अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और नाटो महासचिव मार्क रूटे (तस्वीर क्रेडिट@rashtra_press)

नाटो सहयोगियों पर बरसे डोनाल्ड ट्रंप,ईरान अभियान में समर्थन न मिलने पर जताई नाराजगी,रक्षा खर्च पर भी उठाए सवाल

अंकारा,8 जुलाई (युआईटीवी)- अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर नाटो सहयोगी देशों की प्रतिबद्धता और सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए हैं। मंगलवार को तुर्की की राजधानी अंकारा में आयोजित नाटो शिखर सम्मेलन के दौरान ट्रंप ने आरोप लगाया कि ईरान में अमेरिका के सैन्य अभियान के समय संगठन के कई सदस्य देशों ने साथ देने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि अमेरिका ने दशकों तक अपने सहयोगियों की सुरक्षा पर भारी धनराशि खर्च की है,लेकिन जब अमेरिका के समर्थन की आवश्यकता पड़ी,तब कई यूरोपीय देशों ने सहयोग से दूरी बना ली। ट्रंप की इस टिप्पणी ने नाटो के भीतर जिम्मेदारियों के बँटवारे और सदस्य देशों की भूमिका को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

अंकारा में तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन के साथ द्विपक्षीय बैठक से पहले पत्रकारों से बातचीत करते हुए ट्रंप ने कहा कि नाटो में जिम्मेदारियों का बोझ समान रूप से नहीं बँटता। उनके अनुसार अमेरिका लंबे समय से संगठन का सबसे बड़ा योगदानकर्ता रहा है और उसने यूरोप तथा अन्य सहयोगी देशों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए खरबों डॉलर खर्च किए हैं। इसके बावजूद कई देशों ने ईरान के खिलाफ हालिया सैन्य अभियान के दौरान अमेरिका का साथ नहीं दिया।

ट्रंप ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ईरान में सैन्य कार्रवाई के दौरान उन्हें सहयोगी देशों से किसी प्रकार का समर्थन नहीं मिला। उन्होंने कहा कि अमेरिका को किसी की सहायता की आवश्यकता नहीं थी और उन्होंने किसी देश से मदद भी नहीं माँगी थी,लेकिन इसके बावजूद कई सहयोगी देशों ने पहले ही यह संकेत दे दिया कि वे इस अभियान में अमेरिका के साथ नहीं होंगे। ट्रंप ने इसे सहयोगी देशों के रवैये का निराशाजनक उदाहरण बताया।

अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि यह केवल एक सैन्य अभियान का मामला नहीं है,बल्कि इससे यह सवाल भी खड़ा होता है कि यदि भविष्य में अमेरिका किसी बड़े सैन्य संकट में फँसता है तो क्या उसके सहयोगी वास्तव में उसके साथ खड़े होंगे। उन्होंने कहा कि यह चिंता उनके मन में लंबे समय से थी और हाल की घटनाओं ने उस आशंका को और मजबूत कर दिया है।

ट्रंप ने अपने संबोधन में कई प्रमुख यूरोपीय देशों का नाम लेते हुए कहा कि इटली,जर्मनी और फ्रांस ने भी अमेरिका का समर्थन करने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि यह स्थिति उनके लिए निराशाजनक थी क्योंकि अमेरिका हमेशा अपने सहयोगी देशों की सुरक्षा के लिए आगे आया है। उनके अनुसार यदि अमेरिका लगातार अपने सहयोगियों की रक्षा के लिए संसाधन खर्च करता है,तो संकट की घड़ी में सहयोगियों को भी समान प्रतिबद्धता दिखानी चाहिए।

उन्होंने विशेष रूप से यूनाइटेड किंगडम का उल्लेख करते हुए कहा कि वहाँ से भी उन्हें अपेक्षित समर्थन नहीं मिला। ट्रंप ने कहा कि अमेरिका ने हमेशा अपने मित्र देशों का साथ दिया है,लेकिन हालिया घटनाक्रम ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या वही देश आवश्यकता पड़ने पर अमेरिका के साथ खड़े होंगे। उन्होंने कहा कि यह केवल आर्थिक बोझ का सवाल नहीं है,बल्कि भरोसे और साझेदारी का भी विषय है।

ट्रंप ने नाटो की वित्तीय व्यवस्था पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि अमेरिका वर्षों से संगठन में सबसे अधिक योगदान देता रहा है और यूरोपीय देशों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए भारी निवेश करता आया है। उन्होंने पूछा कि यदि कई सदस्य देश संकट के समय अमेरिका के साथ खड़े होने को तैयार नहीं हैं,तो फिर अमेरिकी करदाताओं के धन से उनकी सुरक्षा पर इतना बड़ा खर्च क्यों किया जाए। उन्होंने कहा कि यह विषय भविष्य में गंभीर चर्चा का हिस्सा होना चाहिए।

