अंकारा,8 जुलाई (युआईटीवी)- अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान से जुड़े सैन्य अभियान को लेकर एक बार फिर अपने सहयोगी देशों पर तीखी टिप्पणी की है। इस बार उनके निशाने पर इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी रहीं। ट्रंप ने कहा कि ईरान और होर्मुज़ जलडमरूमध्य से जुड़े संकट के दौरान इटली द्वारा अमेरिका का साथ नहीं देना एक बड़ी गलती थी,जिसका असर दोनों नेताओं के व्यक्तिगत संबंधों पर भी पड़ा। उन्होंने स्वीकार किया कि पहले उनके और मेलोनी के बीच बेहद अच्छे संबंध थे,लेकिन इस फैसले के बाद उनमें कुछ खटास आ गई। हालाँकि,उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वह आज भी मेलोनी को एक अच्छी नेता और अच्छी इंसान मानते हैं।
तुर्की की राजधानी अंकारा में आयोजित नाटो शिखर सम्मेलन से पहले राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन के साथ बैठक से पूर्व पत्रकारों से बातचीत करते हुए ट्रंप ने ईरान को लेकर अमेरिका की सैन्य नीति और सहयोगी देशों के रवैये पर विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि अमेरिका ने ईरान से जुड़े हालिया घटनाक्रम में अपने सहयोगी देशों से किसी प्रकार का दबाव डालकर समर्थन नहीं माँगा था,लेकिन कई देशों ने पहले ही स्पष्ट कर दिया कि वे इस अभियान का हिस्सा नहीं बनेंगे। ट्रंप ने कहा कि इस रवैये ने उन्हें निराश किया और इससे यह सवाल भी खड़ा हुआ कि संकट की घड़ी में अमेरिका के सहयोगी कितने भरोसेमंद हैं।
जब पत्रकारों ने ट्रंप से सोशल मीडिया पर इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को लेकर की गई उनकी हालिया टिप्पणी के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि उनके मन में मेलोनी के प्रति व्यक्तिगत सम्मान है। उन्होंने कहा कि वह एक अच्छी इंसान हैं और उन्होंने हमेशा उनके साथ सकारात्मक संबंध बनाए रखने की कोशिश की है। हालाँकि,ट्रंप ने यह भी जोड़ा कि ईरान के मुद्दे पर इटली का निर्णय गलत था और उसी वजह से दोनों नेताओं के संबंध पहले जैसे नहीं रहे।
ट्रंप ने कहा कि उन्होंने मेलोनी पर किसी प्रकार का अत्यधिक दबाव नहीं डाला था। उनके अनुसार अमेरिका केवल यह चाहता था कि उसके सहयोगी देश ईरान और होर्मुज़ जलडमरूमध्य से जुड़े संकट में एकजुटता दिखाएँ,लेकिन इटली ने इस अभियान में शामिल होने से इनकार कर दिया,जिससे उन्हें निराशा हुई। उन्होंने कहा कि यह फैसला दोनों देशों के राजनीतिक संबंधों पर भी प्रभाव डालने वाला साबित हुआ।
अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि उन्हें आज भी जॉर्जिया मेलोनी पसंद हैं और वह उन्हें एक सक्षम नेता मानते हैं,लेकिन उनका मानना है कि इस मामले में उन्होंने सही निर्णय नहीं लिया। ट्रंप के अनुसार यदि सहयोगी देश साझा सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा हैं,तो उन्हें कठिन समय में भी एक-दूसरे का साथ देना चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी भी रणनीतिक साझेदारी की असली परीक्षा संकट के समय ही होती है।
ट्रंप ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य के महत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि यूरोपीय देशों का इस क्षेत्र की स्थिरता में सीधा हित है। उन्होंने कहा कि यूरोप के कई देश मध्य पूर्व से आने वाले तेल पर काफी हद तक निर्भर हैं और उनकी ऊर्जा सुरक्षा इस समुद्री मार्ग से जुड़ी हुई है। इसके बावजूद जब अमेरिका इस क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने के लिए सक्रिय हुआ तो कई यूरोपीय देशों ने उसका समर्थन नहीं किया।
उन्होंने कहा कि अमेरिका की स्थिति यूरोप से अलग है क्योंकि अमेरिका के पास पर्याप्त ऊर्जा संसाधन उपलब्ध हैं। ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिका दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादक देशों में शामिल है और उसे होर्मुज़ जलडमरूमध्य से आने वाले तेल पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि अमेरिका इस क्षेत्र में इसलिए सक्रिय है क्योंकि वह वैश्विक समुद्री व्यापार और अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा को महत्वपूर्ण मानता है,न कि अपनी ऊर्जा जरूरतों के कारण।
