संयुक्त राष्ट्र की परमाणु एजेंसी के प्रमुख राफेल मारियानो ग्रोसी (तस्वीर क्रेडिट@TheCradleMedia)

ईरान के परमाणु स्थलों पर फिर शुरू हो सकती है निगरानी,आईएईए प्रमुख के बयान से बढ़ीं नई उम्मीदें

वाशिंगटन,24 जून (युआईटीवी)- अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हुए अंतरिम समझौते के बाद पश्चिम एशिया में परमाणु गतिविधियों को लेकर एक नया घटनाक्रम सामने आया है। संयुक्त राष्ट्र की परमाणु निगरानी एजेंसी के प्रमुख राफेल मारियानो ग्रोसी ने संकेत दिया है कि अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के निरीक्षक जल्द ही ईरान के परमाणु संवर्धन स्थलों का दौरा कर सकते हैं। ग्रोसी का यह बयान ऐसे समय आया है,जब परमाणु निगरानी को लेकर अमेरिका और ईरान की ओर से अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ईरान के परमाणु कार्यक्रम की स्थिति पर करीब से नजर बनाए हुए है।

विशेषज्ञों के अनुसार,यदि अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के निरीक्षकों को दोबारा ईरान के संवर्धन केंद्रों तक पहुँच मिलती है,तो यह हाल के महीनों में परमाणु विवाद को लेकर सबसे महत्वपूर्ण प्रगति मानी जाएगी। पिछले वर्ष हुए संघर्ष और बढ़े हुए तनाव के बाद से ईरान ने कई महत्वपूर्ण परमाणु स्थलों तक एजेंसी की पहुँच सीमित कर दी थी। ऐसे में निरीक्षण प्रक्रिया की संभावित बहाली को विश्वास बहाली की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के महानिदेशक राफेल मारियानो ग्रोसी ने जापान के फुकुशिमा दाइची परमाणु ऊर्जा संयंत्र में आयोजित एक प्रेस वार्ता के दौरान इस विषय पर अपनी प्रतिक्रिया दी। पत्रकारों द्वारा पूछे गए सवालों के जवाब में उन्होंने कहा कि राजनीतिक बयानबाजी अपनी जगह है,लेकिन सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि दोनों देशों के राष्ट्रपतियों द्वारा एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए हैं। उन्होंने कहा कि इस समझौते में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि परमाणु सामग्री से जुड़े सभी कार्य एजेंसी की निगरानी के तहत किए जाएँगे।

ग्रोसी ने यह भी स्पष्ट किया कि निरीक्षण प्रक्रिया को लेकर समय को लेकर अलग-अलग अटकलें लगाई जा रही हैं,लेकिन उनके अनुसार यह अधिक महत्वपूर्ण नहीं है कि निरीक्षक दो दिन बाद पहुँचे,एक सप्ताह बाद या फिर दस दिन बाद। महत्वपूर्ण बात यह है कि निरीक्षण की प्रक्रिया होगी और एजेंसी अपनी भूमिका निभाएगी। उनके इस बयान को अब तक का सबसे स्पष्ट संकेत माना जा रहा है कि एजेंसी और ईरान के बीच किसी प्रकार की व्यवस्था पर काम चल रहा है।

दूसरी ओर अमेरिका ने भी इस मुद्दे पर सकारात्मक संकेत दिए हैं। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने दावा किया है कि ईरान ने अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के निरीक्षकों को दोबारा देश में आमंत्रित करने पर सहमति व्यक्त की है। वेंस के इस बयान के बाद यह चर्चा तेज हो गई कि दोनों देशों के बीच परमाणु निगरानी को लेकर कोई प्रारंभिक समझ बन चुकी है।

हालाँकि,ईरान की ओर से इस विषय पर अधिक सतर्क प्रतिक्रिया सामने आई है। ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बाघेई ने कहा है कि ईरान और एजेंसी प्रमुख के बीच इस विषय पर कोई औपचारिक बैठक नहीं हुई है और निरीक्षण को लेकर अभी तक कोई निश्चित समय-सीमा तय नहीं की गई है। उन्होंने यह भी कहा कि फिलहाल किसी आधिकारिक कार्यक्रम की घोषणा नहीं की गई है। हालाँकि,ईरान ने भविष्य में निरीक्षण की संभावना को पूरी तरह खारिज भी नहीं किया है,जिससे यह संकेत मिलता है कि बातचीत के रास्ते अभी खुले हुए हैं।

