वाशिंगटन,12 जून (युआईटीवी)- अमेरिका और ईरान के बीच कई सप्ताह से जारी तनाव,सैन्य दबाव और कूटनीतिक गतिविधियों के बीच एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि उन्होंने ईरान पर प्रस्तावित अमेरिकी हमलों और बमबारी की योजना को रद्द कर दिया है। ट्रंप के अनुसार,तेहरान के साथ चल रही बातचीत अब ऐसे स्तर पर पहुँच चुकी है,जहाँ ईरान के सर्वोच्च नेतृत्व ने एक संभावित समझौते के ढाँचे को मंजूरी दे दी है। उन्होंने इसे हाल के वर्षों की सबसे महत्वपूर्ण कूटनीतिक उपलब्धियों में से एक बताते हुए कहा कि इस समझौते का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ईरान भविष्य में किसी भी परिस्थिति में परमाणु हथियार हासिल न कर सके।
ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है,जब कुछ ही घंटों पहले उन्होंने ईरान के खिलाफ कड़े सैन्य कदम उठाने की चेतावनी दी थी। उन्होंने संकेत दिया था कि यदि परिस्थितियाँ नहीं बदलीं,तो अमेरिका ईरान के खिलाफ व्यापक सैन्य कार्रवाई कर सकता है,लेकिन अब उनका कहना है कि बातचीत में हुई प्रगति और समझौते की दिशा में मिले सकारात्मक संकेतों को देखते हुए उन्होंने हमले की योजना को रोकने का निर्णय लिया है।
अपने सोशल मीडिया मंच ट्रुथ सोशल पर जारी संदेश में ट्रंप ने कहा कि इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान के साथ बातचीत सर्वोच्च नेतृत्व स्तर तक पहुँच चुकी है और वहाँ से आवश्यक मंजूरी भी मिल चुकी है। उन्होंने कहा कि संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति के रूप में उन्होंने प्रस्तावित हमलों और बमबारी को रद्द करने का फैसला किया है क्योंकि अब कूटनीतिक समाधान की संभावना मजबूत होती दिखाई दे रही है।
ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिका और ईरान के बीच समझौते की प्रक्रिया अब अंतिम चरण में पहुँच गई है। उनके अनुसार अधिकांश महत्वपूर्ण मुद्दों पर सहमति बन चुकी है और केवल औपचारिक दस्तावेज तैयार किए जाने बाकी हैं। उन्होंने कहा कि अगले कुछ दिनों में समझौते को अंतिम रूप दिया जा सकता है और उसके बाद हस्ताक्षर की प्रक्रिया पूरी होगी। हालाँकि,उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि समझौते पर हस्ताक्षर कहाँ और कब होंगे।
अमेरिकी राष्ट्रपति के अनुसार प्रस्तावित समझौते का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर स्थायी नियंत्रण स्थापित करना है। उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था के तहत ईरान कभी भी परमाणु हथियार विकसित नहीं कर सकेगा और न ही उसे किसी अन्य स्रोत से प्राप्त कर पाएगा। ट्रंप ने जोर देकर कहा कि यही वह मूल उद्देश्य था जिसके लिए अमेरिका ने पिछले महीनों में दबाव की नीति अपनाई थी।
उन्होंने कहा कि यदि यह समझौता सफलतापूर्वक लागू हो जाता है,तो मध्य पूर्व क्षेत्र में स्थिरता स्थापित करने की दिशा में एक बड़ा कदम होगा। ट्रंप के अनुसार,अमेरिका का उद्देश्य केवल सैन्य शक्ति का प्रदर्शन करना नहीं था,बल्कि ऐसा समाधान तलाशना था जिससे क्षेत्रीय सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके और परमाणु प्रसार के खतरे को समाप्त किया जा सके।
जब ट्रंप से पूछा गया कि क्या वास्तव में ईरान के सर्वोच्च नेता ने इस व्यवस्था को मंजूरी दे दी है,तो उन्होंने कहा कि उनकी जानकारी के अनुसार इसका उत्तर हाँ है। उन्होंने दावा किया कि बातचीत के अंतिम बिंदुओं को सिद्धांत और व्यावहारिक दोनों स्तरों पर स्वीकार कर लिया गया है। ट्रंप ने यह भी कहा कि इस प्रक्रिया में केवल अमेरिका और ईरान ही नहीं, बल्कि मध्य पूर्व और उसके आसपास के कई प्रमुख देश भी शामिल रहे हैं।
उनके अनुसार इजरायल,सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात,कतर,तुर्किये,पाकिस्तान, बहरीन,कुवैत,जॉर्डन और मिस्र सहित कई देशों ने बातचीत की प्रक्रिया में भूमिका निभाई है। हालाँकि,ट्रंप ने यह नहीं बताया कि इन देशों की भागीदारी किस रूप में रही और समझौते की शर्तें क्या हैं। उन्होंने केवल इतना कहा कि सभी संबंधित पक्ष इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए तैयार दिखाई दे रहे हैं।
