संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश (तस्वीर क्रेडिट@rashtra_press)

संयुक्त राष्ट्र में भारत को बड़ी कूटनीतिक सफलता,अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक अभिसमय अपनाने की फिर उठी माँग,दोहरे मानदंडों पर भारत का कड़ा संदेश

संयुक्त राष्ट्र,2 जुलाई (युआईटीवी)- संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत को आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक अभियान के मोर्चे पर एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक समर्थन मिला है। महासभा ने भारी बहुमत से पारित एक प्रस्ताव के माध्यम से एक बार फिर सदस्य देशों से भारत द्वारा तीन दशक पहले प्रस्तावित अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक अभिसमय को अपनाने के लिए हरसंभव प्रयास करने का आग्रह किया है। भारत लंबे समय से यह माँग करता रहा है कि दुनिया में आतंकवाद से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए एक ऐसा सार्वभौमिक और बाध्यकारी कानूनी ढाँचा बनाया जाए,जो आतंकवाद की स्पष्ट परिभाषा तय करे और आतंकवादियों तथा उनके समर्थकों के खिलाफ सभी देशों को समान रूप से कार्रवाई करने के लिए बाध्य करे। संयुक्त राष्ट्र महासभा में इस प्रस्ताव को मिले व्यापक समर्थन को भारत की आतंकवाद विरोधी नीति के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।

बुधवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने संयुक्त राष्ट्र वैश्विक आतंकवाद-रोधी रणनीति की नौवीं समीक्षा के दौरान इस मुद्दे पर मतदान कराया। प्रस्ताव के पक्ष में 140 देशों ने मतदान किया,जबकि केवल तीन देशों ने इसका विरोध किया। इस प्रस्ताव के माध्यम से सदस्य देशों से भारत द्वारा प्रस्तुत अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक अभिसमय को अंतिम रूप देने और उसे जल्द अपनाने के लिए गंभीर प्रयास करने का आह्वान किया गया। उल्लेखनीय है कि भारत ने यह प्रस्ताव लगभग 31 वर्ष पहले संयुक्त राष्ट्र के समक्ष रखा था,लेकिन विभिन्न देशों के मतभेदों के कारण यह अब तक लंबित है।

संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने महासभा को संबोधित करते हुए स्पष्ट कहा कि आतंकवाद के खिलाफ प्रभावी वैश्विक लड़ाई तभी संभव है,जब दुनिया के सभी देश बिना किसी भेदभाव के एक समान कानूनी व्यवस्था को स्वीकार करें। उन्होंने कहा कि आज भी आतंकवाद से निपटने के लिए ऐसा कोई सार्वभौमिक रूप से स्वीकार्य कानूनी ढाँचा मौजूद नहीं है,जिसके कारण अंतर्राष्ट्रीय सहयोग कमजोर पड़ जाता है और आतंकवादी संगठनों को विभिन्न देशों की नीतिगत असमानताओं का लाभ मिल जाता है।

भारत ने अपने संबोधन में विशेष रूप से उन दो प्रमुख बाधाओं की ओर ध्यान आकर्षित किया,जो अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक अभिसमय को अपनाने में सबसे बड़ी रुकावट बनी हुई हैं। पी. हरीश ने कहा कि कुछ देश अब भी आतंकवादियों के बीच भेद करने की कोशिश करते हैं और अपने राजनीतिक या रणनीतिक हितों के अनुसार कुछ आतंकवादी संगठनों या व्यक्तियों को अलग नजरिए से देखते हैं। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में किसी भी प्रकार के दोहरे मानदंड स्वीकार नहीं किए जा सकते।

उन्होंने कहा कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को यह समझना होगा कि आतंकवाद का कोई अच्छा या बुरा स्वरूप नहीं होता। यदि किसी देश या संगठन द्वारा किसी आतंकवादी समूह को राजनीतिक उद्देश्य,क्षेत्रीय हित या किसी अन्य कारण से संरक्षण दिया जाता है,तो इससे वैश्विक आतंकवाद विरोधी प्रयास कमजोर होते हैं। उन्होंने सदस्य देशों से आग्रह किया कि आतंकवाद के मुद्दे पर किसी भी प्रकार का भेदभाव समाप्त किया जाए और सभी आतंकवादी संगठनों के खिलाफ समान दृष्टिकोण अपनाया जाए।

भारत ने अपने वक्तव्य में यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी प्रकार की राजनीतिक शिकायत,वैचारिक मतभेद या रणनीतिक उद्देश्य आतंकवाद को उचित नहीं ठहरा सकते। पी. हरीश ने कहा कि आतंकवाद को उसके हर रूप और हर अभिव्यक्ति में बिना किसी शर्त के निंदा की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि निर्दोष नागरिकों के खिलाफ हिंसा को किसी भी परिस्थिति में वैध नहीं माना जा सकता और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को इस सिद्धांत पर एकमत होना चाहिए।

भारत ने आतंकवाद के अपराधियों,उनके आयोजकों,वित्तपोषकों और प्रायोजकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की भी माँग की। पी. हरीश ने कहा कि केवल आतंकवादी हमलों को रोकना पर्याप्त नहीं है,बल्कि उन लोगों को भी न्याय के कटघरे में लाना आवश्यक है, जो आतंकवाद को धन,हथियार,प्रशिक्षण या सुरक्षित ठिकाने उपलब्ध कराते हैं। उन्होंने कहा कि सभी सदस्य देशों की यह जिम्मेदारी है कि वे एक-दूसरे के साथ पूर्ण सहयोग करें और आतंकवादियों को किसी भी प्रकार की शरण या सहायता न मिलने दें।

