नई दिल्ली,3 सितंबर (युआईटीवी)- अभिनेत्री स्वरा भास्कर के फिल्म ‘पद्मावत’ और जौहर की परंपरा को लेकर दिए गए बयान पर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। 31 अगस्त को दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान स्वरा भास्कर ने फिल्म ‘पद्मावत’ के क्लाइमेक्स में दिखाए गए जौहर के दृश्य और उसके संभावित सामाजिक संदेश पर अपनी राय रखी थी। कार्यक्रम के बाद उनके बयान का एक हिस्सा सोशल मीडिया पर तेजी से प्रसारित हुआ। इसके आधार पर कुछ लोगों ने दावा किया कि स्वरा भास्कर ने जौहर करने वाली महिलाओं और रानी पद्मावती को ‘कायर’ कहा है। हालांकि, विवाद बढ़ने के बाद अभिनेत्री ने खुद एक वीडियो जारी कर अपने बयान की व्याख्या की और स्पष्ट किया कि उन्होंने रानी पद्मावती या जौहर करने वाली महिलाओं को कायर नहीं कहा था। उनके मुताबिक, उनकी टिप्पणी का संदर्भ अलग था और वह इस बात पर सवाल उठा रही थीं कि आधुनिक समाज में जौहर जैसे प्रसंग को किस तरह प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
स्वरा भास्कर का यह बयान अब फिल्म, इतिहास, महिला अधिकार, सम्मान, बहादुरी और पीड़ितों के प्रति समाज के नजरिए को लेकर व्यापक बहस का विषय बन गया है। एक ओर कुछ राजनीतिक और सामाजिक हस्तियों ने स्वरा की बात का समर्थन करते हुए कहा है कि ऐतिहासिक घटनाओं और परंपराओं को वर्तमान सामाजिक संदर्भ में भी समझने की जरूरत है। वहीं,दूसरी ओर कई भाजपा नेताओं ने अभिनेत्री के बयान की आलोचना करते हुए इसे इतिहास और राजपूत परंपराओं के प्रति असम्मानजनक बताया है। विवाद के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि ऐतिहासिक घटनाओं को फिल्मों में दिखाते समय उनके सामाजिक प्रभाव और आज के दर्शकों पर पड़ने वाले संदेश का कितना ध्यान रखा जाना चाहिए।
पूरा विवाद 31 अगस्त को दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित ‘वुमन लाइफ फ्रीडम टॉक’ कार्यक्रम से शुरू हुआ। इस कार्यक्रम में स्वरा भास्कर से वर्ष 2018 में फिल्म ‘पद्मावत’ को लेकर लिखे गए उनके खुले पत्र के बारे में सवाल किया गया था। जवाब देते हुए अभिनेत्री ने फिल्म के अंतिम दृश्य में दिखाए गए जौहर के प्रसंग को एक महिला और बलात्कार पीड़िता के नजरिए से देखने की कोशिश की।
स्वरा ने कहा कि जब उन्होंने फिल्म में करीब 800 महिलाओं को जौहर करते हुए देखा तो उनके मन में यह सवाल आया कि अगर वह खुद किसी बलात्कार की पीड़ित होतीं,तो इस दृश्य से उन्हें क्या संदेश मिलता। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या ऐसी प्रस्तुति किसी बलात्कार पीड़िता को यह महसूस करा सकती है कि उसने अपनी जान देकर ‘सम्मान’ बचाने का रास्ता नहीं चुना,इसलिए वह कायर है।
अभिनेत्री ने अपने बयान में यह भी सवाल किया कि ऐसे समाज में,जहाँ महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा गंभीर समस्या है, क्या फिल्मों के जरिए ऐसा संदेश जाना चाहिए कि किसी महिला के साथ गंभीर अपराध होने के बाद उसके पास सम्मानजनक विकल्प के रूप में अपनी जान लेना ही बचता है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि किसी बलात्कार पीड़िता को जीने के अधिकार से वंचित करने वाली मानसिकता को बढ़ावा नहीं मिलना चाहिए।
उनकी टिप्पणी का मूल केंद्र जौहर करने वाली महिलाओं को अपमानित करना नहीं, बल्कि आधुनिक समाज में ऐसे दृश्य की व्याख्या और उसके संभावित संदेश को लेकर सवाल उठाना था,लेकिन सोशल मीडिया पर उनके बयान के एक हिस्से के वायरल होने के बाद इसे अलग अर्थ में प्रस्तुत किया गया। इसके बाद स्वरा भास्कर को सोशल मीडिया पर आलोचना का सामना करना पड़ा।
