वाशिंगटन/तेहरान,22 अप्रैल (युआईटीवी)- अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव अब आर्थिक मोर्चे पर भी गहराता नजर आ रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि मौजूदा हालात के चलते ईरान की अर्थव्यवस्था गंभीर दबाव में है और उसे हर दिन भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एक संक्षिप्त संदेश में कहा कि ईरान नकदी की भारी कमी से जूझ रहा है और उसकी आर्थिक स्थिति तेजी से बिगड़ रही है।
अपने बयान में ट्रंप ने यह भी कहा कि ईरान प्रतिदिन लगभग 50 करोड़ डॉलर तक का नुकसान झेल रहा है। उनका दावा है कि यह नुकसान मुख्य रूप से तेल निर्यात में बाधा और समुद्री व्यापार ठप होने के कारण हो रहा है। ट्रंप के अनुसार,इसी दबाव के चलते ईरान स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को फिर से खोलने की कोशिश कर रहा है,क्योंकि यह जलमार्ग उसकी अर्थव्यवस्था के लिए जीवनरेखा जैसा है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि ईरान के नौसैनिक और सुरक्षा बलों को वेतन देने में भी कठिनाई हो रही है,जिससे असंतोष की स्थिति पैदा हो सकती है।
स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र है। दुनिया के कुल तेल परिवहन का लगभग 20 प्रतिशत इसी मार्ग से गुजरता है। ऐसे में इस जलमार्ग पर किसी भी तरह की रुकावट का सीधा असर न केवल क्षेत्रीय बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान की अर्थव्यवस्था काफी हद तक तेल निर्यात और इसी समुद्री मार्ग पर निर्भर है,इसलिए नाकेबंदी का प्रभाव वहां की आर्थिक गतिविधियों पर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है।
आर्थिक विश्लेषणों के अनुसार,यदि नाकेबंदी लंबे समय तक जारी रहती है,तो ईरान को प्रतिदिन लगभग 43.5 करोड़ डॉलर तक का नुकसान हो सकता है। यह नुकसान तेल निर्यात में गिरावट,व्यापारिक गतिविधियों में कमी और समुद्री परिवहन के बाधित होने से जुड़ा हुआ है। इसके अलावा,रिपोर्ट्स में यह भी सामने आया है कि ईरान का 90 प्रतिशत से अधिक समुद्री व्यापार इसी मार्ग से संचालित होता है। ऐसे में यदि यह मार्ग अवरुद्ध रहता है,तो देश की आर्थिक गतिविधियाँ लगभग ठहर सकती हैं।
इस संकट का असर केवल ईरान तक सीमित नहीं है। खाड़ी क्षेत्र में समुद्री गतिविधियों में भी भारी गिरावट दर्ज की गई है। जहाँ पहले प्रतिदिन 100 से अधिक जहाज इस मार्ग से गुजरते थे,वहीं अब यह संख्या काफी कम हो गई है। कई तेल टैंकर और मालवाहक जहाज रास्ते में ही फँसे हुए हैं,जिससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो रही है। इससे अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में तेल की कीमतों में अस्थिरता देखने को मिल रही है और कई देशों को ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंता सताने लगी है।
अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि यह आर्थिक दबाव एक रणनीति के तहत बनाया गया है,जिसका उद्देश्य ईरान को वार्ता की मेज पर लाना है। अमेरिका का मानना है कि आर्थिक प्रतिबंध और नाकेबंदी के जरिए ईरान को अपने रुख में बदलाव के लिए मजबूर किया जा सकता है। हालाँकि,ईरान ने इस नीति को सख्ती से खारिज करते हुए इसे “आर्थिक युद्ध” करार दिया है। तेहरान का कहना है कि इस तरह की कार्रवाइयाँ अंतर्राष्ट्रीय नियमों के खिलाफ हैं और यदि दबाव जारी रहा तो वह इसका जवाब देने के लिए बाध्य होगा।
इस बीच,अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी इस संकट को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने पहले ही चेतावनी दी है कि यदि ऊर्जा आपूर्ति में बाधा बनी रहती है,तो इसका असर वैश्विक आर्थिक वृद्धि पर पड़ सकता है। महँगाई में वृद्धि,आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और व्यापारिक गतिविधियों में कमी जैसी समस्याएँ उभर सकती हैं।
विशेषज्ञ संस्थानों का भी मानना है कि यदि हॉर्मुज जलडमरूमध्य लंबे समय तक प्रभावित रहता है,तो इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा। तेल की कीमतों में तेज उछाल आ सकता है, जिससे विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा। इसके अलावा,ऊर्जा संकट के चलते कई देशों को वैकल्पिक आपूर्ति स्रोत तलाशने पड़ सकते हैं,जो अल्पकालिक समाधान तो दे सकते हैं,लेकिन दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित नहीं कर पाएंगे।
इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मध्य पूर्व क्षेत्र में जारी तनाव केवल क्षेत्रीय मुद्दा नहीं है,बल्कि इसका वैश्विक प्रभाव भी व्यापक है। ईरान और अमेरिका के बीच टकराव ने एक बार फिर दुनिया को यह याद दिलाया है कि ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री मार्गों की सुरक्षा कितनी महत्वपूर्ण है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि क्या दोनों पक्ष बातचीत के जरिए समाधान निकालते हैं या फिर यह गतिरोध और गहराता है,जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर और गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
