भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी)

विदेशी निवेशकों के लिए सेबी का बड़ा फैसला,पंजीकरण शुल्क अब डॉलर नहीं बल्कि रुपये में होगा,प्रक्रिया भी बनेगी अधिक सरल

मुंबई,8 जुलाई (युआईटीवी)- भारतीय पूँजी बाजार के नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों और विदेशी वेंचर कैपिटल निवेशकों के लिए नियमों में महत्वपूर्ण बदलाव करते हुए पंजीकरण शुल्क व्यवस्था को पूरी तरह भारतीय मुद्रा पर आधारित करने का निर्णय लिया है। इस फैसले के तहत अब विदेशी निवेशकों को पंजीकरण,नवीनीकरण और अन्य निर्धारित शुल्क अमेरिकी डॉलर में नहीं, बल्कि भारतीय रुपये में जमा करना होगा। सेबी का मानना है कि इस बदलाव से शुल्क भुगतान की प्रक्रिया अधिक पारदर्शी,सरल और व्यावहारिक बनेगी,साथ ही डॉलर आधारित प्रणाली में आने वाली कई परिचालन संबंधी समस्याओं का भी समाधान होगा।

सेबी द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार नया शुल्क ढाँचा तत्काल लागू नहीं होगा। इसे लागू करने के लिए लगभग छह महीने का संक्रमण काल दिया गया है,ताकि विदेशी निवेशक, कस्टोडियन और अन्य संबंधित संस्थाएँ नई व्यवस्था के अनुरूप अपनी प्रणालियों में आवश्यक बदलाव कर सकें। नियामक का मानना है कि यह अवधि नई प्रणाली को सुचारु रूप से लागू करने में सहायक होगी और किसी भी प्रकार की प्रशासनिक कठिनाई से बचा जा सकेगा।

नए नियमों के तहत पहले जो पंजीकरण शुल्क एक हजार अमेरिकी डॉलर निर्धारित था, उसे समाप्त कर उसकी जगह 90 हजार रुपये का शुल्क तय किया गया है। इसी प्रकार श्रेणी-एक के विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों और विदेशी वेंचर कैपिटल निवेशकों के लिए पहले निर्धारित ढाई हजार अमेरिकी डॉलर की फीस को बदलकर दो लाख तीस हजार रुपये कर दिया गया है। इस बदलाव का उद्देश्य विदेशी मुद्रा विनिमय दर में होने वाले उतार-चढ़ाव से शुल्क व्यवस्था को मुक्त करना और भारतीय मुद्रा में एक स्थिर एवं स्पष्ट ढांचा उपलब्ध कराना है।

सेबी ने केवल पंजीकरण शुल्क में ही परिवर्तन नहीं किया है,बल्कि विलंब शुल्क और पंजीकरण जारी रखने से संबंधित शुल्क में भी संशोधन किया है। अब इन सभी शुल्कों का निर्धारण भी भारतीय रुपये में किया जाएगा। इससे शुल्क भुगतान की प्रक्रिया अधिक एकरूप और व्यवस्थित हो जाएगी तथा विदेशी निवेशकों को भुगतान के समय विनिमय दर से जुड़ी अनिश्चितताओं का सामना नहीं करना पड़ेगा।

संशोधित नियमों के अनुसार विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों और विदेशी वेंचर कैपिटल निवेशकों से प्राप्त शुल्क जमा करने की जिम्मेदारी डिपॉजिटरी की होगी। डिपॉजिटरी को पंजीकरण स्वीकृत होने के पाँच कार्य दिवसों के भीतर यह राशि सेबी के पास जमा करनी होगी। इससे शुल्क संग्रह और नियामक के बीच धन हस्तांतरण की प्रक्रिया अधिक समयबद्ध और पारदर्शी बनने की उम्मीद है।

सेबी ने विदेशी निवेशकों के पंजीकरण की प्रक्रिया को भी पहले की तुलना में अधिक आसान बनाने का प्रयास किया है। इसके लिए विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के पंजीकरण हेतु उपयोग किए जाने वाले साझा आवेदन पत्र में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं। अब आवेदन पत्र में आवेदक की जन्म तिथि अथवा कंपनी के गठन की तिथि का विवरण भी शामिल किया जाएगा। इस परिवर्तन का उद्देश्य विभिन्न सरकारी प्रक्रियाओं के साथ बेहतर समन्वय स्थापित करना और आवेदन प्रक्रिया को अधिक सरल बनाना है।

यह बदलाव केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड द्वारा मार्च में जारी अधिसूचना के अनुरूप किया गया है। उस अधिसूचना का उद्देश्य स्थायी खाता संख्या के लिए आवेदन प्रक्रिया को आसान बनाना था। अब सेबी ने भी अपने नियमों में उसी दिशा में आवश्यक संशोधन करते हुए विदेशी निवेशकों के लिए दस्तावेजी प्रक्रिया को अधिक सहज बनाने की पहल की है। इससे विदेशी संस्थागत निवेशकों को भारत में निवेश संबंधी औपचारिकताओं को पूरा करने में कम समय और कम प्रशासनिक जटिलताओं का सामना करना पड़ेगा।

