आइजोल,17 जून (युआईटीवी)- मिजोरम के आइजोल जिले की एक अदालत ने लगभग नौ वर्ष पुराने एक जघन्य अपराध मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के दो जवानों को 42-42 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने दोनों दोषियों को एक आदिवासी युवती के साथ सामूहिक दुष्कर्म करने,उसे गंभीर शारीरिक क्षति पहुँचाने और उसके चेहरे पर तेजाब जैसा पदार्थ फेंकने का दोषी पाया। हालाँकि,अदालत ने युवती की सहेली की हत्या के मामले में दोनों आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।
यह मामला वर्ष 2017 का है,जिसने उस समय पूरे मिजोरम को झकझोर कर रख दिया था। घटना की गंभीरता और पीड़िता पर पड़े स्थायी शारीरिक तथा मानसिक प्रभावों को देखते हुए अदालत ने कड़ा रुख अपनाया और दोषियों को लंबी अवधि की सजा सुनाई। अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश सिल्वी जोमुआनपुई राल्टे ने 12 जून को दोनों आरोपियों को भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत दोषी करार दिया था। इसके बाद मंगलवार को सजा पर अंतिम फैसला सुनाया गया।
अदालत द्वारा दोषी ठहराए गए दोनों जवानों में पश्चिम बंगाल निवासी नीलांजन दास और उत्तर प्रदेश निवासी दिनेश कुमार शामिल हैं। दोनों घटना के समय मिजोरम-बांग्लादेश सीमा के निकट स्थित एक बीएसएफ शिविर में तैनात थे। अदालत ने दोनों को सामूहिक दुष्कर्म के अपराध में 20-20 वर्ष की सजा,दुष्कर्म के दौरान पीड़िता को गंभीर शारीरिक चोट पहुँचाने के लिए 10-10 वर्ष की सजा और तेजाब हमले के लिए 12-12 वर्ष के कारावास की सजा सुनाई। अदालत ने स्पष्ट किया कि ये सभी सजाएँ एक के बाद एक चलेंगी,जिसके परिणामस्वरूप दोनों दोषियों को कुल 42-42 वर्ष जेल में बिताने होंगे।
सिर्फ कारावास ही नहीं,अदालत ने दोनों दोषियों पर आर्थिक दंड भी लगाया है। प्रत्येक अपराध के लिए 60-60 हजार रुपये का जुर्माना निर्धारित किया गया है। यदि दोषी जुर्माने की राशि जमा करने में विफल रहते हैं,तो उन्हें प्रत्येक अपराध के लिए दो-दो महीने की अतिरिक्त सजा भुगतनी होगी। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अपराध की प्रकृति अत्यंत गंभीर है और इसके कारण पीड़िता का जीवन स्थायी रूप से प्रभावित हुआ है।
मामले के अनुसार,16 जुलाई 2017 को पीड़िता अपनी सहेली रंगबी के साथ ममित जिले के सिलसुरी वेस्ट गाँव के निकट गास्काता नदी के आसपास के जंगल में केकड़े और जंगली सब्जियाँ इकट्ठा करने गई थी। यह क्षेत्र स्थानीय ग्रामीणों के लिए प्राकृतिक संसाधनों का महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है। उसी दौरान दोनों युवतियों का सामना नीलांजन दास और दिनेश कुमार से हुआ। आरोप है कि दोनों जवानों ने पीड़िता को जबरन पकड़ लिया और उसे पास स्थित एक सुपारी बागान में ले गए।
अदालत में दर्ज गवाही के अनुसार,वहाँ दोनों आरोपियों ने युवती के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया। अपराध को अंजाम देने के बाद उन्होंने उसके चेहरे पर तेजाब जैसा पदार्थ फेंक दिया। इस हमले के कारण पीड़िता बुरी तरह झुलस गई। उसके चेहरे पर गंभीर चोटें आईं और उसका चेहरा स्थायी रूप से विकृत हो गया। इतना ही नहीं,हमले में उसकी एक आँख की रोशनी भी चली गई। अदालत ने माना कि यह हमला केवल शारीरिक हिंसा नहीं था,बल्कि पीड़िता की पहचान,आत्मसम्मान और भविष्य पर भी गहरा आघात था।
