संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश (तस्वीर क्रेडिट@rashtra_press)

संयुक्त राष्ट्र में भारत ने रखा शांति निर्माण का विजन,हरीश पी बोले- राष्ट्रीय स्वामित्व और भरोसेमंद साझेदारी ही टिकाऊ शांति की कुंजी

नई दिल्ली,26 जून (युआईटीवी)- संयुक्त राष्ट्र में भारत ने एक बार फिर वैश्विक शांति, स्थिरता और समावेशी विकास को लेकर अपना स्पष्ट और संतुलित दृष्टिकोण दुनिया के सामने रखा है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में ‘पीसबिल्डिंग एंड सस्टेनिंग पीस’ विषय पर आयोजित उच्चस्तरीय बहस के दौरान संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि हरीश पी ने कहा कि स्थायी शांति केवल बाहरी सहायता से संभव नहीं है,बल्कि इसके लिए संबंधित देश की प्राथमिकताओं,राष्ट्रीय स्वामित्व और मजबूत संस्थागत क्षमता को केंद्र में रखना आवश्यक है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि शांति निर्माण की प्रक्रिया मांग आधारित होनी चाहिए और इसे पारंपरिक दाता-प्राप्तकर्ता दृष्टिकोण से आगे ले जाने की आवश्यकता है।

इससे पहले हरीश पी ने संयुक्त राष्ट्र की शांति निर्माण संरचना के 20 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित पहले ‘पीसबिल्डिंग वीक’ के दौरान पीसबिल्डिंग आयोग के वार्षिक सत्र में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया। दोनों मंचों पर उन्होंने भारत की ओर से यह संदेश दिया कि किसी भी संघर्षग्रस्त देश में स्थायी शांति तभी स्थापित हो सकती है,जब उस देश की सरकार और समाज स्वयं शांति प्रक्रिया का नेतृत्व करें तथा अंतर्राष्ट्रीय समुदाय सहयोगी की भूमिका निभाए।

अपने संबोधन की शुरुआत में हरीश पी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में इस महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा आयोजित किए जाने का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि यह बहस ऐसे समय में हो रही है, जब संयुक्त राष्ट्र पहली बार पीसबिल्डिंग वीक का आयोजन कर रहा है। उन्होंने पीसबिल्डिंग आयोग के अध्यक्ष राजदूत उमर हिलाले, पूर्व अध्यक्ष राजदूत रिकलेफ और आयोग के अन्य सदस्यों के योगदान की सराहना की। साथ ही उन्होंने मिस्र और स्लोवेनिया की उस भूमिका की भी प्रशंसा की,जिसके तहत उन्होंने संयुक्त राष्ट्र की शांति निर्माण संरचना की चौथी समीक्षा में सह-सुविधाकर्ता के रूप में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

हरीश पी ने कहा कि पीसबिल्डिंग आयोग के उन्नीसवें सत्र के दौरान कई उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल हुई हैं। इनमें संयुक्त राष्ट्र की शांति निर्माण संरचना की चौथी समीक्षा, पहली राष्ट्रीय शांति निर्माण रणनीति की प्रस्तुति तथा पीसबिल्डिंग फंड के साथ पहला वार्षिक रणनीतिक संवाद विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहे। उन्होंने कहा कि यह रणनीतिक संवाद उस समय आयोजित किया गया,जब संयुक्त राष्ट्र महासभा ने पहली बार पीसबिल्डिंग फंड के लिए पाँच करोड़ डॉलर के अनिवार्य वित्तीय योगदान को मंजूरी दी थी। इसे उन्होंने शांति निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण संस्थागत कदम बताया।

हालाँकि,उन्होंने इस अवसर पर वित्तीय संसाधनों की कमी को लेकर भी गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने महासचिव की रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए कहा कि पिछले तीन वर्षों के दौरान पीसबिल्डिंग फंड के लिए स्वैच्छिक योगदान में लगातार गिरावट दर्ज की गई है। इसके साथ ही संयुक्त राष्ट्र की मौजूदा वित्तीय स्थिति ने भी शांति निर्माण गतिविधियों के लिए उपलब्ध संसाधनों को प्रभावित किया है। उन्होंने इसे चिंताजनक प्रवृत्ति बताते हुए कहा कि सीमित संसाधनों के बीच अधिक प्रभावी परिणाम प्राप्त करने के लिए प्राथमिकताओं को स्पष्ट करना आवश्यक होगा।

उन्होंने कहा कि भविष्य में उपलब्ध संसाधनों का उपयोग विशेष रूप से संघर्ष के बाद पुनर्निर्माण की स्थिति वाले देशों पर केंद्रित होना चाहिए। ऐसे देशों में शांति बनाए रखने के साथ-साथ मजबूत संस्थागत ढाँचा तैयार करना,प्रशासनिक क्षमता बढ़ाना और सामाजिक विश्वास को पुनर्स्थापित करना सबसे बड़ी आवश्यकता होती है। उन्होंने उम्मीद जताई कि पीसबिल्डिंग फंड की अगली रणनीतिक योजना तैयार करते समय इस दिशा में और ठोस प्रगति देखने को मिलेगी।

