दिल्ली पुलिस में बगावत के बाद एसीपी मनस्वी वशिष्ठ सस्पेंड (तस्वीर क्रेडिट@MohazzibPathan)

दिल्ली पुलिस में बगावत के बाद एसीपी मनस्वी वशिष्ठ सस्पेंड,मुख्यालय के बाहर 150 पुलिसकर्मियों के प्रदर्शन से मचा हड़कंप

नई दिल्ली,3 नवंबर (युआईटीवी)- दिल्ली पुलिस में अपने ही विभाग के फैसले के खिलाफ आवाज उठाना एक सहायक पुलिस आयुक्त (एसीपी) को भारी पड़ गया है। पुलिस मुख्यालय के बाहर हुए विरोध प्रदर्शन के बाद एसीपी मनस्वी वशिष्ठ को निलंबित कर दिया गया है। इस प्रदर्शन में महिला अधिकारियों समेत करीब 150 पुलिसकर्मी शामिल हुए थे। सभी की प्रमुख मांग थी कि शाहदरा में पुलिसकर्मियों और वकीलों के बीच हुए विवाद के बाद जिन दो अधिकारियों का तबादला किया गया है,उन्हें उनकी पुरानी तैनाती पर वापस भेजा जाए। इस घटना ने दिल्ली पुलिस के भीतर चल रही नाराजगी को सार्वजनिक कर दिया है। अब एसीपी के निलंबन के बाद विभाग की कार्रवाई और पुलिसकर्मियों के विरोध को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं।

सूत्रों के मुताबिक, सोमवार को पुलिस मुख्यालय के बाहर हुए प्रदर्शन के बाद मनस्वी वशिष्ठ के खिलाफ निलंबन की कार्रवाई की गई। प्रदर्शन में शामिल पुलिसकर्मी विभाग के उस फैसले से नाराज थे,जिसके तहत शाहदरा विवाद के बाद एसीपी मनस्वी वशिष्ठ और थाना प्रभारी (एसएचओ) अरुण कुमार का तबादला कर दिया गया था। दोनों अधिकारियों को निष्क्रिय इकाइयों में भेजे जाने की बात सामने आई थी। पुलिसकर्मियों का मानना था कि इस फैसले से अधिकारियों के सम्मान और विभाग के भीतर उनके मनोबल पर असर पड़ा है। इसी नाराजगी के चलते बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी एकजुट होकर मुख्यालय पहुँच गए।

दरअसल,शाहदरा पुलिस स्टेशन में पुलिसकर्मियों और वकीलों के बीच झड़प हुई थी। इस घटना के बाद पुलिस विभाग ने मामले को देखते हुए वरिष्ठ अधिकारी एसीपी मनस्वी वशिष्ठ और इंस्पेक्टर अरुण कुमार का तबादला कर दिया था। विभाग के इस निर्णय से पुलिसकर्मियों के एक वर्ग में असंतोष पैदा हो गया। उनका कहना था कि विवाद के बाद अधिकारियों के खिलाफ की गई तबादले की कार्रवाई उचित नहीं है और दोनों को उनकी पहले वाली जिम्मेदारी पर बहाल किया जाना चाहिए। इसी माँग को लेकर सोमवार सुबह करीब नौ बजे पुलिसकर्मी दिल्ली पुलिस मुख्यालय के बाहर जुटने लगे।

प्रदर्शन की खास बात यह रही कि इसमें केवल एक स्तर के पुलिसकर्मी शामिल नहीं थे, बल्कि अलग-अलग पदों पर तैनात जवान और अधिकारी भी मौजूद थे। महिला पुलिसकर्मियों ने भी इस विरोध में हिस्सा लिया। कुछ पुलिसकर्मी वर्दी में पहुँचे,जबकि कई सादे कपड़ों में मुख्यालय के बाहर जमा हुए। शुरुआत में प्रदर्शन में शामिल लोगों की संख्या सीमित थी,लेकिन जैसे-जैसे विरोध की खबर दूसरे पुलिसकर्मियों तक पहुँची,वहाँ भीड़ बढ़ती चली गई। कुछ ही समय में मुख्यालय के बाहर बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी एकत्र हो गए। प्रदर्शनकारियों की संख्या करीब 150 बताई गई।

इस पूरे घटनाक्रम में एसीपी मनस्वी वशिष्ठ की भूमिका भी चर्चा का विषय बनी। बताया जा रहा है कि उन्होंने प्रदर्शन में शामिल पुलिसकर्मियों का नेतृत्व किया और अपने संबोधन के जरिए उन्हें एकजुट रहने का संदेश दिया। उन्होंने पुलिसकर्मियों के सम्मान और आपसी एकता की बात उठाई। उनके भाषण के बाद प्रदर्शन में शामिल होने वाले जवानों की संख्या बढ़ती गई। पुलिसकर्मियों की एकजुटता देखकर यह प्रदर्शन केवल दो अधिकारियों के तबादले का विरोध नहीं रह गया,बल्कि विभाग के भीतर सम्मान और फैसलों को लेकर असंतोष का सार्वजनिक प्रदर्शन बन गया।

