जबलपुर,28 मई (युआईटीवी)- मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने चर्चित ट्विशा शर्मा मौत मामले में बड़ा और अहम फैसला सुनाते हुए मृतका की सास एवं पूर्व न्यायाधीश गिरिबाला सिंह को दी गई अंतरिम अग्रिम जमानत रद्द कर दी है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में साफ कहा कि निचली अदालत ने मामले की गंभीरता को नजरअंदाज करते हुए जल्दबाजी में राहत दे दी थी। अदालत ने यह भी माना कि उपलब्ध साक्ष्य,पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट और जाँच की स्थिति को देखते हुए आरोपी पक्ष को किसी प्रकार की राहत देना न्यायोचित नहीं था। इस फैसले के बाद मामला एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है और न्यायिक प्रक्रिया पर भी व्यापक चर्चा शुरू हो गई है।
यह आदेश हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति देव नारायण मिश्रा की एकलपीठ ने पारित किया। अदालत ने अपने विस्तृत आदेश में कहा कि जमानत रद्द करने के लिए केवल सामान्य कारण पर्याप्त नहीं होते,बल्कि “ठोस और भारी कारण” मौजूद होना आवश्यक है। अदालत ने माना कि इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद महत्वपूर्ण तथ्यों और साक्ष्यों की गहराई से जाँच नहीं की और कई गंभीर पहलुओं को नजरअंदाज कर दिया। इसी वजह से अग्रिम जमानत का आदेश कानूनी दृष्टि से टिक नहीं सकता।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का विशेष उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि ट्विशा शर्मा के शरीर पर फाँसी के निशानों के अलावा भी कई अन्य चोटों के निशान पाए गए थे। मेडिकल रिपोर्ट में यह स्पष्ट संकेत मिला कि ये चोटें केवल शव को नीचे उतारने के दौरान नहीं आई थीं। अदालत ने इसे मामले का अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू मानते हुए कहा कि इस पूरे घटनाक्रम की गहन और निष्पक्ष जाँच बेहद जरूरी है। कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रथम दृष्टया यह मामला केवल आत्महत्या तक सीमित नहीं माना जा सकता और कई ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब अभी जाँच में सामने आने बाकी हैं।
मामले की सुनवाई के दौरान मृतका के परिवार की ओर से यह दलील दी गई कि ट्विशा लगातार मानसिक प्रताड़ना का सामना कर रही थी। परिवार ने आरोप लगाया कि उस पर गर्भपात कराने का दबाव बनाया जा रहा था और इसका उल्लेख व्हाट्सऐप चैट्स में भी मौजूद है। अदालत ने इन चैट्स और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को गंभीरता से लिया। कोर्ट ने कहा कि मृतका अपने परिवार को लगातार मानसिक उत्पीड़न और दहेज प्रताड़ना की जानकारी दे रही थी। परिवार के सदस्यों और अन्य गवाहों के बयान भी इसी दिशा में संकेत देते हैं।
हाईकोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि आरोपी पक्ष ने जाँच में पूरी तरह सहयोग नहीं किया। अदालत के अनुसार जाँच एजेंसियों के साथ अपेक्षित सहयोग न करना और सार्वजनिक मंचों तथा मीडिया के माध्यम से मृतका की छवि खराब करने का प्रयास करना गंभीर चिंता का विषय है। कोर्ट ने कहा कि ऐसा व्यवहार जाँच को प्रभावित करने की कोशिश माना जा सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी संवेदनशील मामले में आरोपियों का आचरण जाँच की निष्पक्षता पर असर डाल सकता है और इस पहलू को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि मामले की जाँच अब केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो को सौंप दी गई है। हाईकोर्ट ने कहा कि जब जाँच सीबीआई के पास चली गई है,तो जाँच एजेंसी को पक्षकार बनाया जाना आवश्यक है,ताकि मामले की निष्पक्ष और प्रभावी जाँच सुनिश्चित की जा सके। अदालत ने माना कि यह मामला केवल एक सामान्य पारिवारिक विवाद का नहीं,बल्कि गंभीर आपराधिक आरोपों से जुड़ा हुआ है,इसलिए हर पहलू की बारीकी से जाँच जरूरी है।
