मुंबई,23 जून (युआईटीवी)- महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के छह सांसदों ने पार्टी नेतृत्व से दूरी बनाते हुए उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की मौजूदगी में शिवसेना का दामन थाम लिया। इस घटनाक्रम को राज्य की राजनीति में उद्धव ठाकरे के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। सांसदों के शामिल होने के बाद एकनाथ शिंदे ने इसे ‘ऑपरेशन टाइगर’ की सफलता करार दिया,जबकि शिवसेना नेताओं ने दावा किया कि इससे पार्टी की ताकत राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर और अधिक मजबूत होगी।
सांसदों के शिवसेना में शामिल होने के बाद आयोजित कार्यक्रम में एकनाथ शिंदे ने कहा कि उन्होंने इस विषय पर प्रेस वार्ता में विस्तार से अपनी बात रख दी है और अब यह स्पष्ट हो गया है कि ‘ऑपरेशन टाइगर’ सफल रहा है। उनके बयान को राजनीतिक हलकों में खास महत्व दिया जा रहा है,क्योंकि पिछले कुछ समय से महाराष्ट्र में विभिन्न दलों के नेताओं के पाला बदलने की चर्चाएं लगातार चल रही थीं। ऐसे में छह सांसदों का एक साथ शिवसेना में शामिल होना एक बड़े राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है।
इस अवसर पर सांसद श्रीकांत शिंदे ने कहा कि ‘ऑपरेशन टाइगर’ की सफलता केवल एक राजनीतिक घटना नहीं है,बल्कि यह शिवसेना के बढ़ते जनाधार और नेतृत्व में लोगों के विश्वास का प्रतीक है। उन्होंने सभी छह सांसदों का शिवसेना परिवार में स्वागत करते हुए कहा कि उनके आने से पार्टी की ताकत में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। उन्होंने विश्वास जताया कि नए साथियों के जुड़ने से संगठन को और मजबूती मिलेगी तथा जनता से जुड़े मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाया जा सकेगा।
महाराष्ट्र सरकार में मंत्री शंभूराज देसाई ने इस घटनाक्रम को अलग नजरिए से पेश किया। उन्होंने कहा कि इन सांसदों को बागी कहना उचित नहीं होगा,क्योंकि उन्होंने कोई विद्रोह नहीं किया बल्कि एक राजनीतिक भूमिका अपनाई है। उनके अनुसार,ये सांसद अपने-अपने लोकसभा क्षेत्रों में विकास कार्य करना चाहते थे और चुनाव के दौरान जनता से किए गए वादों को पूरा करने के लिए प्रयासरत थे,लेकिन उन्हें अपनी ही पार्टी के नेतृत्व से अपेक्षित सहयोग नहीं मिल रहा था। ऐसी स्थिति में उन्होंने जनहित और क्षेत्रीय विकास को प्राथमिकता देते हुए एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में आने का निर्णय लिया।
देसाई ने कहा कि लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी जनता के प्रति होती है। यदि कोई सांसद अपने क्षेत्र के विकास कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए बेहतर मंच चुनता है,तो इसे केवल राजनीतिक दल-बदल के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि शिवसेना ऐसे सभी नेताओं का स्वागत करती है,जो विकास और जनसेवा के उद्देश्य से पार्टी के साथ जुड़ना चाहते हैं।
शिवसेना विधायक संजय गायकवाड़ ने भी इस घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि राजनीति में हर जनप्रतिनिधि अपनी राजनीतिक सुरक्षा और भविष्य को लेकर चिंतित रहता है। उन्होंने कहा कि सांसदों और विधायकों को जनता के बीच रहकर काम करना होता है तथा उन्हें अपने क्षेत्रों की समस्याओं का समाधान भी करना पड़ता है। यदि पार्टी नेतृत्व अपने प्रतिनिधियों से संवाद नहीं करता और उनकी बात सुनने को तैयार नहीं होता,तो स्वाभाविक रूप से वे ऐसे नेतृत्व की ओर आकर्षित होंगे जहाँ उनकी बात को महत्व दिया जाए।
गायकवाड़ ने दावा किया कि छह सांसदों के शामिल होने के बाद महाराष्ट्र में सांसदों की संख्या के आधार पर शिवसेना सबसे मजबूत पार्टी के रूप में उभरी है। उन्होंने कहा कि ये सांसद दो वर्ष पहले जनता के विश्वास से चुनकर आए थे और वे अपने क्षेत्र के विकास के लिए लगातार प्रयास कर रहे थे,लेकिन जब उन्हें लगा कि उनकी राजनीतिक और विकास संबंधी प्राथमिकताओं को पर्याप्त समर्थन नहीं मिल रहा है,तब उन्होंने एकनाथ शिंदे के नेतृत्व को स्वीकार करने का फैसला किया।
इस बीच शिवसेना सांसद ज्योति वाघमारे ने भी नए सांसदों के पार्टी में शामिल होने का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र की जनता ने एकनाथ शिंदे के नेतृत्व पर भरोसा जताया है,क्योंकि वे लगातार लोगों के बीच रहते हैं और उनकी समस्याओं को समझने का प्रयास करते हैं। वाघमारे ने कहा कि जनता ऐसे नेतृत्व को पसंद करती है जो जमीन पर सक्रिय रहे और आम लोगों के दुख-दर्द में सहभागी बने। उन्होंने दावा किया कि इसी कारण अधिक से अधिक जनप्रतिनिधि और कार्यकर्ता शिंदे के नेतृत्व में भरोसा जता रहे हैं।
दूसरी ओर,इस घटनाक्रम ने उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) के सामने नई चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं। पहले ही पार्टी को संगठनात्मक स्तर पर कई झटके लग चुके हैं और अब छह सांसदों का एक साथ अलग होना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इससे आगामी चुनावों और पार्टी की रणनीति पर असर पड़ सकता है। हालाँकि,उद्धव ठाकरे गुट की ओर से इस घटनाक्रम पर विस्तृत प्रतिक्रिया का इंतजार किया जा रहा है।
राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के नेता जीशान सिद्दीकी ने भी इस मुद्दे पर अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि यदि किसी जनप्रतिनिधि को अपनी पार्टी में अपनी बात रखने का अवसर नहीं मिलता या वह शीर्ष नेतृत्व तक अपनी चिंताओं को नहीं पहुँचा पाता,तो उसके लिए वैकल्पिक राजनीतिक रास्ता तलाशना स्वाभाविक हो जाता है। उनके अनुसार,नेता वहीं जाने का निर्णय लेते हैं,जहाँ उनकी बात सुनी जाए और उन्हें काम करने का अवसर मिले।
महाराष्ट्र की राजनीति में यह घटनाक्रम केवल दल-बदल तक सीमित नहीं माना जा रहा,बल्कि इसे नेतृत्व,संगठन और जनप्रतिनिधियों के बीच संवाद की राजनीति से भी जोड़कर देखा जा रहा है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि छह सांसदों के इस फैसले का राज्य की राजनीतिक तस्वीर पर कितना प्रभाव पड़ता है। फिलहाल इतना तय है कि ‘ऑपरेशन टाइगर’ के नाम से सामने आई इस राजनीतिक घटना ने महाराष्ट्र की सियासत में नई बहस और नई हलचल पैदा कर दी है।
