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अप्रैल में भारत का चालू खाता अधिशेष 4.7 अरब डॉलर पर पहुँचा,सेवा निर्यात और प्रेषण में बढ़ोतरी से अर्थव्यवस्था को मजबूती

मुंबई,16 जून (युआईटीवी)- भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक उत्साहजनक संकेत सामने आया है। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी ताजा आँकड़ों के अनुसार,अप्रैल 2026 में भारत का चालू खाता अधिशेष 4.7 अरब डॉलर दर्ज किया गया है। यह स्थिति पिछले वर्ष की समान अवधि से बिल्कुल अलग है,जब अप्रैल 2025 में देश का चालू खाता 4.8 अरब डॉलर के घाटे में था। एक वर्ष के भीतर हुए इस बड़े बदलाव को भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती और वैश्विक स्तर पर भारत की बढ़ती आर्थिक क्षमता का संकेत माना जा रहा है।

विशेषज्ञों के अनुसार,अप्रैल महीने में चालू खाते के अधिशेष में आने के पीछे दो प्रमुख कारण रहे। पहला,सेवा क्षेत्र के निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि और दूसरा,विदेशों में कार्यरत भारतीयों द्वारा देश भेजी गई राशि यानी प्रेषण में तेज उछाल। इन दोनों कारकों ने भारत के बाह्य क्षेत्र को मजबूत आधार प्रदान किया और चालू खाते को सकारात्मक स्थिति में पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

रिजर्व बैंक के आँकड़ों के अनुसार,अप्रैल 2026 में भारत ने 37 अरब डॉलर मूल्य की सेवाओं का निर्यात किया। इसके मुकाबले सेवा क्षेत्र का आयात 18.4 अरब डॉलर रहा। इस प्रकार सेवा निर्यात से देश को 18.6 अरब डॉलर का अधिशेष प्राप्त हुआ। यह आँकड़ा पिछले वर्ष अप्रैल में दर्ज 15.9 अरब डॉलर के सेवा अधिशेष से काफी अधिक है। सूचना प्रौद्योगिकी,व्यावसायिक सेवाओं,वित्तीय सेवाओं और परामर्श क्षेत्र में बढ़ती वैश्विक माँग ने भारतीय सेवा निर्यात को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने में मदद की है।

सेवा निर्यात के साथ-साथ विदेशों में बसे भारतीयों द्वारा भेजी गई धनराशि ने भी देश के भुगतान संतुलन को मजबूत किया है। अप्रैल 2026 में प्रेषण का आँकड़ा 16 अरब डॉलर तक पहुँच गया,जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 9.4 अरब डॉलर था। यह वृद्धि दर्शाती है कि खाड़ी देशों,अमेरिका,यूरोप और अन्य क्षेत्रों में कार्यरत भारतीय समुदाय लगातार देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। प्रेषण में यह बढ़ोतरी घरेलू खपत,निवेश और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए भी सकारात्मक संकेत मानी जा रही है।

एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि शुद्ध आय घाटे में भी कमी आई है। अप्रैल 2026 में यह घटकर 1.9 अरब डॉलर रह गया,जबकि एक वर्ष पहले यह 3 अरब डॉलर था। आय घाटे में कमी का अर्थ है कि विदेशी निवेशकों और कंपनियों को भारत से बाहर जाने वाली आय अपेक्षाकृत कम रही,जिससे चालू खाते की स्थिति बेहतर बनी।

विदेशी निवेश के मोर्चे पर भी भारत को उल्लेखनीय सफलता मिली है। आँकड़ों के अनुसार, अप्रैल 2026 में शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश बढ़कर 7.4 अरब डॉलर हो गया। पिछले वर्ष इसी महीने यह आँकड़ा केवल 1.6 अरब डॉलर था। यह वृद्धि बताती है कि वैश्विक निवेशकों का भारत की आर्थिक संभावनाओं और विकास दर पर भरोसा लगातार मजबूत हो रहा है।

