गुरजंत सिंह ने अंतर्राष्ट्रीय हॉकी को कहा अलविदा (तस्वीर क्रेडिट@TheHockeyIndia)

दो बार ओलंपिक में पदक विजेता गुरजंत सिंह ने अंतर्राष्ट्रीय हॉकी को कहा अलविदा,भावुक शब्दों में किया संन्यास का ऐलान

नई दिल्ली, 28 मार्च (युआईटीवी)- भारतीय पुरुष हॉकी टीम के अनुभवी फॉरवर्ड गुरजंत सिंह ने शुक्रवार को नई दिल्ली में आयोजित हॉकी इंडिया पुरस्कार समारोह के दौरान अंतर्राष्ट्रीय हॉकी से संन्यास लेने की घोषणा कर दी। 31 वर्षीय इस स्टार खिलाड़ी का यह फैसला भारतीय हॉकी के लिए एक भावनात्मक क्षण लेकर आया,क्योंकि उन्होंने पिछले लगभग एक दशक तक टीम इंडिया की सफलता में अहम भूमिका निभाई है।

गुरजंत सिंह ने अपने करियर में भारत के लिए कुल 130 अंतर्राष्ट्रीय मैच खेले,जिसमें उन्होंने 33 गोल दागे। मैदान पर उनकी तेज गति,आक्रामक खेल शैली और बड़े मुकाबलों में निर्णायक गोल करने की क्षमता ने उन्हें टीम का एक भरोसेमंद खिलाड़ी बना दिया था। उनके संन्यास के साथ भारतीय हॉकी एक ऐसे खिलाड़ी को अलविदा कह रही है,जिसने टीम के पुनरुत्थान के दौर में अहम योगदान दिया।

26 जनवरी 1995 को पंजाब के अमृतसर जिले के खैलारा गाँव में जन्मे गुरजंत का बचपन से ही हॉकी के प्रति गहरा लगाव था। साधारण पृष्ठभूमि से आने वाले इस खिलाड़ी ने अपने सपनों को पूरा करने के लिए कठिन परिश्रम किया और धीरे-धीरे राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई। उनकी मेहनत और समर्पण का ही परिणाम था कि उन्होंने कम समय में ही भारतीय टीम में जगह बना ली।

गुरजंत के करियर का एक महत्वपूर्ण मोड़ 2016 में आया,जब उन्होंने लखनऊ में आयोजित जूनियर विश्व कप के फाइनल में गोल कर भारत को खिताब दिलाने में अहम भूमिका निभाई। यह जीत भारतीय हॉकी के लिए बेहद खास थी और इसने गुरजंत को भविष्य के सितारे के रूप में स्थापित कर दिया।

इसके बाद 2017 में उन्होंने सीनियर भारतीय टीम के लिए डेब्यू किया और जल्द ही टीम के नियमित सदस्य बन गए। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियाँ ओलंपिक खेलों में देखने को मिलीं, जहाँ उन्होंने टोक्यो 2020 ओलंपिक और पेरिस 2024 ओलंपिक दोनों में कांस्य पदक जीतने वाली भारतीय टीम का हिस्सा बनकर इतिहास रच दिया।

टोक्यो ओलंपिक 2020 में भारत ने 41 साल बाद हॉकी में ओलंपिक पदक जीता था,जिसने पूरे देश में खेल के प्रति उत्साह को फिर से जगा दिया। गुरजंत इस ऐतिहासिक टीम का अहम हिस्सा थे। इसके बाद पेरिस 2024 ओलंपिक में भी टीम ने शानदार प्रदर्शन करते हुए कांस्य पदक अपने नाम किया,जिससे भारत ने लगातार दूसरी बार ओलंपिक पोडियम पर जगह बनाई।

ओलंपिक के अलावा,गुरजंत सिंह ने एशियाई स्तर पर भी भारत को कई महत्वपूर्ण जीत दिलाने में योगदान दिया। उन्होंने एशियाई खेल 2022 हांगझोऊ में स्वर्ण पदक जीतने वाली टीम में अहम भूमिका निभाई। इसके अलावा 2017 एशिया कप और कई एशियाई चैंपियंस ट्रॉफी खिताबों में भी उनका योगदान उल्लेखनीय रहा।

उनकी शानदार उपलब्धियों को देखते हुए वर्ष 2021 में उन्हें अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया,जो भारत का एक प्रतिष्ठित खेल सम्मान है। यह सम्मान उनके खेल के प्रति समर्पण और उत्कृष्ट प्रदर्शन का प्रमाण था।

संन्यास की घोषणा करते हुए गुरजंत सिंह भावुक नजर आए। उन्होंने कहा कि वह गर्व और भावनाओं के साथ अपने अंतर्राष्ट्रीय करियर को अलविदा कह रहे हैं। उन्होंने याद किया कि कैसे उन्होंने अपने सीनियर खिलाड़ियों को देखकर हॉकी खेलने का सपना देखा था और उनके साथ देश का प्रतिनिधित्व करना उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक रहा।

उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय हॉकी के ऐतिहासिक पुनरुद्धार का हिस्सा बनना और दो ओलंपिक पदक जीतना उनके लिए बेहद संतोषजनक अनुभव रहा है। गुरजंत ने अपने साथियों के साथ बिताए समय को अपनी सबसे बड़ी पूँजी बताया और कहा कि टीम हमेशा एक परिवार की तरह रही,जहाँ हर खिलाड़ी ने एक-दूसरे का साथ दिया।

गुरजंत ने हॉकी इंडिया का भी आभार व्यक्त किया,जिन्होंने उन्हें सम्मानजनक विदाई दी। उन्होंने कहा कि वह अंतर्राष्ट्रीय हॉकी को एक खुश और गर्वित खिलाड़ी के रूप में छोड़ रहे हैं और आने वाले समय में भी खेल से जुड़े रहने की उम्मीद रखते हैं।

इस मौके पर हॉकी इंडिया के अध्यक्ष दिलीप तिर्की ने गुरजंत के योगदान की सराहना करते हुए कहा कि वह लगभग एक दशक तक भारतीय हॉकी की कहानी का अहम हिस्सा रहे हैं। उनकी रफ्तार, ऊर्जा और बड़े मौकों पर गोल करने की क्षमता ने उन्हें विरोधियों के लिए खतरनाक खिलाड़ी बना दिया था।

हॉकी इंडिया के महासचिव भोला नाथ सिंह ने भी गुरजंत के सफर को प्रेरणादायक बताते हुए कहा कि पंजाब के खेतों से लेकर ओलंपिक पोडियम तक पहुँचने का उनका सफर देश के हर युवा खिलाड़ी के लिए एक उदाहरण है। उन्होंने कहा कि गुरजंत की विरासत आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।

गुरजंत सिंह का संन्यास भारतीय हॉकी के लिए एक युग का अंत माना जा रहा है। हालाँकि, उनके योगदान और उपलब्धियाँ हमेशा याद की जाएँगी। उन्होंने जिस तरह से टीम इंडिया को कठिन समय में सँभाला और उसे नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने में मदद की,वह आने वाले वर्षों में भी खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।