डोनाल्ड ट्रंप (तस्वीर क्रेडिट@rashtra_press)

ईरान पर सैन्य कार्रवाई को लेकर ट्रंप को झटका,अमेरिकी सीनेट ने पारित किया ‘वॉर पावर्स रिजॉल्यूशन’

वॉशिंगटन,24 जून (युआईटीवी)- अमेरिका में ईरान को लेकर चल रही राजनीतिक और रणनीतिक बहस के बीच अमेरिकी सीनेट ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए ‘वॉर पावर्स रिजॉल्यूशन’ पारित कर दिया है। इस प्रस्ताव के तहत राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को कांग्रेस की अनुमति के बिना ईरान के खिलाफ किसी भी नई सैन्य कार्रवाई को आगे बढ़ाने से रोका गया है। इस फैसले को न केवल अमेरिका की विदेश नीति के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है,बल्कि इसे राष्ट्रपति के युद्ध संबंधी अधिकारों पर कांग्रेस की संवैधानिक भूमिका को दोबारा स्थापित करने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है।

फरवरी में शुरू हुए अमेरिका-ईरान टकराव के बाद यह पहला अवसर है,जब अमेरिकी कांग्रेस के किसी सदन ने राष्ट्रपति की सैन्य कार्रवाई की शक्तियों को सीमित करने के उद्देश्य से ऐसा प्रस्ताव पारित किया है। इस कदम को ट्रंप प्रशासन की युद्ध संबंधी रणनीति के खिलाफ बढ़ते राजनीतिक विरोध का संकेत माना जा रहा है। विशेष रूप से यह तब हुआ है,जब अमेरिका और ईरान के बीच तनावपूर्ण संबंधों के बावजूद बातचीत की संभावनाएँ भी बनी हुई हैं।

सीनेट में इस प्रस्ताव को 50 के मुकाबले 48 मतों से मंजूरी मिली। मतदान के दौरान अधिकांश डेमोक्रेट सांसदों ने प्रस्ताव का समर्थन किया,जबकि चार रिपब्लिकन सांसदों ने भी पार्टी लाइन से हटकर इसके पक्ष में मतदान किया। वहीं एक डेमोक्रेट सांसद ने प्रस्ताव का विरोध किया। इस नतीजे ने यह संकेत दिया कि ईरान के मुद्दे पर केवल विपक्ष ही नहीं, बल्कि सत्तारूढ़ दल के भीतर भी राष्ट्रपति की नीतियों को लेकर अलग-अलग राय मौजूद हैं।

कांग्रेस की आधिकारिक वेबसाइट पर प्रकाशित कानूनी विवरण के अनुसार,इस प्रस्ताव में राष्ट्रपति को निर्देश दिया गया है कि वे ईरान के भीतर या उसके खिलाफ चल रही सैन्य गतिविधियों से अमेरिकी सशस्त्र बलों को हटा लें,जब तक कि कांग्रेस युद्ध की औपचारिक घोषणा न करे या सैन्य बल के उपयोग की स्पष्ट अनुमति न दे। यह प्रावधान अमेरिकी संविधान में कांग्रेस को दिए गए युद्ध संबंधी अधिकारों की भावना को प्रतिबिंबित करता है, जिसके अनुसार युद्ध की घोषणा और बड़े सैन्य अभियानों को मंजूरी देने का अधिकार मुख्य रूप से कांग्रेस के पास होता है।

प्रस्ताव के समर्थकों का मानना है कि ईरान के खिलाफ हाल के सैन्य कदम कांग्रेस की पूर्व अनुमति के बिना उठाए गए थे और यह एक ऐसा संघर्ष था,जिसे प्रशासन ने अपनी पहल पर शुरू किया। उनका तर्क है कि किसी भी संभावित युद्ध या सैन्य अभियान का निर्णय केवल राष्ट्रपति के विवेक पर नहीं छोड़ा जा सकता,क्योंकि इसके व्यापक राजनीतिक,आर्थिक और मानवीय परिणाम हो सकते हैं। समर्थकों के अनुसार,यदि सैन्य कार्रवाई की आवश्यकता हो,तो उसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत कांग्रेस की मंजूरी प्राप्त करनी चाहिए।