देश में आने वाला कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश प्रवाह भी उल्लेखनीय रूप से बढ़ा है। अप्रैल 2026 में कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 11.4 अरब डॉलर दर्ज किया गया,जो एक वर्ष पहले के 5 अरब डॉलर के आँकड़े से दोगुने से भी अधिक है। विनिर्माण,डिजिटल तकनीक,बुनियादी ढाँचा और हरित ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में निवेशकों की बढ़ती रुचि ने इस वृद्धि को गति दी है।

हालाँकि,सभी संकेतक पूरी तरह सकारात्मक नहीं रहे। विदेशी पोर्टफोलियो निवेश के क्षेत्र में अप्रैल के दौरान भारी निकासी देखी गई। आँकड़ों के अनुसार,इस महीने शुद्ध विदेशी पोर्टफोलियो निवेश में 8.7 अरब डॉलर का बहिर्वाह दर्ज किया गया। पिछले वर्ष अप्रैल में यह आँकड़ा 2.1 अरब डॉलर था। वैश्विक वित्तीय बाजारों में अनिश्चितता,ब्याज दरों से जुड़ी चिंताएँ और अंतर्राष्ट्रीय निवेशकों की जोखिम संबंधी रणनीतियों को इस निकासी का प्रमुख कारण माना जा रहा है।

बैंकिंग पूँजी के क्षेत्र में भी नकारात्मक स्थिति देखने को मिली। जहाँ एक वर्ष पहले बैंकिंग क्षेत्र में 3.3 अरब डॉलर का शुद्ध प्रवाह दर्ज किया गया था,वहीं अप्रैल 2026 में 3.7 अरब डॉलर का शुद्ध बहिर्वाह सामने आया। इसके बावजूद सेवा निर्यात,प्रेषण और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में मजबूती के कारण कुल बाह्य क्षेत्र संतुलित बना रहा।

रिजर्व बैंक के आँकड़े यह भी दर्शाते हैं कि वित्त वर्ष 2025-26 की जनवरी से मार्च तिमाही के दौरान भारत ने 7.1 अरब डॉलर का चालू खाता अधिशेष दर्ज किया था,जो सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 0.7 प्रतिशत है। यह संकेत देता है कि वित्त वर्ष के अंतिम चरण में भी भारत का बाहरी क्षेत्र अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में बना रहा।

हालाँकि,इसी तिमाही के दौरान विदेशी पोर्टफोलियो निवेश में 12 अरब डॉलर का शुद्ध बहिर्वाह दर्ज किया गया। यह दर्शाता है कि वैश्विक निवेशकों का व्यवहार अभी भी अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों और बाजार की अस्थिरता से प्रभावित हो रहा है। इसके बावजूद दीर्घकालिक निवेशकों द्वारा भारत में बढ़ते प्रत्यक्ष निवेश ने अर्थव्यवस्था को स्थिरता प्रदान की है।

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि सेवा क्षेत्र की बढ़ती प्रतिस्पर्धात्मकता, डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार,वैश्विक कंपनियों का भारत की ओर झुकाव और विदेशों में कार्यरत भारतीयों से मिलने वाला मजबूत प्रेषण प्रवाह आने वाले महीनों में भी भारत के बाह्य क्षेत्र को मजबूती प्रदान कर सकता है। यदि यही रुझान जारी रहता है,तो भारत वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बावजूद अपने भुगतान संतुलन को मजबूत बनाए रखने में सफल हो सकता है।

कुल मिलाकर अप्रैल 2026 के आँकड़े यह संकेत देते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था बाहरी मोर्चे पर मजबूत स्थिति में है। सेवा निर्यात और प्रेषण में रिकॉर्ड बढ़ोतरी ने न केवल चालू खाते को अधिशेष में पहुँचाया है,बल्कि यह भी साबित किया है कि भारत की अर्थव्यवस्था वैश्विक स्तर पर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रही है। आने वाले महीनों में निवेश, निर्यात और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों पर नजर रहेगी,लेकिन फिलहाल ये आँकड़े देश की आर्थिक मजबूती की सकारात्मक तस्वीर पेश करते हैं।