बयान को लेकर विवाद बढ़ने के बाद स्वरा भास्कर ने खुद वीडियो जारी कर अपनी बात स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि उनके बयान को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है और उन्होंने जौहर करने वाली महिलाओं या रानी पद्मावती को कायर नहीं कहा। उनका तर्क था कि वह खुद को उस स्थिति में रखकर सवाल कर रही थीं,जिसमें कोई आधुनिक महिला बलात्कार जैसी भयावह घटना की शिकार होने के बाद फिल्म में जौहर के दृश्य को देखती है।
अभिनेत्री की सफाई के बाद भी विवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। उनके बयान को लेकर अलग-अलग राजनीतिक दलों और नेताओं की प्रतिक्रियाएँ सामने आने लगीं। कुछ नेताओं ने जहाँ इसे महिला अधिकार और पीड़ितों के सम्मान से जुड़ा महत्वपूर्ण सवाल बताया,वहीं कुछ नेताओं ने इसे इतिहास और राजपूत परंपराओं के अपमान से जोड़ दिया।
मौलाना साजिद रशीदी ने स्वरा भास्कर के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए फिल्म ‘पद्मावत’ की ऐतिहासिकता और जौहर के चित्रण पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि फिल्म की कहानी जिस ऐतिहासिक संदर्भ से जुड़ी है,उसे लेकर भी पूरी तरह निश्चित होने की आवश्यकता है। उनके अनुसार,महारानी पद्मावती की कहानी मलिक मोहम्मद जायसी ने घटना के कई सदियों बाद लिखी थी। इतने लंबे अंतराल के बाद किसी घटना को साहित्य के रूप में दर्ज किए जाने पर उसमें बदलाव,कल्पना या कुछ घटनाओं के छूट जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
उन्होंने कहा कि किसी कहानी को पूरी तरह ऐतिहासिक तथ्य मान लेना अपने आप में सवाल खड़े करता है। साजिद रशीदी ने जौहर के सामाजिक संदेश पर भी अपनी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति बलात्कार या हत्या के डर से अपनी जान लेता है,तो ऐसी घटना को सीधे बहादुरी से जोड़ना उचित नहीं माना जा सकता।
उन्होंने राजपूत इतिहास में साहस और वीरता की परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि फिल्म में जिस तरह महिलाओं को दुश्मन सेना से बचने के लिए जौहर करते हुए दिखाया गया, उससे समाज में गलत संदेश जाने की आशंका है। उनका कहना था कि ऐसी प्रस्तुति से यह धारणा बन सकती है कि किसी महिला के साथ बलात्कार होने के बाद भी यदि वह जीवित रहती है,तो वह बहादुर नहीं है। उन्होंने इसे बेहद दुखद बताया और कहा कि सेंसर बोर्ड को ऐसी कहानियों को आगे बढ़ाने के मामले में सावधानी बरतनी चाहिए।
उनकी प्रतिक्रिया ने विवाद को एक और आयाम दे दिया,क्योंकि इसमें न केवल स्वरा के बयान बल्कि ‘पद्मावत’ में इतिहास के चित्रण और जौहर के सामाजिक संदेश पर भी सवाल उठाए गए।
मुंबई में वरिष्ठ अधिवक्ता और पूर्व राज्यसभा सांसद मजीद मेमन ने स्वरा भास्कर के बयान का बचाव किया। उन्होंने कहा कि स्वरा सिर्फ एक कलाकार नहीं हैं,बल्कि सामाजिक मुद्दों पर अपनी राय रखने वाली एक्टिविस्ट भी हैं। उनके अनुसार,अभिनेत्री जिस विषय पर बात कर रही थीं,वह इतिहास से जुड़े उदाहरणों को वर्तमान सामाजिक संदर्भ में समझने से संबंधित था।
