ममता बनर्जी

चुनाव से पहले प्रशासनिक फेरबदल पर ममता बनर्जी का तीखा विरोध, चुनाव आयोग पर लगाए गंभीर आरोप

कोलकाता, 20 मार्च (युआईटीवी)- पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य में चुनावी माहौल के बीच प्रशासनिक तबादलों को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने गुरुवार को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को एक विस्तृत पत्र लिखकर अपनी नाराजगी जाहिर की। इस पत्र में उन्होंने आदर्श आचार संहिता लागू होने के बाद राज्य के नौकरशाहों और पुलिस अधिकारियों के बड़े पैमाने पर तबादलों और प्रतिनियुक्ति को लेकर गंभीर आपत्ति जताई है।

मुख्यमंत्री ने अपने पत्र में भारत निर्वाचन आयोग पर यह आरोप लगाया कि वह असंवैधानिक तरीके से एक चुनी हुई राज्य सरकार के अधिकारों को कमजोर करने की कोशिश कर रहा है। ममता बनर्जी ने कहा कि चुनाव प्रक्रिया के दौरान भी राज्य की निर्वाचित सरकार का अस्तित्व और उसकी जिम्मेदारियाँ बनी रहती हैं और किसी भी संस्था को उसके कामकाज में इस तरह हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि इस प्रकार के फैसलों से ऐसा माहौल बन सकता है,जो आपातकाल या अप्रत्यक्ष केंद्रीय शासन जैसा प्रतीत हो। मुख्यमंत्री ने इसे बेहद चिंताजनक और दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि इस तरह की कार्रवाइयाँ सहकारी संघवाद की भावना को ठेस पहुँचाती हैं और देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के मूल सिद्धांतों को कमजोर करती हैं। उनके अनुसार,चुनाव आयोग को निष्पक्ष और संतुलित भूमिका निभानी चाहिए,न कि ऐसे निर्णय लेने चाहिए,जो राज्य प्रशासन को अस्थिर कर दें।

ममता बनर्जी ने अपने पत्र में यह भी कहा कि चुनाव आयोग द्वारा लिए गए कई फैसले मनमाने और पक्षपातपूर्ण प्रतीत होते हैं। उन्होंने आयोग को सलाह दी कि वह ऐसे कदमों से बचे,जो जनहित के खिलाफ हों और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के अनुरूप न हों। मुख्यमंत्री का कहना है कि इन फैसलों से प्रशासनिक कार्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है और इससे आम जनता को नुकसान हो सकता है।

उन्होंने विशेष रूप से मार्च और अप्रैल के महीनों का उल्लेख करते हुए कहा कि इस दौरान पश्चिम बंगाल में अक्सर भीषण तूफान और ‘नॉर-वेस्टर्स’ आते हैं,जिनसे जान-माल का भारी नुकसान होता है। ऐसे समय में स्थानीय प्रशासन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। ममता बनर्जी ने तर्क दिया कि जिन अधिकारियों को स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों, जोखिमों और जनसंख्या की जरूरतों की गहरी समझ होती है,वे ही आपदा के समय प्रभावी राहत और बचाव कार्य कर सकते हैं।

मुख्यमंत्री ने चिंता जताई कि यदि ऐसे अधिकारियों को अचानक हटा दिया जाता है या दूसरे राज्यों में भेज दिया जाता है,तो आपातकालीन स्थिति में राहत कार्यों में गंभीर बाधा उत्पन्न हो सकती है। उन्होंने कहा कि यह न केवल प्रशासनिक दृष्टि से अव्यावहारिक है,बल्कि इससे लोगों की सुरक्षा भी खतरे में पड़ सकती है।

इसके अलावा ममता बनर्जी ने यह भी कहा कि पश्चिम बंगाल में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों के लिए अन्य राज्यों से अधिकारियों को बुलाना भी व्यावहारिक नहीं है। उनके अनुसार,बाहर से आने वाले अधिकारियों को राज्य की भौगोलिक स्थिति,भाषा और सामाजिक-सांस्कृतिक संवेदनशीलताओं की पर्याप्त जानकारी नहीं होती,जिससे वे प्रभावी ढंग से अपने दायित्वों का निर्वहन नहीं कर सकते।

उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि यदि इन फैसलों के कारण कानून-व्यवस्था बनाए रखने या प्रशासनिक प्रबंधन में किसी प्रकार की विफलता होती है,तो उसकी पूरी जिम्मेदारी चुनाव आयोग की होगी। मुख्यमंत्री ने यह भी आरोप लगाया कि आयोग संविधान के अनुच्छेद 324 का हवाला देकर अपने अधिकारों का दुरुपयोग कर रहा है और इस आड़ में ऐसे कदम उठा रहा है,जो राज्य को प्रशासनिक अस्थिरता की ओर धकेल सकते हैं।

ममता बनर्जी ने अपने पत्र में इन फैसलों को अभूतपूर्व और एकतरफा करार दिया। उन्होंने कहा कि इस तरह के जल्दबाजी में लिए गए निर्णय एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं। उनके अनुसार,चुनाव आयोग को अपने अधिकारों का इस्तेमाल सावधानी और संतुलन के साथ करना चाहिए,ताकि लोकतांत्रिक संस्थाओं के बीच विश्वास बना रहे।

यह पूरा विवाद ऐसे समय में सामने आया है,जब पश्चिम बंगाल चुनावी प्रक्रिया की ओर बढ़ रहा है और राजनीतिक माहौल पहले से ही गरमाया हुआ है। ऐसे में प्रशासनिक स्तर पर लिए गए फैसलों का असर चुनावी माहौल और शासन व्यवस्था दोनों पर पड़ सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मुद्दे केंद्र और राज्य के बीच संबंधों को भी प्रभावित कर सकते हैं। सहकारी संघवाद की भावना के तहत दोनों पक्षों के बीच बेहतर समन्वय और संवाद की आवश्यकता होती है,लेकिन इस तरह के विवाद उस संतुलन को बिगाड़ सकते हैं।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा उठाए गए सवाल और चुनाव आयोग पर लगाए गए आरोप आने वाले दिनों में एक बड़े संवैधानिक और राजनीतिक बहस का रूप ले सकते हैं। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि चुनाव आयोग इस पर क्या प्रतिक्रिया देता है और क्या दोनों पक्षों के बीच किसी तरह का समाधान निकल पाता है या नहीं।