नई दिल्ली,26 जून (युआईटीवी)- देश में इन दिनों पासपोर्ट और नागरिकता को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच पूर्व राजनयिक दीपक वोहरा ने दोनों के बीच के अंतर को विस्तार से समझाते हुए कहा है कि पासपोर्ट और नागरिकता को एक-दूसरे का पर्याय मानना सही नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पासपोर्ट मूल रूप से एक यात्रा दस्तावेज है,जबकि नागरिकता किसी व्यक्ति की कानूनी पहचान,उसके अधिकारों और दायित्वों से जुड़ा विषय है। उनके अनुसार,राष्ट्रीयता,नागरिकता और पासपोर्ट तीन अलग-अलग अवधारणाएँ हैं,लेकिन आम लोगों के बीच अक्सर इन्हें एक ही समझ लिया जाता है। उन्होंने कहा कि इस विषय को लेकर अनावश्यक भ्रम और राजनीतिक विवाद पैदा किया जा रहा है,जबकि अंतर्राष्ट्रीय कानून और राजनयिक व्यवस्थाएँ इन तीनों के बीच स्पष्ट अंतर निर्धारित करती हैं।
दीपक वोहरा ने अपने लंबे राजनयिक अनुभव के आधार पर इस विषय को सरल भाषा में समझाने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि नागरिकता और राष्ट्रीयता समान शब्द नहीं हैं। नागरिकता एक कानूनी दर्जा है,जिसे किसी देश का संविधान और उसके कानून प्रदान करते हैं। किसी व्यक्ति को जन्म के आधार पर,माता-पिता की नागरिकता के आधार पर या प्राकृतिककरण की प्रक्रिया के माध्यम से नागरिकता प्राप्त हो सकती है। नागरिकता मिलने के बाद व्यक्ति को उस देश में मतदान करने,सरकारी सुविधाओं का लाभ लेने,कानूनी सुरक्षा प्राप्त करने और संविधान द्वारा दिए गए अन्य अधिकार हासिल होते हैं। इसके साथ ही नागरिकों पर कुछ जिम्मेदारियाँ भी होती हैं,जैसे कानून का पालन करना,करों का भुगतान करना और देश के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना।
उन्होंने कहा कि दूसरी ओर राष्ट्रीयता का अर्थ हमेशा नागरिकता नहीं होता। कई देशों में राष्ट्रीयता का संबंध व्यक्ति की जातीय,सांस्कृतिक,भाषाई या क्षेत्रीय पहचान से भी जोड़ा जाता है। इसी वजह से नागरिकता और राष्ट्रीयता को अलग-अलग संदर्भों में समझना आवश्यक है। उन्होंने बताया कि लोगों के बीच अक्सर यह गलतफहमी रहती है कि यदि किसी दस्तावेज में राष्ट्रीयता लिखी है,तो उसका अर्थ नागरिकता ही होगा,जबकि कई परिस्थितियों में ऐसा नहीं होता।
दीपक वोहरा ने अपने शुरुआती राजनयिक जीवन का एक रोचक अनुभव साझा करते हुए बताया कि जब उनकी पहली नियुक्ति तत्कालीन सोवियत संघ में हुई थी,तब उनसे उनकी राष्ट्रीयता के बारे में पूछा गया। उन्होंने सहज रूप से उत्तर दिया कि वे भारतीय हैं। बाद में उन्हें समझाया गया कि वहाँ राष्ट्रीयता पूछने का आशय नागरिकता नहीं,बल्कि जातीय या क्षेत्रीय पहचान से था। उनसे यह जानना चाहा गया था कि भारत के किस क्षेत्र,समुदाय या सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से उनका संबंध है। उन्होंने बताया कि उस समय उन्हें यह समझ में आया कि दुनिया के अलग-अलग देशों में राष्ट्रीयता शब्द का उपयोग अलग-अलग संदर्भों में किया जाता है और हर जगह इसका अर्थ नागरिकता नहीं होता।
उन्होंने कहा कि यही कारण है कि अंतर्राष्ट्रीय मामलों में काम करने वाले लोगों को इन शब्दों के वास्तविक अर्थ की स्पष्ट जानकारी होना आवश्यक है। यदि कोई व्यक्ति इन अवधारणाओं को समझे बिना टिप्पणी करता है,तो भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है। उनके अनुसार,नागरिकता और राष्ट्रीयता के बीच का अंतर केवल भाषाई नहीं,बल्कि कानूनी और प्रशासनिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।
