नई दिल्ली,8 जुलाई (युआईटीवी)- देश के पूँजी बाजार में लंबे समय से जिस प्रारंभिक सार्वजनिक निर्गम का इंतजार किया जा रहा था,वह अब अंतिम चरण में पहुँचता दिखाई दे रहा है। देश के सबसे बड़े स्टॉक एक्सचेंज नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का प्रस्तावित लगभग 30 हजार करोड़ रुपये का आईपीओ भारतीय शेयर बाजार के इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा सार्वजनिक निर्गम माना जा रहा है। हालाँकि,यह आईपीओ जितना बड़ा है, उतनी ही लंबी इसकी यात्रा भी रही है। लगभग एक दशक से यह प्रस्ताव विभिन्न नियामकीय और कानूनी कारणों से अटका रहा। अब जबकि एक्सचेंज फिर से सूचीबद्ध होने की तैयारी कर रहा है,उसी समय डेरिवेटिव्स कारोबार से जुड़े नए नियामकीय बदलावों ने इसकी आय और मुनाफे पर असर डालना शुरू कर दिया है। ऐसे में बाजार विशेषज्ञों और निवेशकों के बीच इस बहुप्रतीक्षित आईपीओ को लेकर उत्सुकता के साथ-साथ कई महत्वपूर्ण सवाल भी उठ रहे हैं।
वैल्यू रिसर्च की एक रिपोर्ट के अनुसार,नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का आईपीओ वर्षों तक मुख्य रूप से को-लोकेशन विवाद के कारण अटका रहा। यह विवाद वर्ष 2010 से 2014 के बीच सामने आया था। आरोप लगाए गए थे कि कुछ चुनिंदा ब्रोकरेज संस्थाओं को एक्सचेंज के डेटा सेंटर में मौजूद बैकअप सर्वर तक अन्य बाजार प्रतिभागियों की तुलना में पहले पहुँच मिल जाती थी। इसके कारण उन्हें बाजार से जुड़ी जानकारी कुछ मिलीसेकेंड पहले प्राप्त होती थी। हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग जैसे क्षेत्र में कुछ मिलीसेकेंड का यह अंतर भी बड़ा वित्तीय लाभ दिला सकता है। इसी कारण यह मामला बेहद गंभीर माना गया और इसने पूरे भारतीय पूँजी बाजार का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया।
बाद में कराए गए फॉरेंसिक ऑडिट में इस तरह के पैटर्न की पुष्टि हुई। इसके बाद भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड ने पूरे मामले की विस्तृत जाँच शुरू की। जब नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ने वर्ष 2016 में अपना ड्राफ्ट प्रॉस्पेक्टस दाखिल किया,तब तक यह विवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था। नियामकीय अनिश्चितता और जाँच प्रक्रिया के चलते आईपीओ को मंजूरी नहीं मिल सकी। इसके बाद यह मामला कई वर्षों तक विभिन्न कानूनी और नियामकीय मंचों पर चलता रहा। सेबी की कार्रवाई,प्रतिभूति अपीलीय न्यायाधिकरण में सुनवाई और अंततः सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचे इस मामले ने एक्सचेंज की लिस्टिंग प्रक्रिया को लगभग एक दशक तक रोक कर रखा।
अब स्थिति पहले की तुलना में काफी बदलती दिखाई दे रही है। रिपोर्ट के अनुसार नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ने सेबी के समक्ष 1,491 करोड़ रुपये के संशोधित सेटलमेंट का प्रस्ताव रखा है। माना जा रहा है कि इस प्रस्ताव को मंजूरी मिलने के बाद लंबे समय से लंबित आईपीओ का रास्ता लगभग साफ हो जाएगा। यदि ऐसा होता है,तो भारतीय शेयर बाजार को इतिहास का सबसे बड़ा सार्वजनिक निर्गम देखने का अवसर मिलेगा।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि वर्ष 2022 में आशीष चौहान की नेशनल स्टॉक एक्सचेंज में वापसी ने इस पूरी प्रक्रिया को नई गति प्रदान की। चौहान एक्सचेंज की संस्थापक टीम का हिस्सा रह चुके हैं और बाद में उन्होंने बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज की वर्ष 2017 की सफल लिस्टिंग का नेतृत्व भी किया था। उनकी वापसी को बाजार में सकारात्मक संकेत के रूप में देखा गया। निवेशकों और नियामकों के बीच एक्सचेंज की विश्वसनीयता मजबूत हुई तथा वर्षों से लंबित आईपीओ प्रक्रिया को दोबारा आगे बढ़ाने में मदद मिली।
