संयुक्त राष्ट्र,24 सितंबर (युआईटीवी)- विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के उच्चस्तरीय सप्ताह के दौरान न्यूयॉर्क में अपनी व्यस्त कूटनीतिक गतिविधियों के बीच चार यूरोपीय देशों के विदेश मंत्रियों के साथ अलग-अलग द्विपक्षीय बैठकें कीं। इन मुलाकातों में यूक्रेन संघर्ष, भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापारिक संबंध, निवेश, ऊर्जा, विनिर्माण, डिजिटल तकनीक, रक्षा और बहुपक्षीय सहयोग समेत कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हुई। इसके अलावा जयशंकर ने ग्लोबल साउथ के विभिन्न समूहों के विदेश मंत्रियों के साथ भी बैठकें कीं और वैश्विक मंच पर विकासशील देशों के साझा हितों से जुड़े विषयों पर विचार-विमर्श किया।
बुधवार को जयशंकर का कार्यक्रम बेहद व्यस्त रहा। उन्होंने ग्लोबल साउथ से जुड़े अलग-अलग समूहों के विदेश मंत्रियों के साथ तीन महत्वपूर्ण बैठकों में हिस्सा लिया। इसी दौरान उन्होंने चार यूरोपीय देशों के विदेश मंत्रियों के साथ अलग-अलग द्विपक्षीय वार्ताएं भी कीं। इन बैठकों में भारत के द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने के साथ यूरोप के साथ आर्थिक और रणनीतिक सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया गया।
जयशंकर ने नीदरलैंड के विदेश मंत्री टॉम बेरेंडसेन के साथ हुई बैठक की जानकारी सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर साझा की। उन्होंने बताया कि दोनों नेताओं ने यूक्रेन संघर्ष को लेकर अपने विचार साझा किए। इसके अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मई में नीदरलैंड की यात्रा के बाद द्विपक्षीय संबंधों में हुई प्रगति पर भी चर्चा की गई। प्रधानमंत्री मोदी की उस यात्रा के दौरान भारत और नीदरलैंड ने अपने संबंधों को रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक बढ़ाने का फैसला किया था। ऐसे में विदेश मंत्रियों की बैठक में इस साझेदारी को आगे बढ़ाने के विभिन्न पहलुओं पर बातचीत हुई।
भारत और नीदरलैंड के बीच व्यापार, निवेश, तकनीक और नवाचार जैसे क्षेत्रों में सहयोग पहले से जारी है। रणनीतिक साझेदारी के बाद इन क्षेत्रों में सहयोग के नए अवसरों पर दोनों देशों की नजर है। यूक्रेन संघर्ष जैसे अंतर्राष्ट्रीय मुद्दे पर विचारों का आदान-प्रदान भी दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संवाद का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा।
जयशंकर ने फिनलैंड की विदेश मंत्री एलिना वाल्टोनन के साथ भी मुलाकात की। इस बैठक में मौजूदा भू-राजनीतिक परिस्थितियों और तकनीक से जुड़ी चुनौतियों पर विचार साझा किए गए। जयशंकर ने बताया कि भारत और फिनलैंड के द्विपक्षीय संबंध मजबूत बने हुए हैं और यूरोपीय संघ के साथ भारत का सहयोग भी लगातार आगे बढ़ रहा है। तकनीक के क्षेत्र में बदलती वैश्विक परिस्थितियों के बीच दोनों देशों के बीच डिजिटल और तकनीकी सहयोग का महत्व बढ़ा है।
फिनलैंड के साथ बातचीत ऐसे समय हुई है,जब भारत और यूरोपीय संघ के संबंधों में आर्थिक सहयोग को लेकर नई संभावनाएँ बन रही हैं। भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते को लेकर प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। नीदरलैंड,स्लोवेनिया और फिनलैंड यूरोपीय संघ के सदस्य देश हैं और इन देशों के विदेश मंत्रियों के साथ जयशंकर की बैठकों में भारत-यूरोपीय संघ व्यापार संबंधों का विषय प्रमुखता से सामने आया।
स्लोवेनिया के विदेश मंत्री टोन काइजर के साथ हुई बैठक में भी द्विपक्षीय संबंधों और आर्थिक सहयोग को मजबूत करने पर चर्चा हुई। काइजर ने बैठक के बाद कहा कि दोनों देश रणनीतिक और राजनीतिक संबंधों के साथ-साथ आर्थिक तथा निवेश सहयोग को भी मजबूत करना चाहते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि स्लोवेनिया एक ऐसे आर्थिक प्रतिनिधिमंडल के साथ भारत की यात्रा की तैयारी कर रहा है,जो कुछ विशेष क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करेगा।
