जंतर-मंतर हिंसा (तस्वीर क्रेडिट@Bhartiy_2611)

जंतर-मंतर हिंसा: घायल पुलिसकर्मियों के परिवारों ने सुनाई आपबीती,कहा- ड्यूटी निभाने वालों को बनाया गया निशाना

नई दिल्ली,31 जुलाई (युआईटीवी)- दिल्ली के जंतर-मंतर पर 20 जुलाई को हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान भड़की हिंसा का मामला अब एक नए मोड़ पर पहुँच गया है। इस घटना में घायल हुए दिल्ली पुलिस के जवानों के परिवार पहली बार सार्वजनिक रूप से सामने आए और उन्होंने कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में आयोजित एक प्रेस वार्ता के माध्यम से उस दिन की दर्दनाक घटनाओं को साझा किया। परिवारों का कहना है कि ड्यूटी निभा रहे पुलिसकर्मियों पर अचानक हिंसक हमला किया गया,जिसके कारण कई जवान गंभीर रूप से घायल हो गए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सोशल मीडिया पर घटना की एकतरफा तस्वीर पेश की गई,जिससे घायल पुलिसकर्मियों की छवि को नुकसान पहुँचा।

जंतर-मंतर पर 20 जुलाई को कॉकरोच जनता पार्टी के विरोध प्रदर्शन के दौरान हालात उस समय बिगड़ गए थे,जब प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच टकराव की स्थिति बन गई। देखते ही देखते माहौल हिंसक हो गया और कई स्थानों पर पुलिसकर्मियों तथा प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें हुईं। इस दौरान अनेक पुलिसकर्मी घायल हुए,जबकि सार्वजनिक संपत्ति और पुलिस के सुरक्षा उपकरणों को भी भारी नुकसान पहुँचा। घटना के बाद पुलिस ने कई मामलों में जाँच शुरू की और विभिन्न स्तरों पर कार्रवाई भी जारी है। इसी बीच घायल पुलिसकर्मियों के परिजनों ने मीडिया के सामने आकर अपनी पीड़ा व्यक्त की और पूरे घटनाक्रम को अपने नजरिए से सामने रखा।

प्रेस वार्ता में सबसे पहले घायल सब इंस्पेक्टर की बेटी और दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा कुंतल ने अपने पिता के साथ हुई घटना का विस्तार से उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि उनके पिता दिल्ली पुलिस में सहायक उपनिरीक्षक के पद पर कार्यरत हैं और पुलिस सेवा में आने से पहले लगभग पंद्रह वर्षों तक भारतीय नौसेना में भी अपनी सेवाएँ दे चुके हैं। उनके अनुसार 20 जुलाई को उनके पिता को प्रदर्शन स्थल के सबसे संवेदनशील हिस्से में तैनात किया गया था,जहाँ भारी भीड़ को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी उन्हीं सहित कई अन्य पुलिसकर्मियों पर थी।

कुंतल ने कहा कि उनके पिता अक्सर घर पर यह बात कहते थे कि शुरुआती दौर में प्रदर्शन छात्रों का लग रहा था,लेकिन बाद में उसमें कुछ ऐसे लोग भी शामिल हो गए थे जिनका उद्देश्य केवल विरोध दर्ज कराना नहीं,बल्कि माहौल को बिगाड़ना था। उन्होंने बताया कि घटना वाले दिन अचानक भीड़ उग्र हो गई और कुछ लोगों ने उनके पिता को बैरिकेड के पास से खींच लिया। इसके बाद उनके साथ मारपीट की गई,जिससे उनके सिर में गंभीर चोट लगी और चार टांके लगाने पड़े। उन्हें तत्काल अस्पताल ले जाया गया,जहाँ वे कई घंटों तक बेहोश रहे।

उन्होंने कहा कि जब उनके पिता अस्पताल से घर लौटे तो उनकी वर्दी खून से सनी हुई थी। परिवार के लिए वह रात बेहद कठिन थी। उन्होंने बताया कि पूरे परिवार ने चिंता और भय के बीच कई घंटे बिताए। सबसे अधिक दुख उन्हें इस बात का हुआ कि सोशल मीडिया पर उनके पिता को ही दोषी ठहराने वाली टिप्पणियाँ की जाने लगीं। कुंतल ने कहा कि उनके पिता ने पूरी ईमानदारी के साथ अपनी ड्यूटी निभाई,लेकिन उन्हें अपराधी की तरह प्रस्तुत किया गया। उन्होंने बताया कि उनके परिवार ने न्याय की माँग को लेकर सर्वोच्च न्यायालय का भी दरवाजा खटखटाया है और उन्हें उम्मीद है कि दोषियों के खिलाफ उचित कार्रवाई होगी।

