सुप्रीम कोर्ट

यूजीसी मामले में सुप्रीम कोर्ट की अहम सुनवाई,केंद्र को जवाब दाखिल करने के लिए चार सप्ताह की मोहलत

नई दिल्ली,21 अगस्त (युआईटीवी)- विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने अदालत से अपना जवाब दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय माँगा, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने मंजूर कर लिया। केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता अदालत में पेश हुए और उन्होंने जवाब दाखिल करने के लिए अतिरिक्त समय देने का अनुरोध किया। अदालत ने सरकार को चार सप्ताह के भीतर अपना काउंटर एफिडेविट दाखिल करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही मामले से जुड़े अन्य पक्षों को भी अपने-अपने जवाब और काउंटर एफिडेविट दाखिल करने की अनुमति दी गई है।

सुनवाई के बाद मामले से जुड़े अधिवक्ता सत्यम पांडे ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को चार सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। उन्होंने कहा कि सरकार के अलावा इस मामले से जुड़े अन्य पक्ष भी निर्धारित अवधि में अपने जवाब अदालत के समक्ष दाखिल कर सकेंगे। अब यह मामला चार सप्ताह बाद दोबारा सुप्रीम कोर्ट के सामने आएगा,जब अदालत सरकार और अन्य संबंधित पक्षों की ओर से दाखिल किए जाने वाले दस्तावेजों और दलीलों पर आगे विचार करेगी।

इस सुनवाई के दौरान मामले की मूल याचिका की स्वीकार्यता यानी मेंटेनेबिलिटी को लेकर भी महत्वपूर्ण सवाल उठाया गया। अधिवक्ता सत्यम पांडे ने आबिदा सलीम तड़वी की ओर से वर्ष 2019 में दायर की गई याचिका की मेंटेनेबिलिटी पर सवाल उठाया। उनके अनुसार, इसी याचिका के आधार पर यूजीसी के ड्राफ्ट को तैयार करने से संबंधित आदेश पारित हुआ था। उन्होंने अदालत के सामने यह तर्क रखा कि संबंधित याचिका जनहित याचिका यानी पीआईएल के रूप में दाखिल की गई है और जनहित याचिका की प्रकृति को देखते हुए उसमें याचिकाकर्ता का व्यक्तिगत हित नहीं होना चाहिए।

अधिवक्ता की ओर से अदालत में यह दलील दी गई कि यदि किसी जनहित याचिका को दाखिल करने वाला व्यक्ति खुद उस मामले से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है या व्यक्तिगत रूप से प्रभावित पक्ष है,तो ऐसी याचिका की स्वीकार्यता पर सवाल उठ सकता है। उनका कहना था कि जनहित याचिका का उद्देश्य व्यापक सार्वजनिक हित से जुड़े मुद्दों को अदालत के सामने लाना है। ऐसे मामलों में याचिकाकर्ता की व्यक्तिगत रुचि या निजी हित की भूमिका को लेकर अदालत को सावधानी बरतनी चाहिए।

सत्यम पांडे ने सुनवाई के दौरान आबिदा सलीम तड़वी और पायल सलीम तड़वी के बीच संबंध का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार,आबिदा सलीम तड़वी,पायल सलीम तड़वी की माँ हैं। पायल सलीम तड़वी की कथित तौर पर जाति उत्पीड़न से परेशान होकर आत्महत्या किए जाने का मामला इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि से जुड़ा हुआ है। इसी संदर्भ में अधिवक्ता ने अदालत के समक्ष यह आशंका जताई कि याचिकाकर्ता के व्यक्तिगत संबंध और मामले में उनकी रुचि का प्रभाव निचली अदालत में लंबित आपराधिक मुकदमे की कार्यवाही पर पड़ सकता है।