जयशंकर ने बताया कि स्लोवेनिया के विदेश मंत्री के साथ बातचीत में भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते को लागू करने की दिशा में आगे बढ़ने से पैदा होने वाले व्यापार और निवेश के नए अवसरों पर विचार किया गया। दोनों पक्षों ने ऊर्जा,विनिर्माण,डिजिटल तकनीक, संपर्क व्यवस्था, रक्षा और बहुपक्षीय सहयोग जैसे क्षेत्रों पर भी चर्चा की। इन क्षेत्रों में सहयोग बढ़ने से भारत और यूरोपीय देशों के बीच आर्थिक संबंधों को नई गति मिलने की संभावना है।
भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते को लेकर लंबे समय से बातचीत चल रही है। इस समझौते का उद्देश्य दोनों पक्षों के बीच व्यापार और निवेश के लिए बेहतर परिस्थितियाँ तैयार करना है। ऐसे में यूरोपीय संघ के सदस्य देशों के साथ जयशंकर की अलग-अलग बैठकें इस व्यापक आर्थिक साझेदारी के संदर्भ में महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं। समझौते को औपचारिक रूप दिए जाने की प्रक्रिया के बीच दोनों पक्ष इसके संभावित लाभों और विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग के अवसरों पर चर्चा कर रहे हैं।
जयशंकर ने अंडोरा की विदेश मंत्री इम्मा टोर फॉस के साथ भी द्विपक्षीय बैठक की। इस दौरान व्यापार और निवेश के अलावा जलवायु परिवर्तन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे मुद्दों पर बातचीत हुई। जयशंकर ने बताया कि दोनों पक्षों ने बहुपक्षीय सहयोग को लेकर भी विचार साझा किए। भारत के लिए जलवायु परिवर्तन और नई तकनीकों से जुड़े मुद्दे वैश्विक कूटनीति के महत्वपूर्ण विषय हैं और छोटे यूरोपीय देशों के साथ बातचीत में भी इन क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाएँ तलाशना महत्वपूर्ण है।
यूरोपीय देशों के साथ द्विपक्षीय बैठकों के अलावा जयशंकर ने दिनभर कई बहुपक्षीय समूहों के विदेश मंत्रियों के साथ भी चर्चा की। इनमें कैरेबियाई देशों का 15 सदस्यीय समूह कैरीकॉम, 14 सदस्यीय फोरम फॉर इंडिया-पैसिफिक आइलैंड्स कोऑपरेशन और एल.69 समूह शामिल रहे। इन बैठकों का मुख्य फोकस ग्लोबल साउथ के देशों के साझा हितों और वैश्विक संस्थानों में विकासशील देशों की भूमिका से जुड़े मुद्दों पर रहा।
एल.69 समूह में ग्लोबल साउथ के 30 से अधिक देश शामिल हैं। यह समूह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की माँग को लेकर सहयोग करता है। सुरक्षा परिषद की मौजूदा संरचना में सुधार और विकासशील देशों को अधिक प्रतिनिधित्व देने का मुद्दा भारत लंबे समय से अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उठाता रहा है। एल.69 की बैठक में अफ्रीकी देशों के सी-10 समूह के नेता की भागीदारी ने भी बैठक को महत्वपूर्ण बनाया।
कैरीकॉम और प्रशांत द्वीप देशों के समूह के साथ बातचीत में भी विकास,जलवायु परिवर्तन, आर्थिक सहयोग और वैश्विक संस्थाओं में विकासशील देशों की प्राथमिकताओं जैसे विषयों पर चर्चा हुई। भारत पिछले कुछ वर्षों में ग्लोबल साउथ के देशों के साथ अपनी साझेदारी को मजबूत करने पर जोर देता रहा है। ऐसे में संयुक्त राष्ट्र महासभा के उच्चस्तरीय सप्ताह के दौरान इन देशों के साथ सीधे संवाद को भारत की व्यापक कूटनीतिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।
जयशंकर की इन बैठकों से एक तरफ भारत के यूरोपीय देशों के साथ द्विपक्षीय और आर्थिक संबंधों को आगे बढ़ाने की कोशिश दिखाई देती है,वहीं दूसरी तरफ ग्लोबल साउथ के देशों के साथ बहुपक्षीय सहयोग को मजबूत करने का प्रयास भी सामने आता है। यूरोप के साथ व्यापार, निवेश, ऊर्जा, तकनीक और रक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के साथ भारत संयुक्त राष्ट्र और अन्य बहुपक्षीय मंचों पर विकासशील देशों से जुड़े मुद्दों को भी प्रमुखता दे रहा है।
न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के उच्चस्तरीय सप्ताह के दौरान जयशंकर की लगातार हो रही बैठकें भारत की सक्रिय कूटनीतिक भागीदारी को दर्शाती हैं। यूरोपीय देशों के साथ आर्थिक और रणनीतिक सहयोग से लेकर ग्लोबल साउथ के साझा मुद्दों तक,इन बैठकों में कई ऐसे विषय शामिल रहे जो आने वाले समय में भारत की विदेश नीति और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं। अब इन वार्ताओं में उठाए गए मुद्दों को द्विपक्षीय और बहुपक्षीय स्तर पर किस तरह आगे बढ़ाया जाता है,इस पर नजर रहेगी।