हालाँकि,ट्रंप ने हमलों को रद्द करने की घोषणा की है,लेकिन उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि अमेरिका अपनी समुद्री रणनीति में तत्काल कोई बदलाव नहीं करेगा। राष्ट्रपति ने कहा कि जब तक समझौते पर अंतिम हस्ताक्षर नहीं हो जाते और उसकी शर्तों का औपचारिक क्रियान्वयन शुरू नहीं हो जाता,तब तक ईरान के खिलाफ नौसैनिक नाकेबंदी जारी रहेगी।
उन्होंने कहा कि अमेरिका इस समय दबाव की नीति को पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकता क्योंकि समझौते की प्रक्रिया अभी औपचारिक रूप से पूरी नहीं हुई है। ट्रंप के अनुसार समुद्री नाकेबंदी समझौते के सफल निष्पादन तक लागू रहेगी और इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बातचीत के दौरान किसी प्रकार की अप्रत्याशित स्थिति उत्पन्न न हो।
ट्रंप ने अपने बयान में यह भी दावा किया कि हाल के सैन्य दबाव और संघर्ष के कारण ईरान बातचीत की मेज पर आने के लिए मजबूर हुआ। उनका कहना था कि अमेरिकी कार्रवाई और क्षेत्रीय दबाव ने तेहरान को यह समझा दिया कि टकराव का रास्ता उसके लिए लाभदायक नहीं होगा। उन्होंने कहा कि ईरान ने काफी नुकसान झेला है और अब वह समझौते के महत्व को समझ रहा है।
अमेरिकी राष्ट्रपति ने दावा किया कि हालिया संघर्ष के दौरान ईरान की सैन्य क्षमताओं को गंभीर क्षति पहुँची है। उन्होंने कहा कि ईरान की नौसेना, वायुसेना और वायु रक्षा प्रणाली को भारी नुकसान हुआ है। ट्रंप ने यह भी कहा कि इन परिस्थितियों ने ईरान को एक व्यावहारिक समाधान की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया।
हालाँकि,ट्रंप के इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और ईरान की ओर से भी तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। ऐसे में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की नजरें अब तेहरान की प्रतिक्रिया पर टिकी हुई हैं। यदि ईरान वास्तव में समझौते के ढाँचे को स्वीकार कर चुका है,तो यह कई वर्षों से जारी परमाणु विवाद को समाप्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति मानी जाएगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह समझौता अस्तित्व में आता है तो इसका प्रभाव केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहेगा। इसका असर पूरे मध्य पूर्व की सुरक्षा व्यवस्था, ऊर्जा बाजारों और अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति पर पड़ सकता है। पिछले कई वर्षों से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर वैश्विक स्तर पर चिंता बनी हुई थी और इसी कारण विभिन्न देशों ने समय-समय पर प्रतिबंधों तथा कूटनीतिक दबाव का सहारा लिया था।
विश्लेषकों का कहना है कि किसी भी संभावित समझौते की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि उसके तहत निगरानी और सत्यापन की व्यवस्था कितनी मजबूत होती है। केवल राजनीतिक सहमति पर्याप्त नहीं होगी,बल्कि यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक होगा कि समझौते की शर्तों का पालन लंबे समय तक किया जाए।
ट्रंप ने अपने पूरे बयान में बार-बार इस बात को दोहराया कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना ही अमेरिका की प्राथमिकता रही है। उन्होंने कहा कि यह समझौता इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके माध्यम से दुनिया को यह भरोसा मिलेगा कि ईरान परमाणु हथियारों की दिशा में आगे नहीं बढ़ेगा।
उन्होंने कहा कि ईरान किसी भी रूप में परमाणु हथियार नहीं रखेगा,न उनका निर्माण करेगा और न ही उन्हें प्राप्त करेगा। ट्रंप के अनुसार यह एक ऐतिहासिक उपलब्धि होगी,क्योंकि इससे क्षेत्रीय संघर्ष की आशंकाएँ कम होंगी और अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूती मिलेगी।
फिलहाल दुनिया की निगाहें उन आगामी दिनों पर टिकी हैं,जब इस संभावित समझौते को अंतिम रूप दिए जाने की प्रक्रिया पूरी हो सकती है। यदि ट्रंप के दावे सही साबित होते हैं और समझौते पर हस्ताक्षर हो जाते हैं, तो यह अमेरिका-ईरान संबंधों के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाएगा। वहीं यदि बातचीत किसी कारणवश विफल होती है,तो क्षेत्र में तनाव एक बार फिर बढ़ सकता है। ऐसे में आने वाले दिन मध्य पूर्व की राजनीति और वैश्विक कूटनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।