दिलचस्प बात यह है कि आईपीओ में देरी के बावजूद नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का कारोबार लगातार बढ़ता रहा। पिछले एक दशक के दौरान एक्सचेंज की आय में लगभग नौ गुना वृद्धि दर्ज की गई। यह वृद्धि मुख्य रूप से ट्रेडिंग गतिविधियों में तेजी और विशेषकर डेरिवेटिव्स बाजार में जबरदस्त विस्तार के कारण संभव हुई। वर्ष 2016 में एक्सचेंज की कुल आय में ट्रांजैक्शन शुल्क की हिस्सेदारी लगभग 49.5 प्रतिशत थी। यह बढ़कर वित्त वर्ष 2026 में लगभग 78.7 प्रतिशत तक पहुँच गई। इससे स्पष्ट होता है कि एक्सचेंज की कमाई का सबसे बड़ा स्रोत ट्रेडिंग गतिविधियाँ बन गई हैं।
इस वृद्धि में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका इक्विटी डेरिवेटिव्स और विशेष रूप से ऑप्शंस ट्रेडिंग ने निभाई। बीते कुछ वर्षों में भारतीय निवेशकों के बीच ऑप्शंस ट्रेडिंग की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी। इसके परिणामस्वरूप आज नेशनल स्टॉक एक्सचेंज की कुल परिचालन आय का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा केवल ऑप्शंस ट्रेडिंग से प्राप्त होता है। यह आँकड़ा एक्सचेंज की मजबूत स्थिति को तो दर्शाता है,लेकिन साथ ही उसकी एक बड़ी चुनौती की ओर भी संकेत करता है। यदि किसी कारण से ऑप्शंस कारोबार में कमी आती है,तो उसका सीधा असर एक्सचेंज की आय और लाभप्रदता पर पड़ सकता है।
हाल के महीनों में यही स्थिति देखने को मिली है। भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड ने डेरिवेटिव्स बाजार में लगातार बढ़ते जोखिम और खुदरा निवेशकों को हो रहे भारी नुकसान को देखते हुए कई महत्वपूर्ण नियामकीय बदलाव लागू किए। सेबी के आँकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2025 के दौरान फ्यूचर्स और ऑप्शंस बाजार में कारोबार करने वाले लगभग 91 प्रतिशत खुदरा निवेशकों को शुद्ध नुकसान हुआ। इन निवेशकों का कुल नुकसान लगभग 1.1 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच गया। इस स्थिति ने नियामक को बाजार में संतुलन और निवेशक सुरक्षा के लिए सख्त कदम उठाने के लिए प्रेरित किया।
इसी उद्देश्य से वर्ष 2024 से डेरिवेटिव्स बाजार में कई नए नियम लागू किए गए। इनमें दोनों प्रमुख एक्सचेंजों पर साप्ताहिक एक्सपायरी की संख्या को घटाकर एक करना, निफ्टी और सेंसेक्स के एक्सपायरी दिनों में बदलाव करना,अनुबंधों का आकार बढ़ाना तथा एक्सपायरी के समय अतिरिक्त मार्जिन लागू करना जैसे कदम शामिल हैं। इन परिवर्तनों का उद्देश्य अत्यधिक सट्टेबाजी को नियंत्रित करना और बाजार को अधिक स्थिर बनाना था।
इन नए नियमों का प्रभाव वित्त वर्ष 2026 में स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। यह पहला पूरा वित्तीय वर्ष था जिसमें पूरा कारोबार नई नियामकीय व्यवस्था के तहत संचालित हुआ। रिपोर्ट के अनुसार इस दौरान नेशनल स्टॉक एक्सचेंज की परिचालन आय में लगभग तीन प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। वहीं समायोजित शुद्ध लाभ 17 प्रतिशत घटकर 9,101 करोड़ रुपये रह गया,जबकि पिछले वित्त वर्ष में यह 10,978 करोड़ रुपये था। लाभ में आई यह कमी इस बात का संकेत है कि डेरिवेटिव्स कारोबार में हुए बदलावों का प्रभाव एक्सचेंज के वित्तीय प्रदर्शन पर पड़ा है।
