वाशिंगटन,19 अक्टूबर (युआईटीवी)- भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से प्रस्तावित व्यापार समझौते को लेकर एक बार फिर सकारात्मक संकेत मिले हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने सोमवार को कहा कि दोनों देश व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के बेहद करीब पहुँच चुके हैं। भारत यात्रा से ठीक एक दिन पहले दिए गए उनके बयान से संकेत मिलता है कि समझौते के पहले चरण को लेकर बातचीत में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। हालाँकि,कुछ संवेदनशील मुद्दों पर सहमति बनना अभी बाकी है। इनमें भारत के डेयरी क्षेत्र में अमेरिकी उत्पादों की पहुँच का सवाल भी शामिल है,जिसे बातचीत की प्रमुख बाधाओं में गिना जा रहा है।
रुबियो ने कहा कि अमेरिका इस समय भारत के साथ व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में जुटा है और दोनों पक्ष इसके काफी करीब हैं। उनके बयान से उम्मीद बढ़ी है कि आने वाले समय में दोनों देश व्यापार से जुड़े मतभेदों को सुलझाकर समझौते की औपचारिक प्रक्रिया आगे बढ़ा सकते हैं। यह करार दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को मजबूत करने के साथ-साथ कारोबारियों और निर्यातकों के लिए नए अवसर पैदा कर सकता है।
भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित समझौते का उद्देश्य भारतीय उत्पादों के लिए अमेरिकी बाजार में शुल्क संबंधी बाधाओं को कम करना और भारतीय बाजार में अमेरिकी वस्तुओं की पहुँच बढ़ाना है। हालाँकि,दोनों देशों के आर्थिक हितों, घरेलू उद्योगों की सुरक्षा और कृषि क्षेत्र से जुड़े मुद्दों के कारण बातचीत में कई स्तरों पर सहमति बनाना जरूरी है।
भारत यात्रा से पहले रुबियो ने रूसी तेल और गैस की खरीद तथा उससे जुड़े अमेरिकी प्रतिबंधों के मुद्दे पर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ महीनों में अमेरिका को कुछ प्रतिबंधों में छूट देनी पड़ी,क्योंकि उनका असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और कीमतों पर पड़ रहा था। उनके अनुसार,प्रतिबंधों से जुड़े फैसले लेते समय केवल राजनीतिक उद्देश्यों को नहीं,बल्कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार और अलग-अलग देशों की परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना पड़ता है।
रुबियो ने कहा कि ऊर्जा बाजार में आपूर्ति और कीमतों के बीच संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि हर देश की भौगोलिक स्थिति और ऊर्जा संसाधनों तक पहुँच अलग-अलग होती है। कुछ देशों के लिए वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की व्यवस्था करना आसान नहीं है। ऐसे में विदेश नीति से जुड़े निर्णय लेते समय इन परिस्थितियों पर विचार करना पड़ता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि इन परिस्थितियों का उल्लेख प्रतिबंधों से बचने के बहाने के रूप में नहीं किया जाना चाहिए,लेकिन नीतिगत फैसलों में व्यावहारिक पहलुओं को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। अमेरिका को राष्ट्रीय सुरक्षा,वैश्विक ऊर्जा बाजार और अपने अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के बीच संतुलन बनाना होता है।
रुबियो के इस बयान को भारत के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है,क्योंकि रूस से ऊर्जा खरीद का मुद्दा भारत-अमेरिका संबंधों में चर्चा का विषय रहा है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को ध्यान में रखते हुए विभिन्न देशों से तेल और गैस की खरीद करता है। वहीं, अमेरिका रूस की ऊर्जा आय से जुड़े मामलों पर प्रतिबंधों के माध्यम से दबाव बनाने की नीति अपनाता रहा है।
भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते के पहले चरण को लेकर बातचीत में प्रगति हुई है,लेकिन कुछ मुद्दे अब भी चुनौती बने हुए हैं। इनमें सबसे अहम भारत के डेयरी क्षेत्र तक अमेरिकी उत्पादों की पहुँच का प्रश्न है। भारत में डेयरी क्षेत्र बड़ी संख्या में किसानों और पशुपालकों की आजीविका से जुड़ा हुआ है। इसलिए इस क्षेत्र में किसी भी तरह की व्यापारिक रियायत पर निर्णय लेते समय घरेलू उत्पादकों के हितों का ध्यान रखना जरूरी है।
अमेरिका चाहता है कि उसके उत्पादों को भारतीय बाजार में अधिक अवसर मिलें। इसके विपरीत भारत अपने कृषि और डेयरी क्षेत्र की संवेदनशीलता को देखते हुए सावधानी से आगे बढ़ रहा है। इसी कारण दोनों देशों के बीच बाजार पहुँच और शुल्क में बदलाव से जुड़े मुद्दों पर विस्तृत चर्चा की जरूरत बनी हुई है।
केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल पहले ही कह चुके हैं कि व्यापार समझौते के पहले चरण को अंतिम रूप दिया जा चुका है और उसका कानूनी मसौदा तैयार किया जा रहा है। हालाँकि,समझौते को लागू करने की प्रक्रिया में भारत के प्रतिस्पर्धात्मक हितों को लेकर स्पष्टता महत्वपूर्ण होगी। इसका अर्थ है कि समझौते की शर्तों को अंतिम रूप देते समय यह सुनिश्चित करना होगा कि भारतीय उद्योगों और निर्यातकों को अपेक्षित लाभ मिले तथा घरेलू क्षेत्रों पर अनावश्यक दबाव न पड़े।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर भी हाल में कह चुके हैं कि बातचीत अब अंतिम चरण के करीब पहुंच रही है। उन्होंने इसके लिए ‘लैंडिंग प्वाइंट’ का उल्लेख किया था,जिससे संकेत मिला कि दोनों पक्ष समझौते की अंतिम शर्तों पर सहमति बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