पासपोर्ट के इतिहास पर चर्चा करते हुए दीपक वोहरा ने बताया कि यह कोई आधुनिक अवधारणा नहीं है। उन्होंने कहा कि प्राचीन समय में भी राजा और शासक अपने दूतों या प्रतिनिधियों को दूसरे राज्यों में भेजते समय सुरक्षा और पहचान के लिए विशेष पत्र जारी करते थे। इन पत्रों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता था कि दूसरे राज्य में उनके प्रतिनिधि को सुरक्षित मार्ग मिले और उसके साथ सम्मानजनक व्यवहार किया जाए। समय के साथ यही व्यवस्था विकसित होती गई और आधुनिक पासपोर्ट प्रणाली का आधार बनी।
उन्होंने बताया कि प्रथम विश्व युद्ध के बाद वर्ष 1919 में लीग ऑफ नेशंस ने आधुनिक पासपोर्ट व्यवस्था को औपचारिक रूप दिया। इसके बाद अंतर्राष्ट्रीय यात्रा के लिए पासपोर्ट एक मान्यता प्राप्त दस्तावेज बन गया। आज दुनिया के अधिकांश देशों में विदेश यात्रा करने के लिए पासपोर्ट अनिवार्य माना जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य किसी व्यक्ति की पहचान स्थापित करना और दूसरे देश में प्रवेश की अनुमति प्राप्त करने की प्रक्रिया को व्यवस्थित बनाना है।
दीपक वोहरा ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पासपोर्ट मूल रूप से यात्रा से जुड़ा दस्तावेज है। यह किसी व्यक्ति को अपने देश से बाहर जाने और दूसरे देश में प्रवेश करने की सुविधा प्रदान करता है। हालाँकि,कई पासपोर्टों में नागरिकता या राष्ट्रीयता से संबंधित जानकारी दर्ज होती है,लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि पासपोर्ट स्वयं नागरिकता का अंतिम प्रमाण है। उन्होंने कहा कि कई बार लोग यह मान लेते हैं कि जिसके पास किसी देश का पासपोर्ट है,वह उसी देश का नागरिक होगा,लेकिन व्यवहारिक और कानूनी दृष्टि से हमेशा ऐसा नहीं होता।
अपने पाँच दशक से अधिक लंबे राजनयिक अनुभव का उल्लेख करते हुए उन्होंने एक महत्वपूर्ण उदाहरण साझा किया। उन्होंने बताया कि विदेश सेवा के दौरान कुछ विशेष परिस्थितियों में सरकारें अस्थायी या विशेष पासपोर्ट भी जारी कर सकती हैं। उन्होंने कहा कि उन्होंने स्वयं ऐसे मामलों पर काम किया है। उनके अनुसार,एक बार एक अत्यंत प्रसिद्ध व्यक्ति को तत्काल विदेश यात्रा करनी थी। उस समय सरकार के उच्च स्तर पर निर्णय लिया गया कि उन्हें विशेष परिस्थिति में भारतीय पासपोर्ट जारी किया जाए। संबंधित व्यक्ति ने उस पासपोर्ट का उपयोग केवल यात्रा के लिए किया,अपना कार्य पूरा करने के बाद भारत लौटे और पासपोर्ट वापस कर दिया। इस उदाहरण के माध्यम से उन्होंने समझाया कि कुछ परिस्थितियों में पासपोर्ट का उपयोग विशेष प्रशासनिक और राजनयिक जरूरतों को पूरा करने के लिए भी किया जाता है।
दीपक वोहरा ने अपने जीवन का एक और रोचक अनुभव साझा करते हुए बताया कि वे वर्तमान में तीन अफ्रीकी देशों के विशेष सलाहकार के रूप में भी कार्य कर रहे हैं। इनमें से एक देश ने उन्हें विशेष सलाहकार के रूप में राजनयिक पासपोर्ट जारी किया। उन्होंने कहा कि जब उन्हें यह पासपोर्ट दिया गया,तो उन्होंने उस देश के प्रधानमंत्री से कहा कि वे भारत के नागरिक हैं और इस प्रकार का पासपोर्ट जारी करने की आवश्यकता क्यों है। तब प्रधानमंत्री ने उनसे पासपोर्ट खोलकर देखने को कहा।
