चेन्नई,24 सितंबर (युआईटीवी)- ग्रेनाइट कारोबारी आर. वीरमणि के खिलाफ दर्ज पॉक्सो मामले की जाँच अब उस पुलिस टीम के कामकाज तक पहुँच गई है,जिसने शिकायत मिलने के बाद शुरुआती जाँच की थी। मामले को पहले बंद करने की कोशिश और बाद में अदालत की ओर से उस निष्कर्ष को स्वीकार नहीं किए जाने के बाद सेंट्रल क्राइम ब्रांच ने जाँच का दायरा बढ़ा दिया है। इसी क्रम में तीन पुलिस अधिकारियों को पूछताछ के लिए समन जारी किया गया है। इन अधिकारियों से यह जानने की कोशिश की जाएगी कि पिछले वर्ष शिकायत दर्ज होने के बाद मामले की जाँच किस तरह की गई और किन आधारों पर केस को बंद करने की रिपोर्ट तैयार की गई थी।
जिन अधिकारियों को सीसीबी ने पूछताछ के लिए बुलाया है,उनमें एंटी-वाइस यूनिट में तैनात असिस्टेंट कमिश्नर यास्मीन, इंस्पेक्टर महेश कुमार और इंस्पेक्टर राजलक्ष्मी शामिल हैं। इन तीनों अधिकारियों ने वीरमणि के खिलाफ नाबालिगों के कथित यौन शोषण से संबंधित शिकायत की शुरुआती जाँच में भूमिका निभाई थी। अब सीसीबी यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि उस दौरान शिकायत का मूल्यांकन किस तरीके से किया गया,किन लोगों से पूछताछ की गई,कौन-कौन से साक्ष्य जुटाए गए और आखिर किस आधार पर मामले को आगे बढ़ाने के बजाय बंद करने की सिफारिश की गई।
पुलिस सूत्रों के मुताबिक,अधिकारियों से पूछताछ का उद्देश्य पिछली जाँच की प्रक्रिया और उसके निष्कर्ष को समझना है। जाँचकर्ता यह भी देख रहे हैं कि क्या शुरुआती जाँच के दौरान किसी महत्वपूर्ण तथ्य या साक्ष्य पर पर्याप्त ध्यान दिया गया था। इसके साथ ही यह भी जाँच का हिस्सा है कि शिकायत से जुड़े संभावित सुरागों पर किस स्तर तक कार्रवाई की गई और मामले को बंद करने का निर्णय किन परिस्थितियों में लिया गया।
यह मामला अक्टूबर 2025 में सामने आया था। उस समय वीरमणि के खिलाफ पॉक्सो कानून के तहत शिकायत दर्ज की गई थी। शुरुआती जाँच के बाद पुलिस ने मामले को बंद करने की दिशा में कदम बढ़ाया था। हालाँकि,अदालत ने पुलिस की ओर से प्रस्तुत निष्कर्ष को स्वीकार नहीं किया और मामले में नए सिरे से जाँच करने का निर्देश दिया। इसके बाद जाँच की प्रक्रिया दोबारा शुरू हुई और आगे चलकर वीरमणि तथा मामले से जुड़े अन्य लोगों की गिरफ्तारियाँ हुईं।
वीरमणि पर नाबालिगों के यौन शोषण के गंभीर आरोप लगाए गए हैं। इन आरोपों के आधार पर पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया और बाद में उन्हें पुझल जेल भेजा गया। मामले में शांति और उनके पति महेंद्र सिम्हन को भी गिरफ्तार किया गया है। पुलिस का आरोप है कि दोनों ने कथित शोषण में सहायता की थी। इसके अलावा वीरमणि के पूर्व सहयोगी गणेशन को भी गिरफ्तार किया गया है। हालाँकि,गिरफ्तार किए गए सभी लोगों के खिलाफ लगाए गए आरोप अभी जाँच और न्यायिक प्रक्रिया के अधीन हैं।
मामले की दोबारा जाँच शुरू होने के बाद अब सीसीबी का ध्यान केवल कथित अपराध की जाँच तक सीमित नहीं है,बल्कि इस बात पर भी केंद्रित है कि पहली जाँच किस तरह की गई थी। यही वजह है कि शुरुआती जाँच से जुड़े अधिकारियों को समन भेजकर उनसे विस्तृत पूछताछ की जा रही है। जाँचकर्ताओं के सामने सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यदि शिकायत में पर्याप्त आधार नहीं था,तो केस बंद करने का निर्णय किन तथ्यों के आधार पर लिया गया और यदि कुछ महत्वपूर्ण साक्ष्य मौजूद थे तो उन पर उस समय आगे कार्रवाई क्यों नहीं की गई।
