एस जयशंकर और मार्को रुबियो (तस्वीर क्रेडिट@pankajj_das)

मार्को रुबियो की भारत यात्रा पर दुनिया की नजर,इंडो-पैसिफिक रणनीति और क्वाड सहयोग रहेगा केंद्र में

नई द‍िल्‍ली,22 मई (युआईटीवी)- अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो की आगामी भारत यात्रा को लेकर कूटनीतिक हलकों में काफी उत्सुकता देखी जा रही है। भारत स्थित अमेरिकी दूतावास ने इस यात्रा को स्वतंत्र और खुले इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के प्रति साझा प्रतिबद्धता का प्रतीक बताया है। दूतावास के अनुसार यह दौरा केवल एक औपचारिक राजनयिक यात्रा नहीं,बल्कि भारत और अमेरिका के बीच लगातार मजबूत होते रणनीतिक संबंधों का अहम संकेत है। इस यात्रा के दौरान क्षेत्रीय सुरक्षा,ऊर्जा सहयोग,व्यापार,रक्षा साझेदारी और महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति शृंखलाओं को लेकर व्यापक चर्चा होने की उम्मीद है।

भारत में स्थित अमेरिकी दूतावास ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर पोस्ट करते हुए कहा कि मार्को रुबियो की यात्रा क्वाड साझेदारी के बढ़ते महत्व को रेखांकित करती है। दूतावास ने कहा कि क्षेत्रीय सुरक्षा को मजबूत करने से लेकर महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति शृंखलाओं में विविधता लाने तक,यह यात्रा हिंद-प्रशांत क्षेत्र में साझा रणनीतिक लक्ष्यों को आगे बढ़ाने का अवसर होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि हाल के वर्षों में इंडो-पैसिफिक क्षेत्र वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था का केंद्र बनकर उभरा है, ऐसे में क्वाड देशों की सक्रियता लगातार बढ़ रही है।

अमेरिकी विदेश मंत्री शनिवार को भारत पहुँचेंगे और 23 से 26 मई तक देश के विभिन्न शहरों का दौरा करेंगे। नई दिल्ली में वह भारतीय नेताओं के साथ उच्चस्तरीय द्विपक्षीय बैठकों में हिस्सा लेंगे। इसके साथ ही वह क्वाड विदेश मंत्रियों की बैठक में भी शामिल होंगे। इस बैठक में भारत,अमेरिका,जापान और ऑस्ट्रेलिया के विदेश मंत्री भाग लेंगे। माना जा रहा है कि इस बैठक में हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती भू-राजनीतिक चुनौतियों,समुद्री सुरक्षा, आर्थिक सहयोग और तकनीकी साझेदारी पर विस्तार से चर्चा होगी।

क्वाड समूह को पिछले कुछ वर्षों में इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में संतुलन बनाए रखने वाले एक महत्वपूर्ण रणनीतिक मंच के रूप में देखा जा रहा है। भारत,अमेरिका,जापान और ऑस्ट्रेलिया का यह समूह क्षेत्र में स्वतंत्र, खुला और समावेशी समुद्री वातावरण बनाए रखने की वकालत करता रहा है। ऐसे समय में जब वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं और समुद्री मार्गों को लेकर चिंताएँ बढ़ रही हैं,क्वाड देशों के बीच सहयोग को और मजबूत बनाने पर जोर दिया जा रहा है।

विशेषज्ञों के अनुसार इस बार की बैठक में महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति शृंखलाओं पर विशेष ध्यान दिया जा सकता है। इलेक्ट्रिक वाहन,सेमीकंडक्टर और आधुनिक तकनीक से जुड़े उद्योगों के लिए आवश्यक खनिजों की वैश्विक माँग तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में अमेरिका और उसके सहयोगी देश चीन पर निर्भरता कम करने के लिए नई आपूर्ति शृंखलाओं के विकास पर काम कर रहे हैं। भारत इस रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है,क्योंकि वह तकनीकी विनिर्माण और संसाधन साझेदारी के क्षेत्र में तेजी से उभर रहा है।

