वाशिंगटन,15 जुलाई (युआईटीवी)- अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव अब एक नए और अधिक गंभीर सैन्य चरण में पहुँचता दिखाई दे रहा है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने दावा किया है कि उसने होर्मुज जलडमरूमध्य और ईरान के तटीय इलाकों के आसपास स्थित कई सैन्य ठिकानों पर व्यापक हवाई और नौसैनिक अभियान चलाया। अमेरिकी सेना के अनुसार यह अभियान लगातार सात घंटे तक चला,जिसमें लड़ाकू विमानों, ड्रोन और युद्धपोतों की मदद से ईरान की मिसाइल क्षमता,ड्रोन ठिकानों,नौसैनिक संसाधनों और तटीय रक्षा प्रणालियों को निशाना बनाया गया। इस कार्रवाई को अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों की सुरक्षा और व्यापारिक जहाजों की रक्षा के लिए आवश्यक कदम बताया है, जबकि क्षेत्र में बढ़ते तनाव ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है।
अमेरिकी सेंट्रल कमांड की ओर से जारी बयान के अनुसार अभियान अमेरिकी समयानुसार रात दस बजे समाप्त हुआ। कमांड ने कहा कि यह पूरी कार्रवाई अत्यंत सटीक योजना के साथ अंजाम दी गई और इसका उद्देश्य ईरान की उन सैन्य क्षमताओं को कमजोर करना था, जिनके जरिए वह अंतर्राष्ट्रीय व्यापारिक जहाजों,नागरिक चालक दल और खाड़ी क्षेत्र के देशों के लिए खतरा पैदा कर सकता है। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि पिछले कुछ दिनों में क्षेत्र में जिस प्रकार के हमले हुए हैं,उन्हें देखते हुए यह सैन्य अभियान आवश्यक हो गया था।
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक माना जाता है। वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की बड़ी मात्रा इसी जलमार्ग के जरिए दुनिया के विभिन्न देशों तक पहुँचती है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहता,बल्कि उसका असर पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा बाजार और समुद्री व्यापार पर पड़ता है। यही कारण है कि अमेरिकी कार्रवाई को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी बेहद महत्वपूर्ण घटनाक्रम के रूप में देखा जा रहा है।
अमेरिकी सेना ने बताया कि इस अभियान में अत्याधुनिक लड़ाकू विमान,सशस्त्र ड्रोन और नौसैनिक युद्धपोत शामिल थे। इन सभी ने समन्वित तरीके से ईरानी सैन्य ढाँचे पर हमले किए। कमांड के अनुसार निशाने पर वे ठिकाने थे, जहाँ से मिसाइल और ड्रोन संचालन किया जा सकता था या जहाँ से समुद्री सुरक्षा को चुनौती मिलने की आशंका थी। हालाँकि,अमेरिकी अधिकारियों ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए यह नहीं बताया कि किन-किन स्थानों पर हमले किए गए और किस स्तर का नुकसान हुआ।
इन हमलों का समय भी काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसी दिन अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों और तटीय क्षेत्रों से आने-जाने वाले जहाजों के खिलाफ अपनी समुद्री नाकाबंदी को फिर से लागू किया। अमेरिकी समयानुसार शाम चार बजे से प्रभावी हुई इस कार्रवाई के बाद क्षेत्र में सैन्य गतिविधियाँ और तेज हो गईं। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि यह कदम उन जहाजों की निगरानी के लिए उठाया गया है,जिनका संबंध ईरान या ईरानी बंदरगाहों से हो सकता है।
सेंट्रल कमांड ने यह भी जानकारी दी कि पूरे मध्य पूर्व क्षेत्र में अमेरिकी नौसेना के बीस से अधिक युद्धपोत और सैकड़ों सैन्य विमान तैनात किए गए हैं। इसके अलावा विभिन्न सैन्य अड्डों पर अतिरिक्त बलों को भी अलर्ट पर रखा गया है। कमांड का कहना है कि अमेरिकी सेना किसी भी संभावित स्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है और यदि आवश्यकता पड़ी तो आगे भी इसी तरह के सैन्य अभियान चलाए जा सकते हैं।
अमेरिकी सेंट्रल कमांड के प्रमुख एडमिरल ब्रैड कूपर ने कहा कि हालिया सैन्य कार्रवाई ईरान की लगातार बढ़ती आक्रामक गतिविधियों के जवाब में की गई है। उनके अनुसार पिछले सात दिनों के भीतर ईरान ने क्षेत्र में सात व्यापारिक जहाजों को निशाना बनाया, जिनमें कई नागरिक चालक दल के सदस्य मारे गए,घायल हुए या लापता हो गए। उन्होंने आरोप लगाया कि इन हमलों में जानबूझकर आम नागरिकों को निशाना बनाया गया, जिससे अंतर्राष्ट्रीय समुद्री सुरक्षा को गंभीर खतरा पैदा हुआ।
