प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (तस्वीर क्रेडिट@mukeshdeshka)

प्रधानमंत्री मोदी ने साझा किया संस्कृत सुभाषित,बताया- ज्ञान, सेवा और सद्भाव से जीवन में मिलती है सच्ची उन्नति

नई दिल्ली,26 अगस्त (युआईटीवी)- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर एक संस्कृत सुभाषित साझा किया। प्रधानमंत्री की ओर से लगातार संस्कृत श्लोक और उनके भावार्थ साझा किए जा रहे हैं। बुधवार को साझा किए गए श्लोक में ज्ञान,परस्पर सम्मान,सेवा, सद्भाव और निःस्वार्थ भाव को जीवन में सुख और उन्नति का आधार बताया गया है। प्रधानमंत्री ने संस्कृत श्लोक के साथ उसका हिंदी भावार्थ भी साझा किया,जिसमें बताया गया कि ज्ञानी और सज्जन व्यक्ति एक-दूसरे के प्रति सम्मान और सेवा का भाव रखते हैं तथा व्यक्तिगत लाभ की इच्छा से दूर रहकर जीवन में सुखपूर्वक आगे बढ़ते हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को लिखा, “ज्ञानवृद्धाः प्रशंसन्ति शुश्रूषन्तः परस्परम्। विनिवृत्ताभिसन्धानाः सुखमेधन्ति सर्वशः॥” इस श्लोक का हिंदी अर्थ है कि ज्ञानी और सज्जन व्यक्ति परस्पर सम्मान, सेवा और सद्भाव का व्यवहार करते हैं। वे व्यक्तिगत लाभ की भावना से मुक्त होकर एक-दूसरे की सेवा तथा प्रशंसा करते हुए जीवन में सुखपूर्वक उन्नति प्राप्त करते हैं। श्लोक के जरिए प्रधानमंत्री ने ज्ञान के साथ विनम्रता, सेवा और सकारात्मक सामाजिक व्यवहार के महत्व को रेखांकित किया।

प्रधानमंत्री की ओर से पिछले कुछ दिनों से लगातार सुभाषित साझा किए जा रहे हैं। इससे पहले मंगलवार को भी उन्होंने एक संस्कृत श्लोक साझा किया था। उन्होंने लिखा था, “उत्तमैः सह साङ्गत्यं पण्डितैः सह सत्कथाम्‌। अलुब्धैः सह मित्रत्वं कुर्वाणो नावसीदति॥” इस श्लोक के माध्यम से अच्छी संगति और सकारात्मक संबंधों के महत्व को बताया गया था।

मंगलवार को साझा किए गए श्लोक का हिंदी अर्थ था कि उत्तम व्यक्तियों की संगति करने वाला,विद्वानों के साथ सत्संवाद करने वाला और निःस्वार्थ तथा निर्लोभी लोगों के साथ मित्रता रखने वाला व्यक्ति कभी दुखी नहीं होता। इस संदेश में अच्छे लोगों की संगति,ज्ञानवर्धक बातचीत और स्वार्थरहित मित्रता को जीवन को बेहतर बनाने वाला बताया गया था।

इससे एक दिन पहले सोमवार को भी प्रधानमंत्री ने एक संस्कृत सुभाषित साझा किया था। उन्होंने लिखा था, “करुणा से आत्म-सम्मान और संतोष से सच्ची खुशी मिलती है। इसी भाव से समाज में सहयोग और सद्भाव की डोर और सशक्त होती है।” इसके साथ उन्होंने संस्कृत श्लोक, “कारुण्येनात्मनो मानं तृष्णां च परितोषतः। उत्थानेन जयेत्तन्द्रीं वितर्कं निश्चयाज्जयेत्॥” साझा किया था।

इस श्लोक के भावार्थ में कहा गया था कि दूसरों के प्रति करुणा का भाव रखने से आत्म-सम्मान प्राप्त होता है और संतोषी रहने से तृष्णा पर विजय पाई जा सकती है। पुरुषार्थ के जरिए आलस्य को हराया जा सकता है और निश्चय के माध्यम से आधारहीन आशंकाओं तथा अनावश्यक विचारों पर विजय प्राप्त की जा सकती है।

पिछले तीन दिनों में प्रधानमंत्री की ओर से साझा किए गए इन सुभाषितों में अलग-अलग मूल्यों पर जोर दिया गया है। सोमवार के संदेश में करुणा,संतोष,पुरुषार्थ और निश्चय की बात कही गई,मंगलवार को अच्छी संगति,विद्वानों के साथ संवाद और निःस्वार्थ मित्रता का महत्व बताया गया,जबकि बुधवार के सुभाषित में ज्ञान,सेवा,परस्पर सम्मान और सद्भाव को सुखी जीवन तथा उन्नति का आधार बताया गया।

बुधवार के श्लोक का संदेश व्यक्तिगत जीवन के साथ-साथ सामाजिक व्यवहार से भी जुड़ा हुआ है। इसमें बताया गया है कि जब ज्ञान और सज्जनता के साथ व्यक्ति एक-दूसरे की प्रशंसा और सेवा करता है तथा अपने निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर व्यवहार करता है, तो समाज में सकारात्मक वातावरण बनता है। ऐसे संबंध व्यक्ति को मानसिक संतोष देने के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा भी देते हैं।

प्रधानमंत्री द्वारा लगातार संस्कृत सुभाषित साझा किए जाने का उद्देश्य इनके माध्यम से जीवन मूल्यों और सकारात्मक विचारों को सामने रखना है। इन श्लोकों में भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़े विचारों को सरल हिंदी भावार्थ के साथ प्रस्तुत किया जा रहा है,जिससे लोग उनके संदेश को आसानी से समझ सकें।

बुधवार को साझा किए गए सुभाषित का मूल संदेश यही है कि ज्ञान केवल व्यक्तिगत उन्नति का साधन नहीं है,बल्कि उसका सही उपयोग दूसरों के प्रति सम्मान,सेवा और सद्भाव में होना चाहिए। जब व्यक्ति स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज और आसपास के लोगों के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखता है,तो उसके जीवन में सुख और उन्नति के रास्ते भी मजबूत होते हैं। प्रधानमंत्री के लगातार साझा किए जा रहे इन संदेशों में इसी तरह के जीवन मूल्यों को प्रमुखता दी जा रही है।