मजीद मेमन ने कहा कि इतिहास में इस तरह की घटनाओं के उदाहरण मिलते हैं,लेकिन जब किसी ऐतिहासिक घटना को फिल्म या काल्पनिक कथा के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है, तो यह देखना आवश्यक है कि उससे दर्शकों तक किस तरह का संदेश पहुंच रहा है। उनके अनुसार,स्वरा के बयान को इसी संदर्भ में समझा जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि अगर कोई व्यक्ति किसी गंभीर अपराध का शिकार होता है और उसके बाद अपनी जान ले लेता है,तो इसे बहादुरी के रूप में देखना उचित नहीं है। अपराध का सामना करने वाले व्यक्ति को कानून और न्याय व्यवस्था के माध्यम से लड़ने का अधिकार है। उन्होंने माना कि स्वरा भास्कर के बयान का आशय भी इसी बात को सामने रखना था कि किसी अपराध के पीड़ित को जीवन समाप्त करने के बजाय न्याय के लिए संघर्ष करने का संदेश मिलना चाहिए।
कांग्रेस सांसद तारिक अनवर ने भी इस विवाद पर प्रतिक्रिया दी और ऐतिहासिक घटनाओं को उनके समय के सामाजिक संदर्भ में देखने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि पुराने समय में समाज में कई ऐसी परंपराएँ थीं,जिन्हें उस दौर के लोग स्वीकार करते थे। हालाँकि,समय के साथ समाज की सोच बदली और कई पुरानी प्रथाओं को गलत मानते हुए उनमें बदलाव किया गया।
उन्होंने विधवा विवाह का उदाहरण देते हुए कहा कि एक समय में विधवाओं को दोबारा विवाह करने का अधिकार नहीं था,लेकिन आज संविधान और कानून उन्हें यह अधिकार देते हैं। इसी तरह इतिहास में ऐसी कई सामाजिक व्यवस्थाएँ रही हैं,जिन्हें आज का समाज स्वीकार नहीं करता।
तारिक अनवर के अनुसार,किसी ऐतिहासिक घटना को समझते समय उसके दौर की परिस्थितियों और वर्तमान समय की सामाजिक सोच के बीच अंतर करना जरूरी है। उनका कहना था कि इतिहास में जो हुआ, उसे उस समय की परिस्थितियों के संदर्भ में समझना चाहिए,जबकि वर्तमान समाज को अपने मौजूदा मूल्यों और संवैधानिक अधिकारों के आधार पर आगे बढ़ना चाहिए।
दूसरी ओर,भाजपा नेताओं की तरफ से स्वरा भास्कर के बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया सामने आई। जयपुर के भाजपा विधायक गोपाल शर्मा ने अभिनेत्री पर निशाना साधते हुए उनके बयान को लेकर तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों को देश की परंपराओं और भावनाओं की समझ नहीं है। उन्होंने स्वरा की टिप्पणी को राष्ट्र और ऐतिहासिक परंपराओं के प्रति संवेदनशीलता की कमी से जोड़ते हुए आलोचना की।
भाजपा नेता शाजिया इल्मी ने भी स्वरा भास्कर की आलोचना की। उन्होंने कहा कि कम जानकारी खतरनाक हो सकती है और अभिनेत्री के बयान से यह स्पष्ट होता है कि उन्हें इतिहास की कितनी समझ है। उन्होंने खास तौर पर इस बात पर सवाल उठाया कि जौहर के ऐतिहासिक प्रसंग को बलात्कार से जुड़े आधुनिक संदर्भ के साथ किस तरह जोड़ा जा सकता है।
भाजपा नेताओं का तर्क है कि जौहर की घटनाओं को उस समय की युद्ध परिस्थितियों, सामाजिक व्यवस्था और महिलाओं के सामने मौजूद विकल्पों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। उनके मुताबिक,आधुनिक नजरिए से ऐतिहासिक घटनाओं का मूल्यांकन करते समय उस दौर की परिस्थितियों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
जयपुर में वित्त आयोग के चेयरमैन अरुण चतुर्वेदी ने भी विवाद पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि इतिहास और वर्तमान को अलग-अलग नजरिए से देखने की जरूरत है। उनके अनुसार,जिस दौर में महिलाओं ने अपनी अस्मिता और सम्मान की रक्षा के लिए जौहर किया,उस समय की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियां आज से पूरी तरह अलग थीं।
उन्होंने कहा कि आज का समाज न तो सती प्रथा का समर्थन करता है और न ही जौहर की परंपरा को अपनाता है। हालाँकि,इतिहास में जो घटनाएँ घट चुकी हैं,उन्हें केवल वर्तमान समय के नजरिए से सीधे सही या गलत ठहराना भी उचित नहीं होगा। उन्होंने कहा कि उस समय की परिस्थितियों और आज की सामाजिक सोच में बड़ा अंतर है और ऐतिहासिक घटनाओं को समझते समय इस अंतर को ध्यान में रखना चाहिए।