सेबी के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों और विदेशी वेंचर कैपिटल निवेशकों से पंजीकरण,नवीनीकरण और अन्य शुल्कों के रूप में वस्तु एवं सेवा कर सहित लगभग 12.98 मिलियन अमेरिकी डॉलर की राशि प्राप्त हुई। इस अनुभव के आधार पर नियामक ने महसूस किया कि डॉलर आधारित शुल्क प्रणाली के कारण कई व्यावहारिक चुनौतियाँ सामने आती हैं,जिनका समाधान भारतीय मुद्रा आधारित व्यवस्था के माध्यम से अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकता है।

नियामक ने स्पष्ट किया है कि डॉलर में शुल्क लेने की वर्तमान व्यवस्था के कारण मैनुअल लेखांकन,चालान तैयार करने,वास्तविक समय में लेखा जानकारी उपलब्ध कराने और वित्तीय रिपोर्ट तैयार करने जैसी प्रक्रियाओं में अनावश्यक जटिलताएँ उत्पन्न होती थीं। विदेशी मुद्रा विनिमय दर में लगातार होने वाले बदलाव के कारण कई बार वास्तविक भुगतान राशि और लेखा रिकॉर्ड के बीच अंतर भी उत्पन्न हो जाता था। भारतीय रुपये में शुल्क निर्धारित होने के बाद इन समस्याओं में उल्लेखनीय कमी आने की संभावना है।

इस नई व्यवस्था से सेबी की आंतरिक प्रशासनिक प्रणाली भी अधिक प्रभावी बनेगी। शुल्क संग्रह,लेखा प्रबंधन,वित्तीय विवरण तैयार करने और ऑडिट जैसी प्रक्रियाएँ पहले की तुलना में अधिक सरल और समयबद्ध हो सकेंगी। इससे नियामक और विदेशी निवेशकों दोनों को परिचालन स्तर पर सुविधा मिलेगी।

सेबी ने कस्टोडियन से संबंधित शुल्क व्यवस्था में भी महत्वपूर्ण बदलाव किया है। अब तक कस्टोडियन को सालाना दस लाख रुपये का शुल्क एकमुश्त जमा करना पड़ता था। नई व्यवस्था के तहत उन्हें यह राशि मासिक आधार पर जमा करनी होगी। इसके लिए हर महीने 85 हजार रुपये का भुगतान निर्धारित किया गया है। इस परिवर्तन का उद्देश्य भुगतान के बोझ को संतुलित करना और नकदी प्रवाह के प्रबंधन को अधिक व्यावहारिक बनाना है। मासिक भुगतान व्यवस्था से कस्टोडियन संस्थाओं के लिए वित्तीय योजना बनाना भी आसान होगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि सेबी का यह कदम भारत के पूँजी बाजार को और अधिक आधुनिक,पारदर्शी तथा निवेशक-अनुकूल बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। भारतीय रुपये में शुल्क निर्धारित होने से न केवल परिचालन संबंधी कठिनाइयाँ कम होंगी, बल्कि विदेशी निवेशकों के लिए भी भुगतान प्रक्रिया अधिक स्पष्ट और सुविधाजनक बनेगी। इसके अलावा भारतीय मुद्रा में शुल्क निर्धारण से भारत की वित्तीय प्रणाली को भी मजबूती मिलेगी और नियामकीय प्रक्रियाओं में दक्षता बढ़ेगी।

भारत का पूँजी बाजार लगातार वैश्विक निवेशकों को आकर्षित कर रहा है। ऐसे समय में सेबी द्वारा नियमों को सरल और अधिक व्यावहारिक बनाना निवेशकों का विश्वास बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि नियामकीय प्रक्रियाएँ पारदर्शी और आसान होंगी तो विदेशी निवेशकों की भागीदारी में भी सकारात्मक वृद्धि देखने को मिल सकती है।

आने वाले छह महीनों में संबंधित संस्थाएँ नई व्यवस्था के अनुरूप अपनी प्रणालियों को तैयार करेंगी और उसके बाद भारतीय रुपये में शुल्क भुगतान की नई प्रणाली पूरी तरह लागू हो जाएगी। माना जा रहा है कि इस बदलाव से न केवल नियामकीय प्रक्रियाओं में सुधार होगा,बल्कि भारत के वित्तीय बाजार को वैश्विक स्तर पर अधिक प्रतिस्पर्धी और निवेशक-अनुकूल बनाने में भी सहायता मिलेगी। सेबी का यह निर्णय डिजिटल और पारदर्शी वित्तीय प्रशासन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है,जिसका लाभ लंबे समय तक भारतीय पूँजी बाजार और विदेशी निवेशकों दोनों को मिलेगा।