नई दिल्ली,19 जून (युआईटीवी)- भारतीय टेबल टेनिस में एशियन गेम्स 2026 के लिए टीम चयन को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। टेबल टेनिस फेडरेशन ऑफ इंडिया द्वारा जापान में आयोजित होने वाले 20वें एशियन गेम्स के लिए पुरुष और महिला टीमों की घोषणा के बाद देश की स्टार पैडलर और ओलंपियन मनिका बत्रा ने चयन प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं। भारतीय टेबल टेनिस की सबसे सफल खिलाड़ियों में शामिल मनिका बत्रा को मुख्य टीम में जगह नहीं मिली है और उन्हें रिजर्व खिलाड़ियों की सूची में रखा गया है। इस फैसले ने खेल जगत में बहस छेड़ दी है और अब स्वयं मनिका ने भी इस पूरे मामले में पारदर्शिता और जवाबदेही की माँग करते हुए खेल मंत्री डॉ. मनसुख मंडाविया तथा भारतीय ओलंपिक संघ से हस्तक्षेप करने की अपील की है।
जापान के आइची-नागोया में 19 सितंबर से 4 अक्टूबर 2026 तक आयोजित होने वाले एशियन गेम्स के लिए भारतीय टेबल टेनिस टीम की कमान महिला वर्ग में श्रीजा अकुला और पुरुष वर्ग में जी. साथियान को सौंपी गई है। महिला टीम में श्रीजा अकुला,यशस्वी घोरपड़े,दिया चितले,सुतीर्था मुखर्जी और सिंड्रेला दास को शामिल किया गया है। वहीं पुरुष टीम में जी. साथियान के अलावा हरमीत देसाई,मानव ठक्कर,मानुष शाह और पायस जैन को जगह मिली है। रिजर्व खिलाड़ियों की सूची में मनिका बत्रा,स्वस्तिका घोष,अंकुर भट्टाचार्य और रोनित भंजा को रखा गया है।
टीम की घोषणा के तुरंत बाद सबसे अधिक चर्चा मनिका बत्रा के चयन न होने को लेकर शुरू हुई। पिछले कई वर्षों से भारतीय टेबल टेनिस की पहचान बन चुकी मनिका का मुख्य टीम में स्थान न मिलना कई लोगों के लिए हैरान करने वाला था। यही वजह है कि अब यह मामला केवल एक खिलाड़ी के चयन या बहिष्कार तक सीमित नहीं रह गया है,बल्कि चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर भी सवाल उठने लगे हैं।
मनिका बत्रा ने अपने विस्तृत बयान में कहा कि उन्होंने लगभग दो दशकों तक भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए अपना जीवन समर्पित किया है। उनके अनुसार उन्होंने कभी किसी विशेष सुविधा या विशेष व्यवहार की माँग नहीं की,बल्कि हमेशा यही अपेक्षा की कि सभी खिलाड़ियों के लिए एक जैसे नियम लागू हों। उन्होंने कहा कि टीम से बाहर किए जाने का दुख केवल चयन न होने के कारण नहीं है,बल्कि इस बात को लेकर भी है कि चयन के नियमों को किस प्रकार समझा और लागू किया गया।
मनिका का कहना है कि उन्हें यह स्पष्ट रूप से नहीं बताया गया कि आखिर किन कारणों से उनका चयन नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि किसी भी खिलाड़ी के लिए यह जानना जरूरी होता है कि चयन या गैर-चयन के पीछे क्या आधार रहा है। यदि चयन नीति सार्वजनिक रूप से घोषित है,तो उसके प्रत्येक पहलू को भी पारदर्शी तरीके से खिलाड़ियों के सामने रखा जाना चाहिए।
एशियन गेम्स 2026 के लिए घोषित चयन नीति के अनुसार खिलाड़ियों के चयन में राष्ट्रीय रैंकिंग को 50 प्रतिशत,विश्व रैंकिंग को 40 प्रतिशत और चयन समिति के विवेकाधीन निर्णय को 10 प्रतिशत महत्व दिया गया है। फेडरेशन का कहना है कि इसी नीति के आधार पर सर्वश्रेष्ठ और लगातार अच्छा प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों को चुना गया है। हालाँकि,मनिका का मानना है कि इस नीति को लागू करने के तरीके पर सवाल उठाना जरूरी है।