एडमिरल कूपर ने यह भी दावा किया कि ईरान ने पड़ोसी खाड़ी देशों की दिशा में बड़ी संख्या में मिसाइलें और ड्रोन दागे। उनके अनुसार इन गतिविधियों ने पूरे क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था को अस्थिर कर दिया है। उन्होंने कहा कि अमेरिका निर्दोष नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और समुद्री व्यापार को सुरक्षित बनाए रखने के लिए आवश्यक कार्रवाई करता रहेगा। उनका कहना था कि अमेरिकी सेना ईरान को ऐसी हर आक्रामक गतिविधि के लिए जिम्मेदार ठहराती है जिससे क्षेत्रीय स्थिरता और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार प्रभावित होता है।
हालाँकि,अमेरिकी सेना ने अपने बयान में उन व्यापारिक जहाजों के नाम सार्वजनिक नहीं किए जिन पर कथित हमले हुए। इसके अलावा न तो चालक दल के सदस्यों की राष्ट्रीयता का खुलासा किया गया और न ही उन खाड़ी देशों के नाम बताए गए,जिन्हें कथित रूप से मिसाइल और ड्रोन हमलों का सामना करना पड़ा। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि संवेदनशील सुरक्षा कारणों से फिलहाल इन जानकारियों को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता।
सैन्य कार्रवाई के बावजूद अमेरिका ने नुकसान के आकलन को लेकर भी कोई विस्तृत जानकारी साझा नहीं की है। यह स्पष्ट नहीं किया गया कि कितने सैन्य ठिकाने पूरी तरह नष्ट हुए,कितनी सैन्य सामग्री को नुकसान पहुँचा या इस अभियान में किसी प्रकार की जनहानि हुई या नहीं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार की जानकारी अक्सर बाद के चरण में सामने आती है,जब अभियान से जुड़े सभी सुरक्षा पहलुओं का मूल्यांकन पूरा हो जाता है।
इस पूरे घटनाक्रम ने मध्य पूर्व में पहले से जारी तनाव को और अधिक बढ़ा दिया है। पिछले कुछ समय से अमेरिका और ईरान के बीच लगातार आरोप-प्रत्यारोप और सैन्य गतिविधियाँ तेज होती रही हैं। समुद्री मार्गों की सुरक्षा,ऊर्जा आपूर्ति, क्षेत्रीय प्रभाव और रणनीतिक हितों को लेकर दोनों देशों के बीच टकराव लगातार गहराता जा रहा है। ऐसे में यह आशंका भी जताई जा रही है कि यदि कूटनीतिक प्रयास सफल नहीं हुए,तो आने वाले दिनों में हालात और अधिक गंभीर हो सकते हैं।
अंतर्राष्ट्रीय समुदाय भी इस स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है। कई देशों ने पहले ही दोनों पक्षों से संयम बरतने और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की अपील की है। विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य में किसी भी प्रकार का लंबा सैन्य संघर्ष वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति,तेल की कीमतों और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर व्यापक असर डाल सकता है। दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ भी इस क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने के पक्ष में हैं।
सेंट्रल कमांड ने अपने बयान के अंत में स्पष्ट किया कि अमेरिकी सेना राष्ट्रपति और कमांडर-इन-चीफ के निर्देशों के अनुसार भविष्य में भी किसी भी आवश्यक सैन्य कार्रवाई के लिए पूरी तरह तैयार है। कमांड का कहना है कि यदि क्षेत्रीय सुरक्षा को खतरा उत्पन्न होता है या अंतर्राष्ट्रीय समुद्री मार्गों पर फिर से हमला किया जाता है,तो अमेरिका अपने सहयोगी देशों और वैश्विक व्यापारिक हितों की रक्षा के लिए तत्काल कदम उठाएगा।
मध्य पूर्व में लगातार बदलते हालात के बीच यह सैन्य अभियान इस बात का संकेत माना जा रहा है कि अमेरिका अपनी रणनीति को और अधिक आक्रामक बना रहा है। अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि ईरान इस कार्रवाई पर क्या प्रतिक्रिया देता है और क्या दोनों देशों के बीच बढ़ता यह टकराव आगे किसी बड़े क्षेत्रीय संघर्ष का रूप लेता है या फिर कूटनीतिक प्रयासों के जरिए तनाव को कम करने का रास्ता निकाला जा सकेगा।