भारत के अनुसार अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक अभिसमय का सबसे बड़ा उद्देश्य वर्तमान कानूनी कमियों को दूर करना है। इस अभिसमय के लागू होने से आतंकवाद से जुड़े मामलों में अभियोजन और प्रत्यर्पण की प्रक्रिया अधिक प्रभावी हो सकेगी। साथ ही आतंकवादियों और उनके समर्थकों के लिए धन,हथियार और सुरक्षित पनाहगाहों तक पहुँच सीमित करना भी आसान होगा। भारत ने कहा कि अब समय आ गया है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिचय देते हुए इस महत्वपूर्ण अभिसमय को अंतिम रूप दिया जाए।

भारत का यह प्रस्ताव वर्षों से कुछ देशों के विरोध के कारण आगे नहीं बढ़ पाया है। विशेष रूप से पाकिस्तान और कुछ अन्य देश आतंकवाद की परिभाषा को लेकर अलग रुख अपनाते रहे हैं। भारत का आरोप रहा है कि कुछ देश आतंकवादी गतिविधियों में शामिल व्यक्तियों या संगठनों को “स्वतंत्रता सेनानी” या “प्रतिरोध समूह” जैसे नाम देकर उनके प्रति नरम रवैया अपनाने की कोशिश करते हैं। नई दिल्ली का मानना है कि इस प्रकार का दृष्टिकोण आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई को कमजोर करता है और हिंसक संगठनों को वैचारिक समर्थन प्रदान करता है।

इस बार संयुक्त राष्ट्र वैश्विक आतंकवाद-रोधी रणनीति की समीक्षा भी कई मायनों में अलग रही। वर्ष 2006 में इस रणनीति को पहली बार अपनाए जाने के बाद से हर दो वर्ष में इसकी समीक्षा सर्वसम्मति से होती रही है। हालाँकि,इस बार अमेरिका के आग्रह पर इसे मतदान के लिए रखा गया। अमेरिका ने दस्तावेज की आलोचना करते हुए कहा कि यह अनावश्यक रूप से विस्तृत है,वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप पर्याप्त अद्यतन नहीं है और अपने मूल उद्देश्य से भटक गया है।

मतदान के दौरान अमेरिका के साथ केवल इजरायल और अर्जेंटीना ने इस प्रस्ताव का विरोध किया। इसके विपरीत 140 देशों ने इसका समर्थन किया,जबकि 49 देश मतदान के दौरान अनुपस्थित रहे। इस प्रकार अधिकांश सदस्य देशों ने आतंकवाद विरोधी वैश्विक रणनीति के समर्थन में अपना मत दिया। जापान मतदान के दौरान तकनीकी कारणों से हिस्सा नहीं ले सका,लेकिन बाद में उसने स्पष्ट किया कि वह इस दस्तावेज का समर्थन करता है और उसकी अनुपस्थिति केवल तकनीकी त्रुटि के कारण हुई थी।

अपने संबोधन में भारत ने केवल आतंकवाद ही नहीं,बल्कि धार्मिक पूर्वाग्रह और भेदभाव के मुद्दे को भी उठाया। पी. हरीश ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र एक सार्वभौमिक संस्था है और इसलिए उसका दृष्टिकोण भी पूरी तरह संतुलित तथा सार्वभौमिक होना चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी एक या दो धर्मों तक सीमित दृष्टिकोण अपनाने के बजाय सभी धर्मों के प्रति होने वाले पूर्वाग्रह और घृणा का समान रूप से विरोध किया जाना चाहिए।

भारत ने कहा कि वह इस्लामोफोबिया,ईसाई-विरोध और यहूदी-विरोध से प्रेरित सभी प्रकार की घटनाओं की स्पष्ट रूप से निंदा करता है। हालाँकि,उन्होंने यह भी कहा कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को यह स्वीकार करना चाहिए कि अन्य धर्मों के अनुयायी भी विभिन्न देशों में पूर्वाग्रह,भेदभाव और हिंसा का सामना करते हैं। इसलिए संयुक्त राष्ट्र को सभी प्रकार के धार्मिक भेदभाव के खिलाफ समान दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।

विशेषज्ञों का मानना है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत के प्रस्ताव को दोबारा मिले व्यापक समर्थन से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि वैश्विक स्तर पर आतंकवाद के खिलाफ एक मजबूत और समान कानूनी व्यवस्था की आवश्यकता महसूस की जा रही है। हालाँकि,अंतिम सहमति तक पहुँचने के लिए अब भी कुछ राजनीतिक और कूटनीतिक चुनौतियाँ मौजूद हैं,लेकिन इतने बड़े बहुमत का समर्थन भारत के पक्ष को मजबूत करता है।

भारत लंबे समय से यह कहता रहा है कि आतंकवाद किसी एक देश या क्षेत्र की समस्या नहीं है,बल्कि पूरी मानवता के लिए सबसे बड़ा खतरा है। इसलिए इससे लड़ने के लिए वैश्विक स्तर पर समान सोच,समान कानून और समान कार्रवाई की आवश्यकता है। यदि आतंकवाद के खिलाफ अलग-अलग देशों के अलग-अलग मानदंड बने रहेंगे,तो आतंकवादी संगठन इन कमजोरियों का लाभ उठाते रहेंगे।

संयुक्त राष्ट्र महासभा में हुई यह ताजा पहल भारत के लिए केवल एक कूटनीतिक सफलता नहीं है,बल्कि यह उस लंबे अभियान का हिस्सा है,जिसके माध्यम से भारत दुनिया को यह संदेश देना चाहता है कि आतंकवाद के खिलाफ किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया जा सकता। आने वाले समय में यदि अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक अभिसमय को अंतिम रूप मिलता है,तो यह वैश्विक आतंकवाद विरोधी ढाँचे को और अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम साबित हो सकता है।