मनिका ने अपने बयान में पिछले एशियन गेम्स की चयन प्रक्रिया का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि उस समय ऐसे खिलाड़ियों को भी टीम में शामिल किया गया था,जो निर्धारित विश्व रैंकिंग और राष्ट्रीय रैंकिंग मानकों से बाहर थे। उनके अनुसार यदि उस समय विशेष परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए चयन समिति ने विवेकाधीन अधिकार का उपयोग किया था,तो यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि वर्तमान चयन प्रक्रिया में ऐसे प्रावधानों को किस प्रकार लागू किया गया और उनके मामले में क्यों नहीं किया गया।
विश्व रैंकिंग को लेकर भी मनिका ने अपनी बात रखी। वर्तमान में उनकी विश्व रैंकिंग 51 है। उन्होंने कहा कि हाल ही में वह शीर्ष 50 खिलाड़ियों की सूची से बाहर हुई हैं और यह अंतर बेहद मामूली है। उनके अनुसार ऐसी रैंकिंग में थोड़े समय के भीतर उतार-चढ़ाव होना सामान्य बात है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या केवल एक रैंक का अंतर किसी खिलाड़ी के वर्षों के प्रदर्शन और अंतर्राष्ट्रीय उपलब्धियों से अधिक महत्वपूर्ण माना जा सकता है।
मनिका ने अंतर्राष्ट्रीय रैंकिंग प्रणाली की प्रकृति पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि विश्व रैंकिंग एक रोलिंग प्रणाली पर आधारित होती है,जिसमें पुराने अंक समय-समय पर हटते रहते हैं और नए अंक जुड़ते रहते हैं। इसलिए किसी खिलाड़ी की रैंकिंग हमेशा उसके वर्तमान फॉर्म की पूरी तस्वीर नहीं दिखाती। उनका मानना है कि यदि रैंकिंग को चयन का प्रमुख आधार बनाया जाता है,तो यह भी देखा जाना चाहिए कि रैंकिंग में आया बदलाव हाल का है या लंबे समय से बना हुआ है।
उन्होंने इस सीजन के अपने प्रदर्शन का भी उल्लेख किया और कहा कि उन्होंने कई मजबूत अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ियों के खिलाफ जीत हासिल की है। उनके अनुसार चीन की युवा चैंपियन सहित कई शीर्ष एशियाई खिलाड़ियों के विरुद्ध उनके परिणाम इस बात का प्रमाण हैं कि वह अभी भी उच्च स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम हैं। उन्होंने कहा कि एक खिलाड़ी की क्षमता का मूल्यांकन केवल रैंकिंग के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए,बल्कि उसके हालिया प्रदर्शन और बड़े मंचों पर निरंतरता को भी महत्व दिया जाना चाहिए।
राष्ट्रीय रैंकिंग में शामिल न होने के मुद्दे पर मनिका ने कहा कि उन्होंने घरेलू प्रतियोगिताओं में हिस्सा नहीं लिया था,जिसके कारण उनका नाम राष्ट्रीय रैंकिंग सूची में नहीं आ सका। हालाँकि,उन्होंने यह भी कहा कि आधुनिक खेलों में अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं की संख्या लगातार बढ़ रही है और शीर्ष स्तर पर बने रहने के लिए खिलाड़ियों को वर्षभर विदेशों में विभिन्न टूर्नामेंट खेलने पड़ते हैं। ऐसे में हर घरेलू प्रतियोगिता में भाग लेना हमेशा संभव नहीं होता।
मनिका का कहना है कि उनके पूरे करियर का केंद्र अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करना रहा है। इसलिए घरेलू प्रतियोगिताओं में उनकी अनुपस्थिति को अलग संदर्भ में नहीं देखा जाना चाहिए। उनका मानना है कि अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं को ध्यान में रखते हुए ही किसी खिलाड़ी के घरेलू कार्यक्रम का मूल्यांकन किया जाना चाहिए।
भारतीय टेबल टेनिस के इतिहास में मनिका बत्रा का योगदान बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। उन्होंने 2018 एशियन गेम्स में मिश्रित युगल स्पर्धा में कांस्य पदक जीता था। इसके अलावा एशियन कप में महिला एकल वर्ग का कांस्य पदक भी उनके नाम है। राष्ट्रमंडल खेलों में भी उन्होंने भारत के लिए कई पदक जीते हैं और भारतीय टेबल टेनिस को नई पहचान दिलाई है।