प्रेस वार्ता के दौरान एक अन्य घायल वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के बेटे लक्ष्य सिंह बिष्ट ने भी अपने पिता की स्थिति का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि उनके पिता सहायक पुलिस आयुक्त के पद पर कार्यरत हैं और उन्हें सेवा के दौरान चार वीरता पुरस्कार मिल चुके हैं। उन्होंने कहा कि घटना के दिन उन्हें जानकारी मिली कि उनके पिता प्रदर्शन के दौरान घायल हो गए हैं। बाद में जब उन्होंने अपने पिता की तस्वीर देखी तो उनके सिर पर गंभीर चोट और टांके दिखाई दिए,जिससे पूरा परिवार स्तब्ध रह गया।

लक्ष्य सिंह ने कहा कि उनके दादा भी सीमा सुरक्षा बल में कार्यरत थे और उन्होंने वर्ष 1971 के युद्ध में देश की सेवा की थी। ऐसे परिवार से आने के कारण उन्होंने हमेशा वर्दी का सम्मान करना सीखा है। उन्होंने बताया कि उनके पिता को प्रदर्शन स्थल पर अग्रिम पंक्ति में तैनात किया गया था। बाद में उनके पिता ने उन्हें बताया कि शुरू में हालात सामान्य थे, लेकिन अचानक कुछ लोगों ने बिना किसी उकसावे के पत्थरबाजी शुरू कर दी। जब वे अपने वरिष्ठ अधिकारियों को सुरक्षित स्थान पर ले जाने का प्रयास कर रहे थे,उसी दौरान उनके सिर पर पत्थर लगा और वे गंभीर रूप से घायल हो गए।

उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर कई लोग पुलिस के खिलाफ नकारात्मक बातें लिख रहे थे,जिससे उन्हें व्यक्तिगत रूप से बहुत दुख हुआ। उनके अनुसार उनके पिता हमेशा उन्हें सलाह देते हैं कि ऐसी टिप्पणियों पर ध्यान न दें,लेकिन परिवार के लिए यह देखना कठिन था कि घायल पुलिसकर्मियों की पीड़ा को नजरअंदाज किया जा रहा है। उन्होंने दावा किया कि प्रदर्शन में केवल छात्र ही नहीं थे,बल्कि कुछ ऐसे लोग भी शामिल थे जिनका उद्देश्य कानून व्यवस्था को चुनौती देना और पुलिस को नुकसान पहुँचाना था।

घायल सहायक उपनिरीक्षक की पत्नी सीमा ने भी अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि उनके पति पिछले तैंतीस वर्षों से दिल्ली पुलिस में सेवा दे रहे हैं। उन्होंने एक साधारण कांस्टेबल के रूप में अपने करियर की शुरुआत की थी और वर्षों की मेहनत तथा ईमानदारी के बाद वर्तमान पद तक पहुँचे हैं। उन्होंने कहा कि 20 जुलाई की सुबह भी वह रोज की तरह ड्यूटी पर गए थे और दिन में उन्होंने फोन करके बताया था कि प्रदर्शन स्थल पर काफी भीड़ है तथा कुछ प्रदर्शनकारी संसद की ओर बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं।

सीमा ने बताया कि उन्होंने अपने पति से सावधानी बरतने के लिए कहा था,लेकिन कुछ घंटों बाद उन्हें सूचना मिली कि उनके पति घायल हो गए हैं और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है। अस्पताल पहुँचने पर उन्हें पता चला कि हिंसा के दौरान पुलिसकर्मियों पर पत्थर,गमले,चप्पल और अन्य वस्तुएँ फेंकी गई थीं। उनके पति ने उन्हें बताया कि उग्र भीड़ ने सुरक्षा के लिए लगाए गए बैरिकेड भी तोड़ दिए थे। उन्होंने कहा कि उस दिन की घटनाओं को याद कर आज भी उनका मन विचलित हो जाता है।