सिर्फ आय और मुनाफे पर ही नहीं,बल्कि बाजार हिस्सेदारी पर भी इसका असर दिखाई दिया। इक्विटी ऑप्शंस बाजार में नेशनल स्टॉक एक्सचेंज की हिस्सेदारी पहले लगभग 97 प्रतिशत थी,जो घटकर 75 प्रतिशत रह गई। यह गिरावट बताती है कि बदलते नियामकीय माहौल और प्रतिस्पर्धा ने एक्सचेंज के सामने नई चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान समय में नेशनल स्टॉक एक्सचेंज की सबसे बड़ी ताकत और सबसे बड़ी चुनौती दोनों ही उसका ऑप्शंस कारोबार है। एक ओर यही कारोबार उसकी आय का सबसे बड़ा स्रोत है,वहीं दूसरी ओर नियामकीय सख्ती का सबसे अधिक प्रभाव भी इसी क्षेत्र पर पड़ रहा है। यदि भविष्य में डेरिवेटिव्स बाजार को लेकर और कड़े नियम लागू किए जाते हैं,तो एक्सचेंज की आय पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
हालाँकि,एक्सचेंज के पास केवल ट्रेडिंग शुल्क ही आय का स्रोत नहीं है। उसकी कुल परिचालन आय का लगभग 21 प्रतिशत हिस्सा डेटा फीड्स,लिस्टिंग शुल्क,सूचकांक लाइसेंसिंग और को-लोकेशन शुल्क जैसी गतिविधियों से आता है। इन क्षेत्रों से मिलने वाली आय अपेक्षाकृत स्थिर मानी जाती है और इनमें लगातार वृद्धि भी दर्ज की जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भविष्य में इन गैर-ट्रेडिंग आय स्रोतों का विस्तार किया जाता है,तो एक्सचेंज अपनी आय को अधिक संतुलित बना सकता है और डेरिवेटिव्स कारोबार पर अत्यधिक निर्भरता कम कर सकता है।
आईपीओ को लेकर निवेशकों की रुचि काफी अधिक बनी हुई है। देश के सबसे बड़े स्टॉक एक्सचेंज में हिस्सेदारी खरीदने का अवसर लंबे समय से निवेशकों की प्रतीक्षा सूची में रहा है। यदि यह सार्वजनिक निर्गम नियामकीय मंजूरी के बाद बाजार में आता है,तो इसके प्रति संस्थागत और खुदरा दोनों प्रकार के निवेशकों की मजबूत भागीदारी देखने को मिल सकती है।
बाजार विश्लेषकों का कहना है कि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज के सामने फिलहाल दो समानांतर चुनौतियाँ हैं। पहली चुनौती को-लोकेशन विवाद से जुड़े अंतिम नियामकीय समाधान और आईपीओ की सफल लिस्टिंग सुनिश्चित करना है। दूसरी चुनौती बदलते नियामकीय वातावरण में अपने कारोबार के मॉडल को अधिक संतुलित और टिकाऊ बनाना है। यदि एक्सचेंज इन दोनों मोर्चों पर सफल रहता है,तो उसका आईपीओ भारतीय पूँजी बाजार के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकता है।
आने वाले महीनों में सेबी के फैसले,प्रस्तावित सेटलमेंट की मंजूरी और आईपीओ की समय-सीमा पर पूरे बाजार की नजर रहेगी। यदि सभी प्रक्रियाएँ तय समय पर पूरी होती हैं,तो लगभग एक दशक से लंबित यह सार्वजनिक निर्गम आखिरकार निवेशकों के सामने होगा। यह केवल एक कंपनी की लिस्टिंग नहीं होगी,बल्कि भारतीय पूँजी बाजार के विकास,पारदर्शिता और परिपक्वता की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जाएगी। वहीं निवेशकों के लिए यह अवसर होगा कि वे देश के सबसे बड़े स्टॉक एक्सचेंज की विकास यात्रा का हिस्सा बन सकें,हालाँकि,इसके साथ जुड़े नियामकीय और कारोबारी जोखिमों का आकलन करना भी उतना ही आवश्यक होगा।