पिछले जून में हुए युद्ध के बाद से ईरान और अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के संबंधों में तनाव बढ़ गया था। उस समय तेहरान ने एजेंसी के निरीक्षकों को उन संवर्धन स्थलों तक पहुँचने से रोक दिया था,जहाँ अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम मौजूद होने की आशंका जताई जाती रही है। पश्चिमी देशों और कई अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान के पास इतना उच्च स्तर का समृद्ध यूरेनियम मौजूद हो सकता है,जिससे वह सैद्धांतिक रूप से कई परमाणु हथियार बनाने की क्षमता हासिल कर सकता है।

हालाँकि,ईरान लगातार इन आरोपों को खारिज करता रहा है। तेहरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए संचालित किया जा रहा है। ईरानी नेतृत्व का दावा है कि उसका उद्देश्य ऊर्जा उत्पादन,चिकित्सा अनुसंधान और वैज्ञानिक विकास है,न कि परमाणु हथियारों का निर्माण। इसके बावजूद अंतर्राष्ट्रीय समुदाय लंबे समय से अधिक पारदर्शिता और नियमित निरीक्षण की माँग करता रहा है।

परमाणु निरीक्षण का मुद्दा केवल तकनीकी या वैज्ञानिक विषय नहीं है,बल्कि यह क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा से भी सीधे जुड़ा हुआ है। यदि एजेंसी को ईरान के परमाणु स्थलों तक फिर से पहुँच मिलती है,तो इससे न केवल ईरान के परमाणु कार्यक्रम की वास्तविक स्थिति स्पष्ट होगी, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भरोसा बढ़ाने में भी मदद मिलेगी। इससे अमेरिका और ईरान के बीच चल रही कूटनीतिक प्रक्रिया को भी मजबूती मिल सकती है।

विश्लेषकों का मानना है कि हालिया अंतरिम समझौता दोनों पक्षों के लिए तनाव कम करने का अवसर लेकर आया है। पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के संबंध कई बार गंभीर संकट के दौर से गुजरे हैं। आर्थिक प्रतिबंध,परमाणु गतिविधियों को लेकर विवाद और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों ने संबंधों को जटिल बनाया है। ऐसे में यदि परमाणु निगरानी की व्यवस्था बहाल होती है,तो यह भविष्य की व्यापक वार्ताओं का आधार बन सकती है।

अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी भी इस पूरी प्रक्रिया में केंद्रीय भूमिका निभा रही है। संयुक्त राष्ट्र से संबद्ध यह संस्था दुनिया भर में परमाणु कार्यक्रमों की निगरानी करती है और यह सुनिश्चित करने का प्रयास करती है कि परमाणु तकनीक का उपयोग शांतिपूर्ण उद्देश्यों तक सीमित रहे। ईरान के मामले में भी एजेंसी की रिपोर्टें और निरीक्षण लंबे समय से वैश्विक नीति निर्माण को प्रभावित करते रहे हैं।

ग्रोसी के हालिया बयान ने संकेत दिया है कि एजेंसी इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए तैयार है और वह अपने निरीक्षण संबंधी दायित्वों को पूरा करना चाहती है। हालाँकि,अंतिम निर्णय और समय-निर्धारण ईरान तथा संबंधित पक्षों के बीच होने वाली आगे की बातचीत पर निर्भर करेगा।

फिलहाल दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या आने वाले दिनों में अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के निरीक्षक वास्तव में ईरान के संवर्धन स्थलों का दौरा कर पाएँगे। यदि ऐसा होता है,तो यह केवल एक तकनीकी निरीक्षण नहीं होगा,बल्कि अमेरिका और ईरान के बीच विश्वास बहाली तथा क्षेत्रीय स्थिरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जाएगा। आने वाले दिनों में इस विषय पर होने वाले घटनाक्रम पश्चिम एशिया की राजनीति और वैश्विक परमाणु कूटनीति दोनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।