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश पर भी कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि निचली अदालत ने यह मान लिया था कि केवल विवाह के सात साल के भीतर हुई मौत के आधार पर अग्रिम जमानत खारिज नहीं की जा सकती। साथ ही ट्रायल कोर्ट ने यह भी माना था कि आरोपी पक्ष द्वारा ट्विशा के खाते में पैसे भेजे जाते थे और व्हाट्सऐप चैट्स में मुख्य शिकायत पति के खिलाफ दिखाई देती है। इन्हीं तथ्यों के आधार पर अग्रिम जमानत दी गई थी। हालाँकि,हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड और उपलब्ध साक्ष्यों की गहराई से जाँच करने पर तस्वीर कहीं अधिक गंभीर दिखाई देती है।
अदालत ने कहा कि दहेज प्रताड़ना, मानसिक उत्पीड़न और गर्भपात के लिए दबाव बनाने जैसे आरोप अत्यंत गंभीर प्रकृति के हैं। ऐसे मामलों में शुरुआती स्तर पर ही राहत देने से जाँच प्रभावित हो सकती है। कोर्ट ने यह भी माना कि आरोपी प्रभावशाली हैं और उनके द्वारा जाँच को प्रभावित किए जाने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। इसी कारण हिरासत में पूछताछ को आवश्यक माना गया।
अपने अंतिम आदेश में हाईकोर्ट ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्य,मामले की संवेदनशीलता और जाँच की वर्तमान स्थिति को देखते हुए 15 मई 2026 को दिया गया अग्रिम जमानत आदेश न्यायसंगत नहीं था। इसके साथ ही अदालत ने भोपाल के 10वें अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा पारित अग्रिम जमानत आदेश को निरस्त कर दिया। अदालत ने दोनों याचिकाओं को स्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि निष्पक्ष जांच और न्याय के हित में यह फैसला आवश्यक था।
इस फैसले के बाद ट्विशा शर्मा मौत मामला एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि हाईकोर्ट का यह आदेश उन मामलों में महत्वपूर्ण संदेश देता है,जहाँ प्रारंभिक स्तर पर गंभीर आरोपों के बावजूद जल्द राहत दे दी जाती है। अदालत ने अपने आदेश के जरिए यह स्पष्ट किया है कि किसी भी मामले में न्यायिक विवेक का प्रयोग करते समय उपलब्ध साक्ष्यों,जाँच की दिशा और अपराध की गंभीरता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
मामले में अब आगे की जाँच सीबीआई द्वारा की जाएगी और माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में कई नए तथ्य सामने आ सकते हैं। मृतका के परिवार ने हाईकोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए इसे न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है। परिवार का कहना है कि उन्हें शुरू से ही निष्पक्ष जाँच की उम्मीद थी और अब उन्हें भरोसा है कि सच सामने आएगा।
वहीं दूसरी ओर इस फैसले ने न्यायिक प्रक्रिया और अग्रिम जमानत के मामलों में अदालतों की भूमिका को लेकर भी बहस छेड़ दी है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह साफ कर दिया कि अदालतों को ऐसे संवेदनशील मामलों में केवल सतही तथ्यों के आधार पर निर्णय नहीं लेना चाहिए। हर पहलू की गंभीरता से जाँच करना आवश्यक है,ताकि न्याय प्रक्रिया पर जनता का भरोसा बना रहे।
ट्विशा शर्मा की मौत ने समाज में महिलाओं के खिलाफ मानसिक उत्पीड़न,दहेज प्रताड़ना और पारिवारिक दबाव जैसे गंभीर मुद्दों को एक बार फिर सामने ला दिया है। यह मामला केवल एक कानूनी लड़ाई नहीं,बल्कि उन सामाजिक परिस्थितियों का भी प्रतिबिंब बन गया है,जिनमें कई महिलाएँ मानसिक और भावनात्मक दबाव झेलने को मजबूर होती हैं। अब सभी की नजरें सीबीआई जाँच और आने वाली कानूनी कार्रवाई पर टिकी हुई हैं।