हालाँकि,इस प्रस्ताव के पारित होने के बावजूद कई राजनीतिक विश्लेषकों और मीडिया संस्थानों का मानना है कि इसका प्रभाव व्यावहारिक रूप से सीमित हो सकता है। कई अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों में इसे मुख्य रूप से प्रतीकात्मक कदम बताया गया है। उनका कहना है कि वर्तमान परिस्थितियों में प्रशासन का दावा है कि अमेरिकी सेना ईरान के खिलाफ किसी सक्रिय सैन्य अभियान में शामिल नहीं है। ऐसे में प्रस्ताव का तत्काल प्रभाव सीमित दिखाई देता है।

अमेरिकी समाचार चैनल सीबीएस न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार,यह प्रस्ताव संभवतः प्रतीकात्मक महत्व अधिक रखता है क्योंकि प्रशासन पहले ही यह स्पष्ट कर चुका है कि अमेरिका फिलहाल ईरान के साथ किसी प्रत्यक्ष सैन्य संघर्ष में शामिल नहीं है। इसी तरह एनबीसी न्यूज ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि यह कदम ऐसे समय उठाया गया है,जब अमेरिका और ईरान युद्ध जैसी स्थिति को समाप्त करने और तनाव कम करने के लिए प्रारंभिक स्तर की बातचीत कर रहे हैं। इसलिए प्रस्ताव का उद्देश्य केवल वर्तमान स्थिति को प्रभावित करना नहीं,बल्कि भविष्य में संभावित सैन्य कदमों के लिए स्पष्ट राजनीतिक संदेश देना भी है।

इसके बावजूद डेमोक्रेट सांसदों का मानना है कि प्रस्ताव की आवश्यकता बनी हुई है। उनका तर्क है कि भले ही वर्तमान में तनाव कम होता दिखाई दे रहा हो,लेकिन भविष्य में हालात फिर से बिगड़ सकते हैं। ऐसे में कांग्रेस की भूमिका को पहले से स्पष्ट करना जरूरी है ताकि किसी भी सैन्य कार्रवाई की शुरुआत बिना व्यापक राजनीतिक सहमति के न हो सके।

इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाने वाले प्रमुख नेताओं में सीनेटर टिम केन भी शामिल रहे हैं। उन्होंने पिछले सप्ताह पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा था कि यह मतदान कराने का सही समय है। उनके अनुसार यदि अमेरिका और ईरान वास्तव में स्थिरता और शांति की दिशा में बढ़ रहे हैं,तो यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि भविष्य में बिना कांग्रेस की भागीदारी के कोई नया सैन्य संघर्ष शुरू न किया जा सके। उनका कहना था कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में इतने महत्वपूर्ण निर्णयों के लिए निर्वाचित प्रतिनिधियों की भागीदारी आवश्यक है।

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रस्ताव अमेरिकी राजनीति में कार्यपालिका और विधायिका के बीच शक्ति संतुलन को लेकर जारी बहस को भी सामने लाता है। पिछले कई दशकों में अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने विभिन्न सैन्य अभियानों में अपेक्षाकृत व्यापक अधिकारों का उपयोग किया है,जबकि कांग्रेस समय-समय पर अपने संवैधानिक अधिकारों को पुनर्स्थापित करने की कोशिश करती रही है। ईरान से जुड़ा यह प्रस्ताव उसी लंबे राजनीतिक और संवैधानिक विवाद का नवीनतम उदाहरण माना जा रहा है।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी इस कदम पर नजर रखी जा रही है। मध्य पूर्व में पहले से ही अस्थिर सुरक्षा स्थिति के बीच अमेरिका की किसी भी सैन्य या कूटनीतिक नीति का व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। ऐसे में सीनेट द्वारा पारित यह प्रस्ताव न केवल घरेलू राजनीति का विषय है,बल्कि वैश्विक रणनीतिक समीकरणों से भी जुड़ा हुआ है।

फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि इस प्रस्ताव का भविष्य में कितना व्यावहारिक असर होगा, लेकिन इतना तय है कि इसने ईरान नीति को लेकर अमेरिकी राजनीतिक व्यवस्था के भीतर मौजूद मतभेदों को उजागर कर दिया है। साथ ही यह संदेश भी दिया है कि कांग्रेस विदेश और सुरक्षा नीति से जुड़े बड़े फैसलों में अपनी भूमिका को कम नहीं होने देना चाहती। आने वाले महीनों में अमेरिका और ईरान के बीच होने वाली संभावित वार्ताओं तथा क्षेत्रीय घटनाक्रमों के आधार पर इस प्रस्ताव के राजनीतिक महत्व का और अधिक आकलन किया जाएगा।