उन्होंने यह भी कहा कि सोशल मीडिया पर घटना का केवल एक पक्ष दिखाया गया, जबकि घायल हुए पुलिसकर्मियों और उनके परिवारों की पीड़ा को पर्याप्त स्थान नहीं मिला। उन्होंने सरकार से अपील की कि पुलिसकर्मियों के हितों और उनकी सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को भी गंभीरता से उठाया जाए। उनके अनुसार पुलिसकर्मी कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए अपनी जान जोखिम में डालते हैं और ऐसे कठिन समय में उनके परिवारों को भी मानसिक और भावनात्मक संकट का सामना करना पड़ता है।

घटना के बाद सामने आए आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार 20 जुलाई की हिंसा में दो सौ पचास से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए। इनमें कई जवानों को सिर,हाथ और शरीर के अन्य हिस्सों में गंभीर चोटें आईं। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि एक सौ दस से अधिक बैरिकेड क्षतिग्रस्त हुए। पुलिस द्वारा उपयोग किए जाने वाले तीन सौ से अधिक बॉडी प्रोटेक्टर और तीन सौ पचास से अधिक हेलमेट भी नुकसानग्रस्त हो गए। इसके अलावा पचास से अधिक सुरक्षा ढाल और बीस से अधिक लाउडस्पीकर भी हिंसा के दौरान टूट गए।

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि दस हैंडहेल्ड मेटल डिटेक्टर,एक एक्स-रे बैगेज स्कैनर तथा पच्चीस से अधिक सरकारी वाहन भी तोड़फोड़ की चपेट में आए। सार्वजनिक संपत्ति को हुए नुकसान का आकलन भी किया जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि हिंसा के दौरान कई सरकारी संसाधनों को नुकसान पहुँचा,जिससे कानून व्यवस्था बनाए रखने की प्रक्रिया प्रभावित हुई।

इस पूरे घटनाक्रम के बाद पुलिस और प्रशासन ने घटना की जाँच तेज कर दी है। विभिन्न वीडियो फुटेज,प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और अन्य साक्ष्यों के आधार पर हिंसा में शामिल लोगों की पहचान करने का प्रयास किया जा रहा है। जाँच एजेंसियों का कहना है कि कानून के दायरे में रहते हुए दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

दूसरी ओर,इस घटना ने शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन और कानून व्यवस्था के बीच संतुलन को लेकर भी नई बहस छेड़ दी है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण प्रदर्शन प्रत्येक नागरिक का अधिकार है,लेकिन यदि किसी विरोध प्रदर्शन के दौरान हिंसा,तोड़फोड़ और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने जैसी घटनाएँ होती हैं,तो उससे न केवल सुरक्षा व्यवस्था प्रभावित होती है,बल्कि आम नागरिकों और ड्यूटी पर तैनात कर्मचारियों की सुरक्षा भी खतरे में पड़ जाती है।

घायल पुलिसकर्मियों के परिवारों का कहना है कि उनका उद्देश्य किसी भी प्रकार की राजनीतिक बहस में शामिल होना नहीं है,बल्कि केवल यह बताना है कि उस दिन ड्यूटी निभा रहे जवानों और उनके परिवारों ने किस प्रकार की मानसिक और शारीरिक पीड़ा झेली। उनका मानना है कि घटना के सभी पहलुओं की निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए,ताकि सत्य सामने आए और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके।

जंतर-मंतर हिंसा की यह घटना अब केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं रह गई है, बल्कि यह उन परिवारों की पीड़ा का भी प्रतीक बन गई है,जिनके सदस्य सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के दौरान घायल हुए। आने वाले समय में जाँच और न्यायिक प्रक्रिया से यह स्पष्ट होगा कि हिंसा के लिए कौन जिम्मेदार था,लेकिन फिलहाल घायल पुलिसकर्मियों के परिवारों ने अपनी बात सार्वजनिक रूप से रखकर यह संदेश देने का प्रयास किया है कि वर्दी के पीछे भी ऐसे परिवार होते हैं, जो हर ड्यूटी के साथ अपने प्रियजनों की सुरक्षित वापसी की चिंता करते हैं।