हालाँकि,अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमीसन ग्रीर ने 2 अक्टूबर को कहा था कि समझौता तुरंत होने वाला नहीं है। उनके बयान से स्पष्ट हुआ था कि प्रगति के बावजूद कुछ प्रक्रियागत और नीतिगत मुद्दों का समाधान बाकी है। ऐसे में रुबियो का ताजा बयान बातचीत की दिशा को लेकर सकारात्मक संकेत देता है,लेकिन इससे समझौते पर हस्ताक्षर की कोई निश्चित तारीख तय नहीं होती।
भारत और अमेरिका ने फरवरी में व्यापार समझौते की रूपरेखा घोषित की थी। इसके तहत अमेरिका ने भारतीय वस्तुओं पर लागू पारस्परिक शुल्क को 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया था। इसके अलावा भारत की ओर से रूसी तेल खरीदने के संबंध में लगाया गया अतिरिक्त 25 प्रतिशत शुल्क भी हटा दिया गया था।
शुल्क में इस बदलाव से भारतीय निर्यातकों को अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा करने में मदद मिलने की उम्मीद जताई गई थी। कम शुल्क होने से भारतीय उत्पादों की लागत पर दबाव घट सकता है और अमेरिकी खरीदारों के लिए उनकी कीमतें अधिक आकर्षक बन सकती हैं। हालाँकि,वास्तविक लाभ अलग-अलग उत्पादों, बाजार की माँग और समझौते की अंतिम शर्तों पर निर्भर करेगा।
इसके बदले भारत ने अमेरिकी औद्योगिक वस्तुओं और कई कृषि उत्पादों पर शुल्क कम करने या समाप्त करने की प्रतिबद्धता जताई थी। इनमें ट्री नट्स,फल,सोयाबीन तेल,वाइन और स्पिरिट्स जैसे उत्पाद शामिल बताए गए हैं। इस व्यवस्था का उद्देश्य दोनों देशों के बीच व्यापार को बढ़ावा देना और बाजार में एक-दूसरे की वस्तुओं के लिए अवसर बढ़ाना है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस बीच रूस और ईरान से जुड़े प्रतिबंधों के संबंध में प्रस्तावित कानून को लागू करने के आदेश पर हस्ताक्षर किए हैं। साथ ही रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर लगाए जाने वाले शुल्कों में छूट भी दी गई है। इन फैसलों का असर ऊर्जा कारोबार और अमेरिका की प्रतिबंध नीति पर पड़ सकता है। हालाँकि,किसी भी देश पर लागू होने वाली वास्तविक शर्तें संबंधित आदेशों और नियमों के अनुसार तय होंगी।
व्यापार समझौते पर बातचीत ऐसे समय हो रही है,जब भारत के निर्यात के आँकड़ों में मजबूती दर्ज की गई है। सितंबर 2026 में देश का माल निर्यात पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 23 प्रतिशत बढ़कर 44.4 अरब डॉलर पहुँच गया। इसके साथ ही व्यापार घाटे में भी कमी आने की जानकारी सामने आई है।
निर्यात में बढ़ोतरी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है,क्योंकि इससे घरेलू कंपनियों को अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में अपनी मौजूदगी बढ़ाने का अवसर मिलता है। अमेरिका भारत के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों में शामिल है। ऐसे में दोनों देशों के बीच शुल्क संबंधी बाधाएँ कम होने और बाजार पहुँच बेहतर होने से कई क्षेत्रों में कारोबार को बढ़ावा मिल सकता है।
हालाँकि,निर्यात में वृद्धि के बावजूद व्यापार समझौते की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि उसकी शर्तें भारतीय उत्पादकों, किसानों, उद्योगों और निर्यातकों के लिए कितनी लाभकारी साबित होती हैं। भारतीय पक्ष के लिए घरेलू उद्योगों की सुरक्षा के साथ-साथ वैश्विक बाजारों में प्रतिस्पर्धा बढ़ाना भी महत्वपूर्ण है।
भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौता केवल शुल्क घटाने तक सीमित नहीं है। इसके जरिए दोनों देश औद्योगिक और कृषि उत्पादों के व्यापार को विस्तार देने, बाजार में पहुँच बढ़ाने और आर्थिक संबंधों को अधिक व्यवस्थित बनाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन डेयरी क्षेत्र जैसे संवेदनशील मुद्दों पर सहमति बनाना और समझौते की कानूनी शर्तों को अंतिम रूप देना अभी महत्वपूर्ण चरण हैं।
मार्को रुबियो के बयान से बातचीत में आगे बढ़ने की उम्मीद मजबूत हुई है। वहीं,अमेरिकी पक्ष के पहले के बयानों से यह भी स्पष्ट है कि समझौते को तुरंत लागू मान लेना उचित नहीं होगा। दोनों देशों को अपने आर्थिक हितों और नीतिगत प्राथमिकताओं के बीच संतुलन बनाते हुए आगे बढ़ना होगा।
अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि भारत और अमेरिका शेष मुद्दों को किस तरह सुलझाते हैं और समझौते के पहले चरण को औपचारिक रूप देने में कितना समय लगता है। यदि दोनों पक्ष अंतिम शर्तों पर सहमत हो जाते हैं, तो यह करार द्विपक्षीय व्यापार को नई दिशा देने के साथ भारतीय निर्यातकों के लिए अमेरिकी बाजार में अवसर बढ़ाने की भूमिका निभा सकता है।
