मध्यप्रदेश सरकार के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय (तस्वीर क्रेडिट@bablusharmabjp)

भाजपा मंत्री विजयवर्गीय ने महिलाओं के ‘छोटे कपड़े’ पहनने के चलन पर जताई असहमति,महिलाओं के पहनावे पर की टिप्पणी

इंदौर,6 जून (युआईटीवी)- विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम में मध्यप्रदेश सरकार के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने महिलाओं के पहनावे को लेकर एक विवादित बयान दे दिया,जिसने सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक तीखी प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न कर दी हैं। उनका कहना था कि छोटे कपड़े पहनकर आने वाली लड़कियों को वे सेल्फी नहीं देते और उनसे कहते हैं कि “अच्छे कपड़े पहन कर आओ।” इस बयान को लेकर व्यापक आलोचना हो रही है और इसे महिलाओं की स्वतंत्रता पर हमला माना जा रहा है।

इंदौर के नेहरू पार्क स्थित सिंदूर वाटिका में 5 जून को एक पौधारोपण कार्यक्रम के दौरान कैलाश विजयवर्गीय ने अपने भाषण में कहा, “विदेशों में कम कपड़े पहनने वाली लड़कियों को सुंदर माना जाता है,लेकिन भारत में महिलाएँ देवी का स्वरूप मानी जाती हैं। उन्हें अच्छे कपड़े,अच्छे गहने और सुंदर श्रृंगार करना चाहिए। कई बार जब छोटे कपड़े पहनकर लड़कियाँ मेरे पास सेल्फी लेने आती हैं,तो मैं मना कर देता हूँ और कहता हूँ कि अच्छे कपड़े पहनकर आओ।”

इस बयान की वीडियो क्लिप सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गई,जिसके बाद यह मुद्दा बहस का विषय बन गया। बयान के सामने आते ही राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्रों से तीखी प्रतिक्रियाएँ आने लगीं। सबसे मुखर प्रतिक्रिया कांग्रेस की मीडिया कोऑर्डिनेटर रश्मि की रही,जिन्होंने एक्स (पूर्व ट्विटर) पर कहा, “कैलाश विजयवर्गीय का यह बयान महिलाओं की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पसंद पर अंकुश लगाने वाला है। यह सोच रूढ़िवादी और पितृसत्तात्मक मानसिकता को दर्शाती है,जो आधुनिक समाज में महिलाओं की आज़ादी और समानता के मूल्यों के खिलाफ है।”

रश्मि के इस बयान के बाद कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों ने भी इस मुद्दे पर सवाल उठाए,जिनमें यह बातें प्रमुख थीं:

क्या एक मंत्री को महिलाओं के कपड़ों पर टिप्पणी करने का अधिकार है?

क्या सार्वजनिक पदों पर बैठे लोग इस तरह की हिदायतें दे सकते हैं?

यह बयान महिलाओं की ‘बॉडी ऑटोनॉमी’ यानी स्वयं पर अधिकार के खिलाफ नहीं है?

यह विवाद एक बार फिर भारत में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सांस्कृतिक मूल्यों के बीच संतुलन को लेकर चर्चा को जन्म देता है। एक ओर भारत में पारंपरिक सोच में महिलाओं को मर्यादा और संस्कारों का प्रतीक माना गया है,वहीं दूसरी ओर आज का युवा वर्ग स्वतंत्रता,आत्मनिर्भरता और व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति को प्राथमिकता देता है।

कई लोग यह तर्क दे रहे हैं कि अगर कोई महिला छोटे कपड़े पहनती है,तो यह उसका व्यक्तिगत चयन है। एक जनप्रतिनिधि द्वारा सार्वजनिक रूप से इस पर टिप्पणी करना न केवल असंवेदनशील है,बल्कि यह समाज में महिलाओं की भूमिका को सीमित करने का प्रयास भी है।

कैलाश विजयवर्गीय ने यह भी कहा कि वे ऐसे कपड़े पहनने वाली लड़कियों को सेल्फी देने से मना कर देते हैं। यह कथन यह दर्शाता है कि वे सार्वजनिक पद का इस्तेमाल कर महिलाओं के पहनावे पर अप्रत्यक्ष दबाव बना रहे हैं। यह पावर डायनामिक्स (अधिकार की स्थिति से प्रभावित मानसिकता) का उदाहरण है,जहाँ कोई व्यक्ति अपनी निजी पसंद को दूसरों पर थोपने की स्थिति में है।

इस बयान के वायरल होते ही सोशल मीडिया पर हैशटैग जैसे #माय क्लॉथ माय चॉइस और #वीमेन आर नॉट ऑब्जेक्ट्स ट्रेंड करने लगे। ट्विटर,इंस्टाग्राम और फेसबुक पर लोगों ने कैलाश विजयवर्गीय के बयान की आलोचना करते हुए उनके इस्तीफे तक की माँग कर डाली। साथ ही,कई महिलाओं ने अपने कपड़ों की तस्वीरें साझा कर यह संदेश देने की कोशिश की कि पहनावा किसी भी व्यक्ति की योग्यता या नैतिकता का पैमाना नहीं हो सकता।

कैलाश विजयवर्गीय का बयान एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या आज भी भारत जैसे लोकतांत्रिक और संवैधानिक देश में महिलाओं को पूरी स्वतंत्रता प्राप्त है? एक मंत्री द्वारा सार्वजनिक रूप से महिलाओं के पहनावे पर टिप्पणी करना न केवल संविधान के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है,बल्कि यह लैंगिक समानता की दिशा में हो रही प्रगति पर भी चोट है।

भारत में महिलाओं के पास अपनी पसंद से पहनने,बोलने और व्यवहार करने का अधिकार है। ऐसे बयानों के ज़रिये यदि समाज में एक डर का माहौल बनाया जाता है, तो यह लोकतंत्र की आत्मा के विरुद्ध है। आवश्यक है कि सार्वजनिक पदों पर आसीन लोग संवेदनशीलता,समावेशिता और संविधानिक मूल्यों के अनुरूप आचरण करें,ताकि समाज सभी के लिए समान और सुरक्षित बन सके।