रामनाथ गोयनका पत्रकारिता पुरस्कार समारोह को उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने संबोधित किया (तस्वीर क्रेडिट@DrKirodilalBJP)

निडर और सच्ची पत्रकारिता का जश्न हैं रामनाथ गोयनका पुरस्कार: सीपी राधाकृष्णन

नई दिल्ली,28 मार्च (युआईटीवी)- नई दिल्ली में आयोजित प्रतिष्ठित रामनाथ गोयनका एक्सीलेंस इन जर्नलिज्म अवार्ड्स के 20वें संस्करण में भारत के उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने पत्रकारिता की भूमिका और उसके मूल्यों पर महत्वपूर्ण विचार साझा किए। इस कार्यक्रम का आयोजन इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप द्वारा किया गया,जिसमें देशभर के वरिष्ठ पत्रकार,संपादक और मीडिया से जुड़े कई प्रमुख लोग शामिल हुए। अपने संबोधन में उपराष्ट्रपति ने कहा कि ये पुरस्कार केवल पेशेवर उपलब्धियों का सम्मान नहीं करते,बल्कि निडर,स्वतंत्र और सच्ची पत्रकारिता की आत्मा का भी उत्सव हैं।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि पिछले दो दशकों से ये पुरस्कार रामनाथ गोयनका की विरासत को सम्मानित कर रहे हैं,जो साहस,स्वतंत्रता और सत्य के प्रति अडिग प्रतिबद्धता का प्रतीक रही है। उन्होंने बताया कि गोयनका का जीवन और उनका कार्यकाल भारतीय पत्रकारिता के सबसे चुनौतीपूर्ण दौरों में से एक के दौरान सामने आया,जब उन्होंने बिना किसी भय के सत्ता के खिलाफ आवाज उठाई।

अपने भाषण में उपराष्ट्रपति ने ऐतिहासिक संदर्भों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान रामनाथ गोयनका ने ब्रिटिश शासन की सेंसरशिप का विरोध करते हुए अपने अखबार को बंद करने का साहसिक निर्णय लिया था। यह कदम उस दौर में प्रेस की स्वतंत्रता के लिए एक बड़ा संदेश था। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि संविधान सभा के सदस्य के रूप में गोयनका ने समाचार पत्रों पर कराधान जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपने विचार रखे थे,जिससे प्रेस की स्वतंत्रता को मजबूत करने में मदद मिली।

उपराष्ट्रपति ने आपातकाल के समय की भी चर्चा की,जब प्रेस पर कड़ी पाबंदियाँ लगाई गई थीं। उन्होंने बताया कि उस समय गोयनका ने खाली संपादकीय प्रकाशित कर यह संदेश दिया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर किसी भी प्रकार का अंकुश स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने कहा कि उस दौर में संपादकों को जेल में डाला गया,बिजली की कटौती की गई और आर्थिक नुकसान भी हुआ,लेकिन इसके बावजूद गोयनका अपने सिद्धांतों पर अडिग रहे।

सीपी राधाकृष्णन ने कहा कि रामनाथ गोयनका का जीवन भारत की विविधता में एकता का उदाहरण है। दरभंगा से लेकर चेन्नई और फिर विदिशा से सांसद बनने तक उनका सफर इस बात को दर्शाता है कि भारत की विविध संस्कृति और भाषाएं किस तरह एक साझा राष्ट्रीय भावना में जुड़ी हुई हैं। उन्होंने यह भी बताया कि गोयनका ने अपने अखबारों को कई क्षेत्रीय भाषाओं और अंग्रेजी में प्रकाशित किया,ताकि देश के अधिकतम लोगों तक उनकी पहुँच सुनिश्चित हो सके।

उपराष्ट्रपति ने वर्तमान समय में मीडिया की भूमिका पर भी विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि आज का मीडिया पहले से अधिक शक्तिशाली है,लेकिन इसके साथ ही वह कड़ी जाँच और आलोचना के दायरे में भी है। ऐसे समय में रामनाथ गोयनका के आदर्श मीडिया संस्थानों के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत बन सकते हैं। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता का उद्देश्य केवल खबर देना नहीं,बल्कि समाज को सही दिशा में सोचने और निर्णय लेने में मदद करना भी है।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि चर्चा,बहस और असहमति लोकतंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं,लेकिन इनका उद्देश्य राष्ट्रहित में समाधान निकालना होना चाहिए,न कि समाज में विघटन पैदा करना। उपराष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री के उस संदेश का भी उल्लेख किया,जिसमें उन्होंने औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त होने की बात कही थी। उन्होंने कहा कि मीडिया संस्थानों की जिम्मेदारी है कि वे राष्ट्रीय और वैश्विक घटनाओं को भारतीय दृष्टिकोण से प्रस्तुत करें,जिसमें हमारी सभ्यता और सांस्कृतिक मूल्यों की झलक दिखाई दे।

अपने संबोधन में उपराष्ट्रपति ने मीडिया से यह भी आग्रह किया कि वे केवल समस्याओं और चुनौतियों पर ही ध्यान केंद्रित न करें,बल्कि देश में हो रही प्रगति,नवाचार और जमीनी स्तर पर बदलाव की सकारात्मक कहानियों को भी सामने लाएँ। उन्होंने कहा कि संतुलित पत्रकारिता का मतलब है कि उसमें उपलब्धियों और चुनौतियों दोनों का समुचित चित्रण हो।

कार्यक्रम के अंत में उपराष्ट्रपति ने सभी पुरस्कार विजेताओं को बधाई दी और कहा कि उनकी मेहनत और समर्पण भारतीय पत्रकारिता को नई ऊँचाइयों तक ले जा रहा है। उन्होंने आयोजकों की भी सराहना की कि वे पिछले 20 वर्षों से पत्रकारिता में उत्कृष्टता को सम्मानित करने की इस परंपरा को बनाए हुए हैं।

यह आयोजन न केवल पत्रकारिता के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वालों को सम्मानित करने का अवसर था,बल्कि यह मीडिया की जिम्मेदारियों, उसके मूल्यों और लोकतंत्र में उसकी भूमिका पर गंभीर चिंतन का भी मंच बना। उपराष्ट्रपति के संबोधन ने यह स्पष्ट किया कि आज के दौर में भी निडर और सच्ची पत्रकारिता की आवश्यकता पहले जितनी ही महत्वपूर्ण है।