मार्को रुबियो की यात्रा के दौरान ऊर्जा सुरक्षा और रक्षा सहयोग भी चर्चा के प्रमुख विषयों में शामिल रहेंगे। पिछले कुछ वर्षों में भारत और अमेरिका के बीच रक्षा साझेदारी में उल्लेखनीय विस्तार हुआ है। दोनों देश संयुक्त सैन्य अभ्यास,रक्षा तकनीक और खुफिया सहयोग को लगातार मजबूत कर रहे हैं। इसके अलावा स्वच्छ ऊर्जा,डिजिटल तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ रहा है।

नई दिल्ली के अलावा अमेरिकी विदेश मंत्री कोलकाता,आगरा और जयपुर का भी दौरा करेंगे। यह यात्रा केवल रणनीतिक और राजनीतिक बैठकों तक सीमित नहीं रहेगी,बल्कि इसमें सांस्कृतिक और जनसंपर्क कार्यक्रम भी शामिल होंगे। अमेरिकी विदेश विभाग के अनुसार, भारत दौरे से पहले मार्को रुबियो स्वीडन के हेलसिंगबोर्ग जाएँगे,जहाँ वह नाटो विदेश मंत्रियों की बैठक में भाग लेंगे। इसके बाद वह सीधे भारत पहुँचेंगे।

इस यात्रा की एक खास बात यह भी है कि अमेरिका अपनी स्वतंत्रता की 250वीं वर्षगांठ के समारोहों की तैयारी कर रहा है और रुबियो इस अवसर को भारत में भी साझा करेंगे। उन्होंने एक वीडियो संदेश में कहा कि अमेरिका अपनी 250वीं वर्षगांठ मनाने की तैयारी कर रहा है और वह इसे भारतीय साझेदारों के साथ मनाने के लिए उत्साहित हैं। रुबियो ने भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बताते हुए कहा कि अमेरिका दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्रों में से एक है और दोनों देशों के साझा लोकतांत्रिक मूल्य उनके संबंधों की सबसे बड़ी ताकत हैं।

अमेरिकी दूतावास ने भी सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वह इस विशेष अवसर को भारतीय जनता और साझेदारों के साथ मिलकर मनाने के लिए उत्साहित है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार के सांस्कृतिक और लोकतांत्रिक संदेश दोनों देशों के संबंधों को केवल रणनीतिक साझेदारी तक सीमित नहीं रखते,बल्कि उन्हें जनस्तर पर भी मजबूत बनाते हैं।

भारत और अमेरिका के संबंध पिछले एक दशक में लगातार नई ऊँचाइयों पर पहुँचे हैं। व्यापार,रक्षा,तकनीक,शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच सहयोग तेजी से बढ़ा है। वहीं इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बदलते शक्ति संतुलन ने दोनों देशों को और करीब लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अमेरिका भारत को क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार के रूप में देखता है,जबकि भारत भी बहुपक्षीय सहयोग और संतुलित विदेश नीति के जरिए अपनी वैश्विक भूमिका मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकारों का कहना है कि मार्को रुबियो की यह यात्रा केवल नियमित कूटनीतिक कार्यक्रम नहीं है,बल्कि यह ऐसे समय में हो रही है,जब वैश्विक राजनीति तेजी से बदल रही है। यूक्रेन युद्ध,पश्चिम एशिया में तनाव,चीन की बढ़ती सक्रियता और वैश्विक व्यापारिक चुनौतियों के बीच क्वाड देशों की एकजुटता को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ऐसे में नई दिल्ली में होने वाली बैठक आने वाले समय की रणनीतिक दिशा तय करने में अहम साबित हो सकती है।

रुबियो की भारत यात्रा से यह भी संकेत मिलता है कि अमेरिका हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपने सहयोगियों के साथ तालमेल को और मजबूत करना चाहता है। भारत की बढ़ती आर्थिक और सामरिक ताकत को देखते हुए वाशिंगटन नई दिल्ली के साथ अपने संबंधों को और व्यापक रूप देना चाहता है। यही कारण है कि इस यात्रा को केवल एक राजनयिक कार्यक्रम नहीं,बल्कि भविष्य की रणनीतिक साझेदारी के महत्वपूर्ण चरण के रूप में देखा जा रहा है।