मेटा (तस्वीर क्रेडिट@IndianInfoGuid)

फेसबुक-इंस्टाग्राम के एल्गोरिद्म पर सरकार सख्त,मेटा को कंटेंट रिकमेंडेशन सिस्टम की समीक्षा के निर्देश

नई दिल्ली,19 अक्टूबर (युआईटीवी)- भारत सरकार ने सोशल मीडिया मंचों पर दिखाई जाने वाली सामग्री और उसे उपयोगकर्ताओं तक पहुँचाने वाले एल्गोरिद्म की निगरानी तेज कर दी है। इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने प्रौद्योगिकी कंपनी मेटा को फेसबुक और इंस्टाग्राम के कंटेंट रिकमेंडेशन तथा रैंकिंग सिस्टम की समीक्षा करने के निर्देश दिए हैं। सरकार चाहती है कि इन मंचों पर उपयोगकर्ताओं को केवल एक ही तरह की विचारधारा या चुनिंदा कथानकों से जुड़ी सामग्री बार-बार न दिखाई जाए,बल्कि उन्हें विविध,प्रासंगिक और विश्वसनीय जानकारी तक पहुँचने का अवसर मिले।

मंत्रालय की ओर से जारी एडवाइजरी में मेटा को अपने कंटेंट रिकमेंडेशन सिस्टम की कार्यप्रणाली की समीक्षा करने और संभावित जोखिमों को कम करने के लिए आवश्यक कदम उठाने को कहा गया है। इसके साथ ही ऐसे कंटेंट की पहचान और निगरानी के तंत्र को मजबूत करने के निर्देश भी दिए गए हैं,जो एल्गोरिद्म के कारण तेजी से अधिक लोगों तक पहुँचता है और जिसके चलते सार्वजनिक भ्रम,हिंसा या कानून-व्यवस्था से जुड़ी समस्याएँ पैदा होने की आशंका हो सकती है।

सरकार ने इन उपायों को तत्काल लागू करने और इस संबंध में उठाए गए कदमों की जानकारी मंत्रालय को देने के लिए भी कहा है। इस निर्देश को सोशल मीडिया पर सामग्री के प्रसार और डिजिटल मंचों की जवाबदेही को लेकर सरकार की बढ़ती सक्रियता के रूप में देखा जा रहा है।

सोशल मीडिया मंचों पर उपयोगकर्ताओं को दिखाई देने वाली सामग्री का चयन काफी हद तक एल्गोरिद्म के माध्यम से किया जाता है। ये प्रणालियाँ उपयोगकर्ताओं की रुचि,उनकी गतिविधियों और सामग्री के साथ उनके जुड़ाव जैसे संकेतों के आधार पर पोस्ट,वीडियो और अन्य सामग्री की प्राथमिकता तय कर सकती हैं। इससे लोगों को उनकी पसंद के अनुरूप सामग्री आसानी से मिलती है,लेकिन कुछ परिस्थितियों में उन्हें सीमित प्रकार के विचारों और सूचनाओं का बार-बार सामना भी करना पड़ सकता है।

इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने इसी पहलू पर ध्यान केंद्रित करते हुए मेटा को अपने रिकमेंडेशन सिस्टम की समीक्षा करने के लिए कहा है। सरकार की अपेक्षा है कि इन प्रणालियों के कारण उपयोगकर्ताओं के सामने जानकारी का दायरा अनावश्यक रूप से सीमित न हो और अलग-अलग विषयों तथा दृष्टिकोणों से जुड़ी प्रासंगिक सामग्री तक उनकी पहुँच बनी रहे।

इसके अलावा,मंत्रालय ने ऐसे कंटेंट की पहचान और त्वरित निगरानी के लिए प्रभावी व्यवस्था विकसित करने पर जोर दिया है, जो रिकमेंडेशन सिस्टम के जरिए असामान्य गति से व्यापक स्तर पर फैल रहा हो। खासतौर पर ऐसी सामग्री पर ध्यान देने को कहा गया है, जिससे लोगों के बीच गलतफहमी बढ़ सकती है या सार्वजनिक सुरक्षा और कानून-व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।

मंत्रालय की एडवाइजरी में सार्वजनिक घटनाओं से जुड़ी तस्वीरों,वीडियो और ग्राफिक्स की प्रामाणिकता को लेकर भी चिंता जताई गई है। कई बार पुराने दृश्य,असंबंधित घटनाओं की तस्वीरें या संपादित वीडियो इस तरह प्रस्तुत किए जाते हैं,जिससे वे किसी मौजूदा घटना का हिस्सा प्रतीत होते हैं। ऐसी सामग्री तेजी से प्रसारित होने पर लोगों के बीच भ्रम पैदा हो सकता है।

सरकार ने मेटा को ऐसे मामलों में अतिरिक्त संदर्भ उपलब्ध कराने और सामग्री की विश्वसनीयता से जुड़े पहलुओं पर ध्यान देने के लिए कहा है। उदाहरण के तौर पर,यदि किसी पुराने वीडियो को वर्तमान घटना से जोड़कर प्रसारित किया जा रहा है,तो उसके समय और संदर्भ को स्पष्ट करना महत्वपूर्ण हो सकता है।