पत्रकारों ने जब यूरोप में तैनात अमेरिकी सैनिकों की संख्या कम किए जाने की संभावना के बारे में सवाल पूछा तो ट्रंप ने स्पष्ट निर्णय की घोषणा नहीं की,लेकिन संकेत दिया कि इस विषय पर विचार किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि वह नाटो के वर्तमान स्वरूप और उसमें जिम्मेदारियों के बँटवारे से काफी निराश हैं। हालाँकि,उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य के फैसले परिस्थितियों को देखते हुए लिए जाएंगे।

ट्रंप ने यह भी कहा कि यदि नाटो शिखर सम्मेलन तुर्की में आयोजित नहीं होता और वहाँ उनके मित्र तथा मजबूत नेता रेसेप तैयप एर्दोगन मेजबान नहीं होते,तो संभव है कि वह इस सम्मेलन में शामिल ही नहीं होते। इस बयान को तुर्की के प्रति उनके व्यक्तिगत सम्मान और एर्दोगन के साथ उनके संबंधों का संकेत माना जा रहा है।

जहाँ एक ओर ट्रंप ने कई नाटो सहयोगियों की आलोचना की,वहीं दूसरी ओर उन्होंने तुर्की की भूमिका की खुलकर सराहना की। उन्होंने कहा कि तुर्की नाटो का एक महत्वपूर्ण सदस्य है और राष्ट्रपति एर्दोगन के नेतृत्व में उसने संगठन के भीतर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ट्रंप के अनुसार एर्दोगन एक मजबूत और प्रभावशाली नेता हैं तथा उनकी नेतृत्व क्षमता के कारण ही उन्होंने इस सम्मेलन में भाग लेने का निर्णय लिया।

नाटो लंबे समय से सामूहिक सुरक्षा के सिद्धांत पर आधारित संगठन रहा है। इसके तहत किसी एक सदस्य देश पर हमला पूरे संगठन पर हमला माना जाता है। हालाँकि,समय-समय पर संगठन के भीतर रक्षा खर्च,सैन्य योगदान और जिम्मेदारियों के बँटवारे को लेकर मतभेद सामने आते रहे हैं। ट्रंप अपने पहले कार्यकाल से ही यह कहते रहे हैं कि कई यूरोपीय देश अपनी रक्षा पर पर्याप्त खर्च नहीं करते और अमेरिका पर अत्यधिक निर्भर रहते हैं।

ईरान को लेकर हाल के घटनाक्रम ने इस बहस को एक बार फिर तेज कर दिया है। अमेरिका ने हाल ही में ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की थी और उसके बाद क्षेत्रीय तनाव में वृद्धि हुई। ट्रंप का दावा है कि इस अभियान के दौरान कई सहयोगी देशों ने दूरी बनाए रखी,जिससे अमेरिका को यह महसूस हुआ कि संगठन के भीतर सामूहिक समर्थन उतना मजबूत नहीं है जितना माना जाता है।

अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि ट्रंप के बयान नाटो के भीतर पहले से मौजूद मतभेदों को और उजागर कर सकते हैं। हालाँकि,संगठन के कई सदस्य देशों का मानना है कि प्रत्येक सैन्य अभियान में भागीदारी का निर्णय उनकी राष्ट्रीय नीतियों और संसदों की मंजूरी पर निर्भर करता है। ऐसे में किसी विशेष अभियान में शामिल न होना नाटो की सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था से अलग होने के समान नहीं माना जा सकता।

इसके बावजूद ट्रंप की टिप्पणियां इस बात की ओर संकेत करती हैं कि वह नाटो में अमेरिका की भूमिका और योगदान की नई समीक्षा चाहते हैं। उनका मानना है कि यदि अमेरिका सबसे अधिक आर्थिक और सैन्य जिम्मेदारी उठाता है,तो अन्य सदस्य देशों को भी समान स्तर पर अपनी भूमिका निभानी चाहिए। उन्होंने बार-बार यह दोहराया कि साझेदारी तभी मजबूत मानी जा सकती है,जब सभी सदस्य संकट के समय एक-दूसरे के साथ समान प्रतिबद्धता दिखाएँ।

अंकारा में आयोजित नाटो शिखर सम्मेलन के दौरान ट्रंप के इन बयानों ने रक्षा सहयोग, सामूहिक सुरक्षा और संगठन के भविष्य को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अन्य सदस्य देश इन आरोपों पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं और क्या नाटो के भीतर जिम्मेदारियों के बँटवारे को लेकर कोई नई पहल सामने आती है। फिलहाल इतना तय है कि ट्रंप के बयान ने संगठन के भीतर सहयोग,विश्वास और सामूहिक सुरक्षा के मुद्दे को एक बार फिर वैश्विक चर्चा के केंद्र में ला दिया है।