हरीश पी ने इस वर्ष आयोजित पीसबिल्डिंग वीक की थीम ‘संयुक्त राष्ट्र पीसबिल्डिंग @20 : नवाचार, समावेशन और प्रभाव के लिए साझेदारी’ को वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप बताया। उन्होंने कहा कि बदलती वैश्विक चुनौतियों के बीच शांति निर्माण की पारंपरिक अवधारणाओं में बदलाव की जरूरत है। केवल आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है,बल्कि स्थानीय परिस्थितियों को समझते हुए संबंधित देशों की आवश्यकताओं के अनुरूप समाधान विकसित करना अधिक महत्वपूर्ण है।

उन्होंने बताया कि इस वर्ष की शुरुआत में भारत ने विभिन्न हितधारकों के साथ मिलकर ‘बदलते वैश्विक परिदृश्य में शांति स्थापना और शांति निर्माण’ विषय पर एक विशेष विचार-विमर्श का आयोजन किया था। इस चर्चा के दौरान भी इस बात पर व्यापक सहमति बनी थी कि टिकाऊ शांति केवल भरोसे,सम्मान और समान भागीदारी पर आधारित सहयोग से ही संभव है। उन्होंने कहा कि अंतर्राष्ट्रीय साझेदारी तभी प्रभावी होगी,जब संबंधित देश की संप्रभुता और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं का पूरा सम्मान किया जाएगा।

भारत के स्थायी प्रतिनिधि ने स्पष्ट रूप से कहा कि अब समय आ गया है कि शांति निर्माण की प्रक्रिया को पारंपरिक दाता और प्राप्तकर्ता की सोच से बाहर निकाला जाए। उन्होंने कहा कि किसी भी देश पर बाहरी मॉडल थोपने के बजाय उसकी अपनी आवश्यकताओं, सामाजिक परिस्थितियों और विकास संबंधी प्राथमिकताओं के अनुसार सहायता उपलब्ध कराई जानी चाहिए। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का कार्य सहयोग करना है,न कि किसी देश की नीतियों को निर्धारित करना। यही दृष्टिकोण स्थायी शांति की मजबूत नींव रख सकता है।

उन्होंने कहा कि शांति निर्माण की वास्तविक सफलता इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि किसी देश में कितनी धनराशि खर्च की गई,बल्कि इससे मापी जानी चाहिए कि वहां कितनी मजबूत राष्ट्रीय संस्थाएँ विकसित हुईं,प्रशासनिक क्षमता कितनी बढ़ी और समाज संकटों का सामना करने के लिए कितना सक्षम बना। यदि किसी देश की संस्थाएँ मजबूत हों और शासन व्यवस्था प्रभावी हो,तो भविष्य में संघर्ष की संभावना स्वतः कम हो जाती है।

अपने संबोधन में हरीश पी ने महिलाओं की भूमिका को भी विशेष महत्व दिया। उन्होंने कहा कि भारत महिलाओं,शांति और सुरक्षा एजेंडा के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है। उन्होंने उल्लेख किया कि इसी महीने भारत की मेजर अभिलाषा बराक को वर्ष 2025 के ‘मिलिट्री जेंडर एडवोकेट ऑफ द ईयर’ सम्मान से सम्मानित किया गया है। उन्होंने कहा कि यह सम्मान केवल एक अधिकारी की उपलब्धि नहीं है,बल्कि यह शांति अभियानों में महिलाओं की बढ़ती भूमिका और भारत की प्रतिबद्धता का भी प्रतीक है।

उन्होंने कहा कि भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों में सक्रिय योगदान देता रहा है। भारतीय सैनिकों,पुलिस अधिकारियों और विशेषज्ञों ने दुनिया के अनेक संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में शांति बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारत का मानना है कि महिलाओं की भागीदारी बढ़ने से शांति निर्माण की प्रक्रिया अधिक समावेशी,संवेदनशील और प्रभावी बनती है।

हरीश पी ने कहा कि भारत अपने राष्ट्र निर्माण के अनुभवों को अन्य देशों के साथ साझा करने के लिए भी पूरी तरह तैयार है। उन्होंने कहा कि भारत ने विविधता,लोकतंत्र,समावेशी विकास और संस्थागत मजबूती के आधार पर अनेक चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना किया है। यही अनुभव उन देशों के लिए उपयोगी हो सकते हैं,जो संघर्ष के बाद पुनर्निर्माण और स्थायी शांति स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में शांति निर्माण केवल सुरक्षा का विषय नहीं रह गया है। इसके साथ आर्थिक विकास,सामाजिक न्याय,समावेशी शासन, शिक्षा,स्वास्थ्य और संस्थागत क्षमता निर्माण जैसे अनेक पहलू जुड़े हुए हैं। यदि इन सभी क्षेत्रों में समानांतर रूप से प्रगति नहीं होगी,तो स्थायी शांति स्थापित करना कठिन होगा।

अपने संबोधन के अंत में भारत के स्थायी प्रतिनिधि ने दोहराया कि शांति निर्माण का केंद्र राष्ट्रीय स्वामित्व होना चाहिए। अंतर्राष्ट्रीय सहयोग भरोसे,सम्मान और समानता पर आधारित होना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत संयुक्त राष्ट्र और सभी साझेदार देशों के साथ मिलकर वैश्विक शांति,स्थिरता और समावेशी विकास को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है। उनका संदेश स्पष्ट था कि स्थायी शांति किसी बाहरी हस्तक्षेप से नहीं,बल्कि स्थानीय नेतृत्व, मजबूत संस्थाओं,समावेशी विकास और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के संतुलित संयोजन से ही संभव है।