इसी तरह,किसी वीडियो को चुनिंदा हिस्सों में संपादित करके उसका अर्थ बदलने या अधूरी जानकारी के आधार पर किसी घटना की तस्वीर पेश करने के मामलों पर भी ध्यान देने की जरूरत बताई गई है। आपातकालीन परिस्थितियों,पुलिस कार्रवाई और अन्य सरकारी उपायों को लेकर किए जाने वाले अपुष्ट दावों की समीक्षा भी इस दिशा में महत्वपूर्ण मानी गई है।

इन निर्देशों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि संवेदनशील सार्वजनिक घटनाओं से जुड़ी सामग्री लोगों तक पहुँचते समय उसके संदर्भ और प्रामाणिकता को लेकर पैदा होने वाले जोखिमों को कम किया जा सके। हालाँकि,किसी सामग्री की समीक्षा करते समय उसकी वास्तविक परिस्थितियों और उपलब्ध तथ्यों को समझना भी आवश्यक होगा।

फेसबुक और इंस्टाग्राम का संचालन करने वाली मेटा को लेकर सरकार की यह पहल डिजिटल मंचों पर सामग्री के नियमन से जुड़े व्यापक प्रयासों का हिस्सा है। इससे पहले अगस्त में सरकारी अधिकारियों ने कंपनी के प्रतिनिधियों से कंटेंट रिकमेंडेशन एल्गोरिद्म, डीपफेक,कृत्रिम बुद्धिमत्ता से तैयार की गई सामग्री और गैरकानूनी कंटेंट के खिलाफ सुरक्षा उपायों को लेकर सवाल किए थे।

डीपफेक और कृत्रिम रूप से तैयार की गई तस्वीरों तथा वीडियो के बढ़ते इस्तेमाल ने सोशल मीडिया कंपनियों के सामने नई चुनौतियाँ खड़ी की हैं। ऐसी सामग्री वास्तविक घटनाओं जैसी दिखाई दे सकती है और यदि उसे पर्याप्त संदर्भ के बिना प्रसारित किया जाए,तो उपयोगकर्ताओं के लिए सही और गलत जानकारी के बीच अंतर करना कठिन हो सकता है।

इसी कारण सरकार अब केवल गैरकानूनी सामग्री हटाने तक सीमित रहने के बजाय इस बात पर भी ध्यान दे रही है कि सोशल मीडिया के एल्गोरिद्म किस प्रकार किसी पोस्ट की पहुँच बढ़ाते हैं। इस दृष्टिकोण में सामग्री की पहचान,उसकी समीक्षा और उसके बड़े स्तर पर प्रसार से जुड़े जोखिमों को समझना महत्वपूर्ण है।

मेटा ने हाल ही में बच्चों के यौन शोषण से संबंधित सामग्री को लेकर उठी चिंताओं के बाद कंटेंट और विज्ञापन सुरक्षा उपायों को मजबूत करने की जानकारी दी थी। कंपनी के अनुसार,उसने इस महीने की शुरुआत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर आधारित एक नई विज्ञापन समीक्षा प्रणाली लागू की है।

कंपनी ने दावा किया कि जनवरी से जून 2026 के बीच भारत में बाल यौन शोषण से संबंधित 53 लाख सामग्री हटाई गई। मेटा के मुताबिक,इनमें से 98 प्रतिशत से अधिक मामलों की पहचान कंपनी ने सक्रिय रूप से अपने स्तर पर की थी। यह आँकड़ा कंपनी की ओर से दी गई जानकारी पर आधारित है।

बाल सुरक्षा से जुड़े मामलों में ऐसी सामग्री की पहचान और उसे हटाने की क्षमता महत्वपूर्ण मानी जाती है। हालाँकि,इस दिशा में प्रभावी कार्रवाई के लिए लगातार निगरानी,तकनीकी सुधार और संदिग्ध सामग्री के प्रसार को रोकने की व्यवस्था की आवश्यकता बनी रहती है।

मेटा को जारी ताजा एडवाइजरी से स्पष्ट है कि सरकार सोशल मीडिया मंचों पर सामग्री के प्रसार और उसके संभावित सामाजिक प्रभावों को लेकर अधिक सक्रिय निगरानी चाहती है। अब ध्यान केवल इस बात पर नहीं है कि कोई पोस्ट नियमों का उल्लंघन करती है या नहीं,बल्कि इस पर भी है कि मंच की सिफारिश प्रणाली किसी सामग्री को कितनी तेजी से और कितने बड़े स्तर पर लोगों तक पहुँचाती है।

आने वाले समय में इन निर्देशों को लागू करने के लिए मेटा की ओर से उठाए गए कदम महत्वपूर्ण होंगे। साथ ही,विविध जानकारी तक पहुँच सुनिश्चित करने और भ्रामक सामग्री से जुड़े जोखिमों को कम करने के बीच संतुलन बनाए रखना भी एक बड़ी चुनौती होगी।

डिजिटल मंचों पर विश्वसनीय जानकारी की उपलब्धता,उपयोगकर्ताओं की सुरक्षा और कंपनियों की जवाबदेही से जुड़े ये मुद्दे भारत में सोशल मीडिया के नियमन की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।