राज्यसभा में विपक्ष के हंगामे से कार्यवाही ठप (तस्वीर क्रेडिट@rashtra_press)

राज्यसभा में विपक्ष के हंगामे से कार्यवाही ठप,नियम 267 पर चर्चा की माँग को लेकर बढ़ा गतिरोध,सदन सोमवार तक स्थगित

नई दिल्ली,31 जुलाई (युआईटीवी)- संसद के मानसून सत्र के दौरान शुक्रवार को राज्यसभा में एक बार फिर जोरदार हंगामा देखने को मिला। विपक्षी दलों ने नियम 267 के तहत विशेष चर्चा की माँग को लेकर सदन में लगातार नारेबाजी की और अपनी सीटों से उठकर सभापति के आसन के समीप पहुँच गए। सभापति सी. पी. राधाकृष्णन द्वारा इस मांग को स्वीकार नहीं किए जाने के बाद सदन का माहौल और अधिक तनावपूर्ण हो गया। बढ़ते शोर-शराबे और व्यवधान के बीच राज्यसभा की कार्यवाही सुचारु रूप से नहीं चल सकी और अंततः सभापति ने सदन की कार्यवाही सोमवार, 3 अगस्त की सुबह 11 बजे तक के लिए स्थगित कर दी।

शुक्रवार की कार्यवाही शुरू होते ही विपक्षी सांसदों ने प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ पुलिस बल के इस्तेमाल के मुद्दे पर नियम 267 के तहत चर्चा कराने की माँग दोहराई। विपक्ष का कहना था कि यह मामला अत्यंत महत्वपूर्ण है और इसे सदन में प्राथमिकता के आधार पर उठाया जाना चाहिए। विपक्षी सांसदों ने इस संबंध में पहले से नोटिस भी दिया था और वे चाहते थे कि नियमित कार्यवाही स्थगित कर इस विषय पर विस्तृत चर्चा कराई जाए।

कार्यवाही के दौरान नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने सभापति का ध्यान इस ओर आकर्षित करते हुए कहा कि विपक्ष ने विधिवत नोटिस दिया है और वह नियम 267 के तहत चर्चा चाहता है। इस पर सभापति ने उनसे पूछा कि नोटिस में किस विषय पर चर्चा की माँग की गई है। जवाब में खड़गे ने कहा कि विपक्ष का उद्देश्य प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई और उससे जुड़े घटनाक्रम पर सदन में गंभीर चर्चा कराना है।

हालाँकि,सभापति सी. पी. राधाकृष्णन ने विपक्ष की इस माँग को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि नियम 267 के तहत इस प्रकार की माँग पहले भी कई बार की गई है और पूर्व में भी इसे अनुमति नहीं दी गई थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि सदन की कार्यवाही निर्धारित नियमों और प्रक्रियाओं के अनुसार ही संचालित की जाएगी। सभापति के इस निर्णय के बाद विपक्षी सांसदों ने जोरदार विरोध शुरू कर दिया।

नियम 267 के तहत चर्चा की अनुमति नहीं मिलने से नाराज विपक्षी सदस्य अपनी सीटों से उठकर सभापति के आसन के सामने पहुँच गए और लगातार नारेबाजी करने लगे। सदन में शोरगुल इतना बढ़ गया कि सामान्य कार्यवाही चलाना मुश्किल हो गया। विपक्षी सांसद अपनी माँग पर अड़े रहे और सरकार के खिलाफ नारे लगाते रहे। लगातार बढ़ते हंगामे के कारण सदन की कार्यवाही बार-बार बाधित होती रही।

इसी दौरान केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने विपक्ष के रवैये पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने सदन में कहा कि विपक्ष का आचरण संसदीय मर्यादाओं और लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुरूप नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष सदन के भीतर सड़क जैसी राजनीति कर रहा है और जानबूझकर कार्यवाही बाधित करने का प्रयास कर रहा है।

शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि वह केंद्रीय मंत्री के रूप में सदन में उपस्थित हैं,लेकिन जिस प्रकार विपक्षी सदस्य व्यवहार कर रहे हैं,वह संसद की गरिमा के विपरीत है। उनके अनुसार लोकतंत्र में संसद विचार-विमर्श और संवाद का सर्वोच्च मंच है,जहाँ गंभीर विषयों पर सार्थक चर्चा होनी चाहिए,लेकिन विपक्ष का उद्देश्य चर्चा नहीं,बल्कि व्यवधान उत्पन्न करना दिखाई देता है।

उन्होंने कहा कि विपक्ष का व्यवहार लोकतंत्र की भावना को कमजोर करता है और संसदीय संस्थाओं की गरिमा को भी प्रभावित करता है। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष केवल राजनीतिक लाभ के लिए सदन की कार्यवाही बाधित कर रहा है और जनता इस पूरे घटनाक्रम को देख रही है। उनके अनुसार देश की जनता ऐसे व्यवहार को स्वीकार नहीं करेगी और भविष्य में इसका उचित जवाब देगी।