फिल्म ‘पद्मावत’ को लेकर विवाद कोई नया नहीं है। फिल्म की रिलीज से पहले भी इसकी कहानी,पात्रों और ऐतिहासिक तथ्यों के चित्रण को लेकर देशभर में काफी विरोध हुआ था। फिल्म में रानी पद्मावती,राजा रतन सिंह और अलाउद्दीन खिलजी से जुड़े प्रसंगों को प्रस्तुत किया गया था। फिल्म के निर्माण और प्रदर्शन के दौरान राजपूत संगठनों तथा अन्य समूहों ने इसके कुछ दृश्यों और कथानक को लेकर आपत्ति जताई थी।
स्वरा भास्कर ने भी वर्ष 2018 में फिल्म की रिलीज के बाद एक खुला पत्र लिखकर जौहर के दृश्य पर अपनी आपत्ति जताई थी। अब वर्षों बाद उसी पत्र के संदर्भ में पूछे गए सवाल ने एक बार फिर उस बहस को सामने ला दिया है।
इस पूरे विवाद में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि फिल्में ऐतिहासिक घटनाओं को किस हद तक वास्तविक रूप में प्रस्तुत करती हैं और किस हद तक उनमें साहित्यिक या सिनेमाई कल्पना शामिल होती है। ‘पद्मावत’ की कहानी भी इतिहास और साहित्य के बीच मौजूद लंबे अंतराल तथा विभिन्न स्रोतों में उपलब्ध विवरणों के कारण लंबे समय से चर्चा का विषय रही है।
स्वरा भास्कर के बयान से उठी बहस का एक बड़ा हिस्सा महिला अधिकारों और बलात्कार पीड़िताओं के प्रति समाज के रवैये से जुड़ा है। अभिनेत्री ने जिस सवाल को उठाया, उसका केंद्र यह था कि किसी महिला के साथ यौन हिंसा होने के बाद उसे शर्म या अपराधबोध के साथ देखने के बजाय उसे जीवन जीने और न्याय पाने का अधिकार मिलना चाहिए।
दूसरी ओर,आलोचकों का कहना है कि जौहर को केवल आधुनिक सामाजिक अवधारणाओं के आधार पर समझना ऐतिहासिक परिस्थितियों के साथ न्याय नहीं करता। उनके मुताबिक,युद्ध के समय महिलाओं के सामने मौजूद परिस्थितियाँ आज के समाज से बिल्कुल अलग थीं और उस दौर में जौहर को कुछ समुदायों में अलग सामाजिक और ऐतिहासिक अर्थों के साथ देखा गया।
यही अंतर इस विवाद को और जटिल बनाता है। एक पक्ष वर्तमान समाज में महिलाओं के अधिकार और गरिमा की बात कर रहा है,जबकि दूसरा पक्ष ऐतिहासिक परंपराओं और उस दौर की परिस्थितियों के सम्मान पर जोर दे रहा है।
स्वरा भास्कर के बयान का एक हिस्सा सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद विवाद तेजी से बढ़ा। सोशल मीडिया पर अक्सर लंबे वक्तव्यों के छोटे हिस्से वायरल हो जाते हैं और कई बार मूल संदर्भ पीछे छूट जाता है। इस मामले में भी अभिनेत्री ने बाद में सामने आकर अपने बयान का संदर्भ स्पष्ट करने की कोशिश की।
हालाँकि,उनके स्पष्टीकरण के बावजूद राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ जारी हैं। इस घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि सार्वजनिक हस्तियों द्वारा इतिहास,धर्म, संस्कृति और संवेदनशील सामाजिक मुद्दों पर की गई टिप्पणियों को किस तरह समझा और प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
फिलहाल,स्वरा भास्कर के बयान को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बहस जारी है। समर्थकों का कहना है कि अभिनेत्री ने आधुनिक समाज में बलात्कार पीड़िताओं के अधिकार और सम्मान का मुद्दा उठाया है,जबकि आलोचक इसे जौहर और राजपूत इतिहास के प्रति आपत्तिजनक टिप्पणी मान रहे हैं। विवाद के केंद्र में केवल स्वरा का बयान नहीं,बल्कि इतिहास को वर्तमान नजरिए से देखने,फिल्मों में ऐतिहासिक घटनाओं के चित्रण और महिलाओं के सम्मान तथा अधिकारों को लेकर समाज की बदलती सोच का व्यापक प्रश्न भी शामिल हो गया है।
