है।

बाजार के लिए दूसरी बड़ी चिंता अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी है। 10 साल की अमेरिकी बॉन्ड यील्ड करीब 4.96 प्रतिशत पर पहुँच गई है और पाँच प्रतिशत के महत्वपूर्ण स्तर के बेहद करीब है। वैश्विक निवेशक आमतौर पर अमेरिकी बॉन्ड यील्ड को निवेश के जोखिम और रिटर्न के आकलन में महत्वपूर्ण संकेतक मानते हैं। यील्ड में लगातार तेजी आने पर इक्विटी बाजारों से पूँजी का आकर्षण कम हो सकता है और निवेशक अपेक्षाकृत सुरक्षित परिसंपत्तियों की ओर रुख कर सकते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक शेयर बाजारों में आगे भी अस्थिरता बनी रह सकती है। मौजूदा परिस्थितियों में गिरावट की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता,लेकिन बाजार में बड़ी गिरावट कब आएगी या उसका स्तर कितना होगा, इसका सटीक अनुमान लगाना मुश्किल है। ऐसे में निवेशकों के लिए वैश्विक घटनाक्रम, कच्चे तेल की कीमत और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा। शुक्रवार की कमजोर शुरुआत ने यह संकेत जरूर दे दिया है कि आने वाले दिनों में भारतीय शेयर बाजार को घरेलू कारकों के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय घटनाक्रमों से भी कड़ी चुनौती मिल सकती है।