अधिवक्ता ने तर्क दिया कि यदि किसी मामले से व्यक्तिगत रूप से जुड़ा हुआ व्यक्ति जनहित याचिका के माध्यम से उसी विषय को व्यापक सार्वजनिक मुद्दे के रूप में अदालत के सामने लाता है,तो इससे निचली अदालत में चल रहे मुकदमे के संबंध में एक विशेष धारणा बन सकती है। उनका कहना था कि ऐसा वातावरण तैयार हो सकता है जिसमें यह संदेश जाने लगे कि एक माँ जाति उत्पीड़न के खिलाफ लड़ाई लड़ रही है और इससे निचली अदालत में मुकदमे का सामना कर रहे लोगों के मामले पर भी अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ सकता है।

सुनवाई के दौरान अधिवक्ता की ओर से निर्दोषता की कानूनी धारणा का भी उल्लेख किया गया। सत्यम पांडे ने कहा कि देश के कानून का मूल सिद्धांत है कि जब तक किसी व्यक्ति का दोष अदालत में सिद्ध नहीं हो जाता,तब तक उसे दोषी नहीं माना जा सकता। उनका तर्क था कि मौजूदा स्थिति में ऐसा वातावरण बनने की आशंका है,जिसमें कुछ लोगों को न्यायिक फैसला आने से पहले ही दोषी मानने जैसा परसेप्शन पैदा हो सकता है।

उन्होंने अदालत के सामने यह भी कहा कि किसी मामले में सार्वजनिक चर्चा और उससे जुड़ी न्यायिक कार्यवाही के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है। यदि किसी जनहित याचिका के जरिए ऐसा वातावरण तैयार होता है,जिससे निचली अदालत में लंबित मुकदमे की निष्पक्षता या उस पर सार्वजनिक धारणा प्रभावित हो सकती है,तो अदालत को याचिका की स्वीकार्यता पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। इसी आधार पर उनकी ओर से सुप्रीम कोर्ट से संबंधित जनहित याचिका को खारिज करने का अनुरोध किया गया।

हालाँकि,गुरुवार की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर अंतिम फैसला नहीं सुनाया। अदालत ने फिलहाल केंद्र सरकार को अपना जवाब दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया है। इसके साथ ही अन्य पक्षों को भी अपने जवाब दाखिल करने का अवसर दिया गया है। इसका मतलब है कि मामले के विभिन्न पक्ष अब अपनी-अपनी दलीलों और दस्तावेजों को अदालत के सामने रखने की तैयारी करेंगे। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट आगे की सुनवाई में इन सभी पहलुओं पर विचार कर सकता है।

केंद्र सरकार की ओर से जवाब दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय मांगा जाना भी मामले की अगली सुनवाई के लिहाज से महत्वपूर्ण है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सरकार की ओर से अदालत से यह समय माँगा,जिसके बाद अदालत ने अनुरोध स्वीकार कर लिया। अब केंद्र सरकार को निर्धारित अवधि के भीतर अपना काउंटर एफिडेविट दाखिल करना होगा। इसमें सरकार मामले से जुड़े अपने पक्ष,संबंधित तथ्यों और उठाए गए कानूनी सवालों पर अपना रुख स्पष्ट कर सकती है।

मामले से जुड़े अन्य पक्ष भी इसी अवधि में अपने जवाब दाखिल कर सकेंगे। इससे सुप्रीम कोर्ट के सामने अगली सुनवाई के समय सभी संबंधित पक्षों की दलीलें और उनका कानूनी पक्ष अधिक स्पष्ट रूप से मौजूद होगा। अदालत इसके बाद यह तय कर सकती है कि मामले को किस दिशा में आगे बढ़ाया जाना है और याचिका की स्वीकार्यता से जुड़े सवालों पर किस तरह विचार किया जाएगा।