उन्होंने बताया कि पासपोर्ट के अंदर स्पष्ट रूप से उनका नाम,विशेष सलाहकार का पद और नागरिकता के स्थान पर भारतीय लिखा हुआ था। इसके बाद उन्हें समझाया गया कि यह दस्तावेज केवल उस देश में उनके आधिकारिक आवागमन को सरल बनाने के लिए जारी किया गया है। इसका उद्देश्य उन्हें उस देश में बार-बार वीजा लेने की आवश्यकता से मुक्त करना था। इससे उनकी भारतीय नागरिकता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता था। इस अनुभव के माध्यम से उन्होंने यह स्पष्ट किया कि पासपोर्ट जारी करने वाला देश और किसी व्यक्ति की नागरिकता का देश हमेशा एक ही हो,यह आवश्यक नहीं है।
उन्होंने यह भी बताया कि “पासपोर्ट” शब्द स्वयं फ्रांसीसी भाषा से आया है। इसका शाब्दिक अर्थ है “बंदरगाह पार करना”। पुराने समय में समुद्री यात्राओं के दौरान बंदरगाहों से गुजरने की अनुमति के लिए ऐसे दस्तावेज जारी किए जाते थे। बाद में यही व्यवस्था विकसित होकर आधुनिक पासपोर्ट प्रणाली का हिस्सा बन गई। इसलिए पासपोर्ट की मूल अवधारणा यात्रा और आवागमन से जुड़ी रही है।
दीपक वोहरा ने अपने परिवार का उदाहरण देते हुए नागरिकता की जटिलताओं को भी समझाया। उन्होंने बताया कि उनकी नातिनों का जन्म अमेरिका में हुआ,इसलिए वे अमेरिकी नागरिक हैं। उनके पिता ब्रिटिश नागरिक हैं,जबकि उनकी माँ भारतीय हैं। ऐसी स्थिति में उनके पास विभिन्न देशों से जुड़े कानूनी अधिकार और दस्तावेज हो सकते हैं,लेकिन इससे नागरिकता और राष्ट्रीयता की अवधारणाएँ एक नहीं हो जातीं। उन्होंने कहा कि वैश्वीकरण के इस दौर में ऐसे अनेक परिवार हैं,जिनके सदस्य अलग-अलग देशों की नागरिकता रखते हैं और उनके पास विभिन्न प्रकार के यात्रा दस्तावेज भी होते हैं।
उन्होंने कहा कि अंतर्राष्ट्रीय कानून, संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न दस्तावेज,कांसुलर संबंधों पर आधारित समझौते और राजनयिक व्यवस्थाएँ इन विषयों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करती हैं। इसलिए किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले इन कानूनी व्यवस्थाओं को समझना आवश्यक है। उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि वे पासपोर्ट और नागरिकता जैसे विषयों पर सार्वजनिक टिप्पणी करने से पहले संबंधित अंतर्राष्ट्रीय प्रावधानों का अध्ययन करें।
पूर्व राजनयिक के अनुसार,वर्तमान समय में पासपोर्ट और नागरिकता को लेकर जो बहस चल रही है,उसमें कई बार तथ्यों की बजाय धारणाओं के आधार पर निष्कर्ष निकाले जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि लोग इन दोनों अवधारणाओं के बीच के कानूनी और व्यावहारिक अंतर को समझ लें,तो अधिकांश भ्रम अपने आप समाप्त हो जाएगा। उन्होंने दोहराया कि पासपोर्ट केवल यात्रा की सुविधा प्रदान करने वाला आधिकारिक दस्तावेज है,जबकि नागरिकता किसी व्यक्ति की कानूनी पहचान,संवैधानिक अधिकारों और राज्य के प्रति उसके दायित्वों से जुड़ी एक अलग व्यवस्था है।
उन्होंने अंत में कहा कि इन दोनों शब्दों का अलग-अलग महत्व है और इन्हें एक-दूसरे का पर्याय मानना उचित नहीं होगा। उनके अनुसार,आधुनिक वैश्विक व्यवस्था में लोगों की आवाजाही,बहुराष्ट्रीय परिवारों और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के बढ़ते दायरे को देखते हुए इन अवधारणाओं को सही संदर्भ में समझना पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गया है। इसी समझ के आधार पर पासपोर्ट,नागरिकता और राष्ट्रीयता जैसे विषयों पर होने वाली चर्चाएँ अधिक तथ्यपरक और संतुलित बन सकती हैं।