मनिका भारतीय महिला टेबल टेनिस की उन चुनिंदा खिलाड़ियों में शामिल हैं,जिन्होंने अंतर्राष्ट्रीय मंच पर लगातार सफलता हासिल की है। वह ओलंपिक खेलों में महिला एकल स्पर्धा के अंतिम 16 में पहुँचने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी बनी थीं। इसके अलावा एशियन गेम्स के एकल वर्ग के क्वार्टर फाइनल तक पहुँचने वाली भी वह पहली भारतीय टेबल टेनिस खिलाड़ी रही हैं। उनकी ये उपलब्धियाँ भारतीय खेल इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं।
अपने बयान में मनिका ने कहा कि चयन प्रक्रिया में सबसे बड़ी चिंता नियमों को लागू करने में एकरूपता की है। यदि चयन समिति को विवेकाधीन अधिकार प्राप्त हैं,तो उनके उपयोग की प्रक्रिया स्पष्ट,पारदर्शी और रिकॉर्ड आधारित होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि एक ही प्रकार की परिस्थितियों में अलग-अलग खिलाड़ियों के साथ अलग व्यवहार किया जाता है तो स्वाभाविक रूप से निष्पक्षता पर सवाल उठेंगे।
उन्होंने यह भी बताया कि उन्होंने आधिकारिक रूप से फेडरेशन से विस्तृत जानकारी माँगी है। इस जानकारी में चयन का आधार,लागू किए गए नियम,चयन मानदंड और प्रत्येक मानदंड को दिए गए महत्व की पूरी जानकारी शामिल है। उनका कहना है कि उन्हें उम्मीद है कि उन्हें तथ्यों और दस्तावेजों पर आधारित स्पष्ट जवाब मिलेगा।
मनिका ने यह भी स्पष्ट किया कि उनका बयान किसी व्यक्तिगत शिकायत या विशेष रियायत की माँग नहीं है। उनके अनुसार यह मुद्दा केवल उनके चयन का नहीं,बल्कि पूरी चयन प्रणाली की पारदर्शिता और जवाबदेही का है। उन्होंने कहा कि खिलाड़ी अपने जीवन के कई वर्ष देश के लिए समर्पित करते हैं और बदले में उन्हें एक ऐसी चयन प्रक्रिया मिलनी चाहिए जो स्पष्ट,निष्पक्ष और सभी पर समान रूप से लागू हो।
इस पूरे विवाद ने भारतीय टेबल टेनिस प्रशासन के सामने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर फेडरेशन का दावा है कि चयन पूरी तरह घोषित नीति के अनुसार किया गया है,वहीं दूसरी ओर देश की सबसे अनुभवी खिलाड़ियों में शामिल मनिका बत्रा चयन प्रक्रिया की व्याख्या और उसके अनुप्रयोग पर सवाल उठा रही हैं। ऐसे में अब खेल मंत्रालय और भारतीय ओलंपिक संघ की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है।
एशियन गेम्स जैसे बड़े बहु-खेल आयोजन में किसी भी खिलाड़ी का चयन या गैर-चयन हमेशा चर्चा का विषय बनता है,लेकिन जब मामला देश की सबसे सफल खिलाड़ियों में से एक का हो तो स्वाभाविक रूप से उस पर अधिक ध्यान जाता है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि टेबल टेनिस फेडरेशन ऑफ इंडिया मनिका द्वारा उठाए गए सवालों का क्या जवाब देता है और क्या चयन प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक किए जाते हैं।
फिलहाल इतना तय है कि मनिका बत्रा ने केवल अपने लिए नहीं,बल्कि चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही के व्यापक मुद्दे को सामने रखा है। उनके सवालों ने भारतीय खेल प्रशासन में निष्पक्ष चयन की आवश्यकता पर एक बार फिर बहस छेड़ दी है। अब सभी की निगाहें फेडरेशन,खेल मंत्रालय और भारतीय ओलंपिक संघ की अगली प्रतिक्रिया पर टिकी हुई हैं,क्योंकि यह मामला केवल एक खिलाड़ी के चयन का नहीं,बल्कि भारतीय खेल व्यवस्था में विश्वास और पारदर्शिता का भी है।