ट्रंप ने कहा कि यदि अमेरिका इस क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करता तो अंतर्राष्ट्रीय समुद्री व्यापार पर गंभीर असर पड़ सकता था। उन्होंने दोहराया कि अमेरिका ने यह कदम वैश्विक स्थिरता को ध्यान में रखकर उठाया,लेकिन सहयोगी देशों का अपेक्षित समर्थन नहीं मिला। उनके अनुसार यह स्थिति निराशाजनक रही और इससे यह संदेश गया कि कई सहयोगी देश केवल अमेरिका की सुरक्षा व्यवस्था का लाभ उठाना चाहते हैं,जबकि स्वयं समान जिम्मेदारी निभाने के लिए तैयार नहीं हैं।
इसी दौरान ट्रंप ने नाटो के कई प्रमुख सदस्य देशों की भी आलोचना की। उन्होंने कहा कि जर्मनी,फ्रांस,इटली और यूनाइटेड किंगडम जैसे देशों ने भी ईरान से जुड़े अभियान में शामिल होने से इनकार कर दिया। ट्रंप ने कहा कि अमेरिका दशकों से यूरोप की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए भारी आर्थिक और सैन्य योगदान देता रहा है। इसके बावजूद जब अमेरिका को सहयोग की आवश्यकता पड़ी,तो कई सहयोगी देशों ने दूरी बना ली।
उन्होंने कहा कि वह इस पूरे घटनाक्रम के माध्यम से यह भी देखना चाहते थे कि अमेरिका के सहयोगी वास्तव में उसके साथ कितनी मजबूती से खड़े होते हैं। उनके अनुसार यह एक तरह से साझेदारी की परीक्षा थी। ट्रंप ने कहा कि इस परीक्षा में कई देश उनकी अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरे। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि भविष्य में अमेरिका नाटो के भीतर जिम्मेदारियों के बँटवारे और रक्षा सहयोग की व्यवस्था पर पुनर्विचार कर सकता है।
हालाँकि,ट्रंप ने सभी सहयोगी देशों की आलोचना नहीं की। उन्होंने तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन और तुर्की की भूमिका की सराहना की। ट्रंप ने कहा कि तुर्की के पास सैन्य दृष्टि से इस अभियान में शामिल होने की क्षमता थी,लेकिन उसने संघर्ष को और बढ़ाने के बजाय तनाव कम करने की दिशा में काम किया। उनके अनुसार तुर्की ने क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने और संकट को समाप्त करने के प्रयासों में सकारात्मक भूमिका निभाई।
ट्रंप ने कहा कि एर्दोगन के नेतृत्व में तुर्की ने संतुलित दृष्टिकोण अपनाया और क्षेत्रीय शांति स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास किए। उन्होंने यह भी कहा कि अंकारा में आयोजित नाटो शिखर सम्मेलन में उनकी भागीदारी का एक प्रमुख कारण एर्दोगन के साथ उनके अच्छे संबंध और तुर्की की भूमिका भी थी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप के ताजा बयान नाटो के भीतर पहले से चल रही जिम्मेदारियों के बँटवारे की बहस को और तेज कर सकते हैं। ट्रंप लंबे समय से यह कहते रहे हैं कि अमेरिका संगठन में सबसे अधिक आर्थिक और सैन्य योगदान देता है, जबकि कई यूरोपीय देश अपनी जिम्मेदारियों का पूरा निर्वहन नहीं करते। अब ईरान से जुड़े घटनाक्रम के बाद उन्होंने इस मुद्दे को फिर प्रमुखता से उठाया है।
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि इटली और अन्य यूरोपीय देशों के प्रति ट्रंप की सार्वजनिक नाराजगी भविष्य में अमेरिका और उसके पारंपरिक सहयोगियों के संबंधों को प्रभावित कर सकती है। हालाँकि,यह भी संभव है कि आगामी कूटनीतिक वार्ताओं के दौरान दोनों पक्ष अपने मतभेदों को दूर करने का प्रयास करें। फिलहाल ट्रंप के बयान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह नाटो के भीतर बराबर जिम्मेदारी और संकट के समय ठोस सहयोग को अत्यंत महत्वपूर्ण मानते हैं।
ईरान,होर्मुज़ जलडमरूमध्य और नाटो सहयोगियों को लेकर ट्रंप की तीखी टिप्पणियों ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इटली,जर्मनी,फ्रांस,यूनाइटेड किंगडम और अन्य सहयोगी देश इन बयानों पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं और क्या इस विवाद का प्रभाव नाटो की एकजुटता तथा भविष्य की सामूहिक सुरक्षा रणनीति पर पड़ता है। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि ट्रंप ने अपने सहयोगियों को यह संदेश देने की कोशिश की है कि साझेदारी केवल शांति के समय नहीं,बल्कि संकट की घड़ी में निभाई गई प्रतिबद्धता से भी परखी जाती है।