जाँच एजेंसियाँ वीरमणि के खिलाफ लगाए गए उन आरोपों की भी पड़ताल कर रही हैं, जिनमें कथित तौर पर लंबे समय तक नाबालिगों के शोषण की बात कही गई है। शिकायत से जुड़े दावों में यह आरोप सामने आया है कि कथित शोषण वर्ष 2003 से शुरू हुआ और लगभग 23 वर्षों तक चलता रहा। हालाँकि,इस अवधि और आरोपों के विस्तृत स्वरूप की स्वतंत्र न्यायिक पुष्टि अभी नहीं हुई है। पुलिस ने सार्वजनिक रूप से यह भी स्पष्ट नहीं किया है कि मामले में कथित पीड़ितों की संख्या कितनी है या कितनी अलग-अलग घटनाओं की जाँच की जा रही है।
इस वजह से सीसीबी की मौजूदा जाँच में पुराने रिकॉर्ड और शुरुआती शिकायत से जुड़ी सामग्री को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जाँचकर्ता यह समझने की कोशिश करेंगे कि शिकायत में लगाए गए आरोपों की जाँच किस स्तर तक की गई थी और क्या उस समय संभावित पीड़ितों,गवाहों या अन्य संबंधित लोगों के बयान दर्ज किए गए थे। साथ ही, उपलब्ध दस्तावेजों और अन्य साक्ष्यों की समीक्षा भी की जा सकती है,ताकि यह पता चल सके कि शुरुआती जाँच में कोई महत्वपूर्ण पहलू छूट तो नहीं गया था।
तीन अधिकारियों को समन भेजे जाने का अर्थ यह नहीं है कि उनके खिलाफ किसी तरह का अपराध या कदाचार साबित हो गया है। उनसे पूछताछ का मौजूदा उद्देश्य पिछली जाँच की प्रक्रिया और केस बंद करने की सिफारिश के आधार को समझना है। अभी तक इन अधिकारियों के खिलाफ कोई अंतिम निष्कर्ष सामने नहीं आया है। जाँच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि शुरुआती जाँच में कोई प्रक्रियागत कमी रही थी या मामले को बंद करने के पीछे उस समय उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर कोई उचित कारण था।
इस मामले में अदालत की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है। शुरुआती जाँच के बाद पुलिस द्वारा मामले को बंद करने की कोशिश के बावजूद अदालत ने उस निष्कर्ष को स्वीकार नहीं किया और नए सिरे से जाँच के निर्देश दिए। इसके बाद जाँच का स्वरूप बदल गया और पुलिस ने आरोपों की दोबारा पड़ताल शुरू की। बाद में हुई गिरफ्तारियों ने मामले को और गंभीर बना दिया। अब उसी क्रम में जाँच उस टीम तक पहुँच गई है,जिसने सबसे पहले शिकायत पर कार्रवाई की थी।
सीसीबी के सामने अब दो स्तरों पर जांच की जिम्मेदारी है। एक ओर उसे वीरमणि और अन्य आरोपियों के खिलाफ लगाए गए पॉक्सो संबंधी आरोपों की सच्चाई और उपलब्ध साक्ष्यों की जाँच करनी है,वहीं दूसरी ओर उसे यह भी पता लगाना है कि पहली जाँच में केस बंद करने का निर्णय कैसे लिया गया। जाँच एजेंसी यह निर्धारित करने की कोशिश करेगी कि उस समय उपलब्ध जानकारी का सही तरीके से मूल्यांकन हुआ था या नहीं और क्या किसी महत्वपूर्ण सुराग को आगे नहीं बढ़ाया गया।
पूछताछ के दौरान अधिकारियों से शिकायत मिलने के बाद उठाए गए कदम,दर्ज किए गए बयान,जुटाए गए दस्तावेज,साक्ष्यों का आकलन और केस बंद करने की सिफारिश से जुड़े कारणों के बारे में जानकारी ली जा सकती है। इन बिंदुओं से यह समझने में मदद मिल सकती है कि शुरुआती जाँच और बाद की जाँच के निष्कर्षों में अंतर क्यों आया।
फिलहाल वीरमणि समेत गिरफ्तार किए गए लोगों के खिलाफ लगाए गए आरोपों की जाँच जारी है। मामले में अदालत की आगे की कार्यवाही भी महत्वपूर्ण होगी। वहीं तीन पुलिस अधिकारियों से पूछताछ के बाद यह सामने आ सकता है कि पहली जाँच में केस बंद करने का आधार क्या था और बाद में अदालत के निर्देश पर शुरू हुई जाँच में किन नए तथ्यों या साक्ष्यों के आधार पर कार्रवाई आगे बढ़ी। जब तक जाँच पूरी नहीं होती और अदालत किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचती,तब तक किसी भी आरोपी या जाँच अधिकारी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को अंतिम रूप से साबित तथ्य नहीं माना जा सकता।