यह मामला यूजीसी से जुड़े उस विवाद की वजह से महत्वपूर्ण है,जिसमें वर्ष 2019 में दाखिल की गई याचिका के आधार पर यूजीसी के ड्राफ्ट को तैयार करने से संबंधित आदेश पारित होने की बात कही गई है। अब याचिका की मेंटेनेबिलिटी पर उठे सवाल के कारण मामले की न्यायिक जाँच का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी बन गया है कि संबंधित जनहित याचिका किस आधार पर दाखिल की गई थी और क्या याचिकाकर्ता की व्यक्तिगत पृष्ठभूमि या मामले से संबंध उसकी स्वीकार्यता को प्रभावित करता है।

जनहित याचिका की अवधारणा में व्यापक सार्वजनिक हित को प्राथमिकता दी जाती है। अदालतें समय-समय पर यह देखती रही हैं कि पीआईएल का इस्तेमाल वास्तविक जनहित के मुद्दों को उठाने के लिए हो और इसका उपयोग किसी व्यक्तिगत विवाद या निजी हित को आगे बढ़ाने के लिए न किया जाए। इसी व्यापक कानूनी सिद्धांत के आधार पर इस मामले में याचिकाकर्ता के व्यक्तिगत संबंधों और हितों को लेकर सवाल उठाया गया है।

दूसरी ओर,जाति उत्पीड़न जैसे गंभीर सामाजिक मुद्दों से जुड़े मामलों में पीड़ित परिवारों की ओर से उठाई गई आवाज को भी व्यापक सार्वजनिक चिंता के रूप में देखा जाता है। इसलिए इस मामले में अदालत के सामने एक तरफ जनहित याचिका की स्वीकार्यता और दूसरी तरफ व्यक्तिगत हित तथा सार्वजनिक हित के बीच अंतर का प्रश्न है। इसके अलावा निचली अदालत में लंबित मुकदमे की निष्पक्षता और उसमें शामिल व्यक्तियों के कानूनी अधिकारों की सुरक्षा का पहलू भी जुड़ा हुआ है।

अधिवक्ता सत्यम पांडे के अनुसार,उनकी ओर से अदालत के सामने मुख्य चिंता यही रखी गई कि किसी व्यक्ति को अदालत द्वारा दोषी ठहराए जाने से पहले ही सार्वजनिक धारणा में दोषी के रूप में पेश नहीं किया जाना चाहिए। उनका कहना था कि यदि जनहित याचिका के माध्यम से ऐसी स्थिति बनती है,तो इससे निचली अदालत में चल रहे ट्रायल पर असर पड़ने की आशंका हो सकती है। इसलिए उन्होंने व्यक्तिगत हित वाले पक्ष की ओर से दाखिल पीआईएल को स्वीकार नहीं किए जाने की माँग की।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क पर अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है। अदालत ने केंद्र और अन्य पक्षों को जवाब दाखिल करने का अवसर देकर मामले को आगे की सुनवाई के लिए रखा है। चार सप्ताह के भीतर सरकार का काउंटर एफिडेविट दाखिल होने के बाद इस मामले में कई कानूनी पहलुओं पर स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकती है।

अब अगली सुनवाई में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि केंद्र सरकार यूजीसी से जुड़े विवाद पर क्या रुख अपनाती है और जनहित याचिका की मेंटेनेबिलिटी को लेकर उठाए गए सवालों का किस तरह जवाब देती है। साथ ही अन्य पक्षों की ओर से दाखिल किए जाने वाले जवाब भी मामले की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

इस तरह गुरुवार की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल कोई अंतिम फैसला देने के बजाय मामले को आगे की प्रक्रिया के लिए समय दिया है। केंद्र सरकार को चार सप्ताह की मोहलत मिल गई है और अन्य संबंधित पक्षों को भी अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया है। अब चार सप्ताह बाद होने वाली सुनवाई में अदालत के सामने सरकार का जवाब,अन्य पक्षों के काउंटर एफिडेविट और जनहित याचिका की स्वीकार्यता को लेकर उठाए गए कानूनी सवाल महत्वपूर्ण रहेंगे।