घटना के बाद पीड़िता किसी तरह जीवित बच गई और उसने पूरे घटनाक्रम की जानकारी अपने परिजनों तथा जाँच एजेंसियों को दी। पीड़िता के भाई ने घटना के दो दिन बाद मारपारा थाने में शिकायत दर्ज कराई,जिसके आधार पर पुलिस ने मामला दर्ज कर जाँच शुरू की। जाँच के दौरान पुलिस ने कई महत्वपूर्ण साक्ष्य एकत्र किए और आरोपियों के खिलाफ मामला मजबूत किया।
मुकदमे के दौरान पीड़िता की गवाही सबसे अहम साबित हुई। अदालत ने अपने फैसले में उल्लेख किया कि पाँच सितंबर 2017 को न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष आयोजित पहचान परेड में पीड़िता ने दोनों आरोपियों की स्पष्ट रूप से पहचान की थी। अदालत ने इसे अभियोजन पक्ष के लिए एक महत्वपूर्ण साक्ष्य माना। इसके अलावा चिकित्सा रिपोर्टों,फॉरेंसिक जाँच और अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्यों ने भी अभियोजन के मामले को मजबूत आधार प्रदान किया।
मुकदमे के दौरान अभियोजन पक्ष ने कुल 18 गवाह पेश किए। इनमें चिकित्सा विशेषज्ञ, फॉरेंसिक विशेषज्ञ,जाँच अधिकारी और स्थानीय निवासी शामिल थे। इन गवाहों की गवाही ने घटना की परिस्थितियों,पीड़िता की चोटों और आरोपियों की संलिप्तता को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अदालत ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्य और गवाहों के बयानों के आधार पर यह संदेह से परे सिद्ध होता है कि दोनों आरोपियों ने पीड़िता के साथ दुष्कर्म किया और उस पर तेजाब जैसा पदार्थ फेंका।
हालाँकि,मामले का एक अन्य पहलू भी था,जो पीड़िता की सहेली रंगबी की मौत से जुड़ा था। अदालत में प्रस्तुत तथ्यों के अनुसार,घटना के समय रंगबी वहाँ से हट गई थी। बाद में 27 जुलाई 2017 को उसका शव अपराध स्थल के निकट बरामद हुआ। पोस्टमॉर्टम और फॉरेंसिक जाँच से यह स्पष्ट हुआ कि उसकी हत्या की गई थी। इसके बाद जाँच एजेंसियों ने इस हत्या के लिए भी दोनों जवानों पर संदेह जताया और आरोप लगाए।
लेकिन अदालत ने इस मामले में अलग निष्कर्ष निकाला। न्यायालय ने कहा कि रंगबी की हत्या के संबंध में अभियोजन पक्ष पर्याप्त और ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर पाया। अदालत के अनुसार,यह साबित नहीं किया जा सका कि उसकी मौत के लिए नीलांजन दास और दिनेश कुमार ही जिम्मेदार थे। आपराधिक न्याय व्यवस्था में दोष सिद्ध करने के लिए संदेह से परे प्रमाण आवश्यक होता है और इस मामले में अभियोजन उस मानक को पूरा नहीं कर सका। इसी आधार पर अदालत ने दोनों आरोपियों को हत्या के आरोप से बरी कर दिया।
यह फैसला न केवल पीड़िता को न्याय दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है,बल्कि यह भी दर्शाता है कि गंभीर अपराधों में कानून कितनी सख्ती से कार्रवाई कर सकता है। अदालत ने अपने निर्णय के माध्यम से यह स्पष्ट संदेश दिया है कि वर्दी में होने का अर्थ कानून से ऊपर होना नहीं है। यदि कोई व्यक्ति अपने अधिकारों और जिम्मेदारियों का दुरुपयोग कर अपराध करता है,तो उसे उसके परिणाम भुगतने होंगे।
करीब नौ वर्षों तक चली कानूनी प्रक्रिया के बाद आया यह फैसला पीड़िता और उसके परिवार के लिए न्याय की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। हालाँकि,उसके जीवन पर पड़े शारीरिक और मानसिक घाव शायद कभी पूरी तरह नहीं भर सकेंगे,लेकिन अदालत का यह निर्णय अपराध के खिलाफ न्याय व्यवस्था की दृढ़ता और पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है।