केंद्रीय मंत्री ने आगे कहा कि संविधान और संसदीय परंपराओं का सम्मान करना प्रत्येक जनप्रतिनिधि का दायित्व है। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष बार-बार संविधान की दुहाई देता है,लेकिन सदन के भीतर उसका व्यवहार संविधान की भावना और संसदीय शिष्टाचार के अनुरूप नहीं है। उन्होंने कहा कि सरकार किसी भी महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा से पीछे नहीं हटती,लेकिन चर्चा निर्धारित संसदीय प्रक्रियाओं और नियमों के अनुसार होनी चाहिए।

शिवराज सिंह चौहान ने यह भी कहा कि विपक्ष की मंशा किसी विषय पर रचनात्मक संवाद स्थापित करने की नहीं है। उनके अनुसार यदि विपक्ष वास्तव में चर्चा चाहता तो वह संसदीय प्रक्रिया का पालन करता,लेकिन वर्तमान स्थिति से ऐसा प्रतीत होता है कि उसका उद्देश्य केवल हंगामा करना और सदन की कार्यवाही बाधित करना है। उन्होंने विपक्ष के रवैये की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि इस प्रकार का व्यवहार लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं कहा जा सकता।

दूसरी ओर,विपक्षी सांसद लगातार अपनी माँग दोहराते रहे। उनका कहना था कि प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई एक गंभीर विषय है और इस पर संसद में तत्काल चर्चा होनी चाहिए। विपक्ष का आरोप था कि सरकार इस मुद्दे पर जवाब देने से बच रही है, इसलिए नियम 267 के तहत चर्चा की अनुमति नहीं दी जा रही है। विपक्षी सदस्य नारे लगाते हुए लगातार सभापति से अपना निर्णय बदलने की माँग करते रहे।

हंगामे के बीच कुछ समय तक शून्यकाल की कार्यवाही चलाने का प्रयास किया गया, लेकिन विपक्षी सांसदों के लगातार विरोध और शोरगुल के कारण सदन का वातावरण सामान्य नहीं हो सका। कई सांसद अपनी सीटों से आगे आ गए और नारेबाजी जारी रखी। लगातार व्यवधान के कारण सदन में किसी भी विषय पर प्रभावी चर्चा संभव नहीं हो पाई।

स्थिति को देखते हुए सभापति सी. पी. राधाकृष्णन ने पहले विपक्षी सदस्यों से शांत होने और अपनी सीटों पर लौटने की अपील की। उन्होंने कहा कि सदन की कार्यवाही नियमों के अनुरूप चलनी चाहिए और सभी सदस्यों को संसदीय परंपराओं का पालन करना चाहिए। हालाँकि,विपक्षी सदस्य अपनी माँग पर अडिग रहे और नारेबाजी जारी रखी।

जब यह स्पष्ट हो गया कि सदन में सामान्य कार्यवाही चलाना संभव नहीं है,तब सभापति ने राज्यसभा की कार्यवाही सोमवार,3 अगस्त की सुबह 11 बजे तक के लिए स्थगित करने की घोषणा कर दी। इसके साथ ही सप्ताह के अंतिम कार्य दिवस पर भी राज्यसभा की कार्यवाही हंगामे की भेंट चढ़ गई।

मानसून सत्र के दौरान लगातार हो रहे गतिरोध ने संसद की उत्पादकता को लेकर भी चिंता बढ़ा दी है। हाल के दिनों में कई महत्वपूर्ण विधायी और राष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा प्रस्तावित थी, लेकिन लगातार हंगामे और विरोध के कारण सदन का काफी समय बाधित हुआ है। सरकार और विपक्ष के बीच बढ़ते राजनीतिक टकराव का असर संसदीय कार्यवाही पर साफ दिखाई दे रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संसद लोकतांत्रिक विमर्श का सबसे महत्वपूर्ण मंच है,जहाँ सरकार और विपक्ष दोनों की समान भूमिका होती है। सरकार का दायित्व है कि वह विपक्ष की चिंताओं का जवाब दे,वहीं विपक्ष की जिम्मेदारी है कि वह संसदीय नियमों के दायरे में रहकर अपनी बात प्रभावी ढंग से रखे। यदि दोनों पक्षों के बीच संवाद और सहमति का रास्ता नहीं निकलता,तो इसका सीधा असर संसद के कामकाज और विधायी प्रक्रिया पर पड़ता है।

फिलहाल राज्यसभा की कार्यवाही सोमवार तक के लिए स्थगित कर दी गई है। अब सभी की नजरें अगले सप्ताह की बैठक पर टिकी हैं, जहाँ यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार और विपक्ष के बीच जारी गतिरोध समाप्त होता है या नियम 267 के तहत चर्चा की मांग को लेकर टकराव आगे भी जारी रहता है। संसद के सुचारु संचालन और महत्वपूर्ण मुद्दों पर सार्थक बहस के लिए दोनों पक्षों के बीच संवाद और सहयोग की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महसूस की जा रही है।