प्रदर्शनकारियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए पुलिस मुख्यालय की सुरक्षा व्यवस्था भी कड़ी करनी पड़ी। हालात को नियंत्रित रखने के लिए अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती की गई और अर्धसैनिक बलों को भी बुलाया गया। मुख्यालय के बाहर पुलिसकर्मियों की मौजूदगी और उनके विरोध के कारण प्रशासनिक स्तर पर हलचल तेज हो गई। विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के लिए भी यह स्थिति असामान्य थी,क्योंकि विरोध करने वाले लोग किसी बाहरी संगठन के सदस्य नहीं,बल्कि दिल्ली पुलिस के अपने ही कर्मचारी और अधिकारी थे।

दोपहर करीब एक बजे वरिष्ठ अधिकारी एसीपी मनस्वी वशिष्ठ को पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार से बातचीत के लिए मुख्यालय के भीतर ले जाने लगे। इस दौरान उनके पीछे बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी पुलिसकर्मी भी मुख्यालय में दाखिल हो गए। इसके बाद पुलिस आयुक्त,विशेष आयुक्त और संयुक्त आयुक्त स्तर के अधिकारियों की मौजूदगी में संपर्क सभा आयोजित की गई। यह बैठक करीब 45 मिनट तक चली। इसमें मनस्वी वशिष्ठ ने पुलिसकर्मियों की ओर से विभाग के सामने दस से अधिक मांगें रखीं। अधिकारियों के साथ हुई इस बातचीत में प्रदर्शनकारियों ने अपनी नाराजगी और अपेक्षाओं को स्पष्ट रूप से सामने रखा।

मनस्वी वशिष्ठ की ओर से रखी गई मांगों में सबसे प्रमुख मुद्दा शाहदरा विवाद से जुड़े मामलों का था। प्रदर्शनकारियों की माँग थी कि वकीलों के खिलाफ दर्ज मामलों को रद्द नहीं किया जाना चाहिए। इसके अलावा एफआईआर से बार काउंसिल के सदस्य का नाम हटाने का भी विरोध किया गया। उनका कहना था कि मामले में जो भी कानूनी प्रक्रिया चल रही है, उसे बिना किसी दबाव के आगे बढ़ाया जाना चाहिए। पुलिसकर्मियों की माँग थी कि विवाद से जुड़े मामलों में निष्पक्षता बरती जाए और पहले दर्ज की गई शिकायतों तथा मुकदमों पर उचित कार्रवाई जारी रहे।

प्रदर्शन में शामिल पुलिसकर्मियों की एक अन्य महत्वपूर्ण माँग यह थी कि विरोध में हिस्सा लेने वाले किसी भी जवान या अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक अथवा कानूनी कार्रवाई नहीं की जाए। मनस्वी वशिष्ठ ने कथित तौर पर अधिकारियों के सामने यह भी कहा कि यदि विभाग को प्रदर्शन के कारण किसी तरह की सख्त कार्रवाई करनी है, तो वह केवल उनके खिलाफ की जाए। किसी अन्य पुलिसकर्मी को निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए। इस माँग के जरिए उन्होंने प्रदर्शन में शामिल जवानों को कार्रवाई से बचाने की बात रखी थी। हालाँकि,इसके बावजूद बाद में उन्हीं के खिलाफ निलंबन की कार्रवाई किए जाने से मामला और चर्चा में आ गया।

दिल्ली पुलिस के इतिहास में इस तरह का विरोध प्रदर्शन एक असामान्य घटनाक्रम माना जा रहा है। बताया जा रहा है कि तीस हजारी कोर्ट विवाद के करीब सात साल बाद यह दूसरा मौका है,जब दिल्ली पुलिस के जवानों ने अपने ही विभाग के फैसले के खिलाफ इस तरह एकजुट होकर सार्वजनिक विरोध जताया। इस तुलना के कारण भी सोमवार का घटनाक्रम चर्चा में रहा। पुलिसकर्मियों का मुख्यालय के बाहर जमा होना और वरिष्ठ अधिकारियों के सामने अपनी मांगें रखना विभाग के भीतर असंतोष की गंभीरता को दर्शाता है।

शाहदरा विवाद के बाद हुए तबादलों से शुरू हुई नाराजगी अब एसीपी के निलंबन तक पहुँच गई है। एक ओर पुलिसकर्मी अपने अधिकारियों की पुरानी तैनाती बहाल करने की माँग कर रहे थे,वहीं दूसरी ओर विभाग ने प्रदर्शन के बाद मनस्वी वशिष्ठ के खिलाफ कार्रवाई की। इस फैसले से यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या विभाग प्रदर्शन का नेतृत्व करने को अनुशासनहीनता मान रहा है या इसके पीछे कोई अन्य प्रशासनिक कारण है। फिलहाल, उपलब्ध जानकारी में निलंबन की कार्रवाई को सोमवार के विरोध प्रदर्शन के बाद उठाया गया कदम बताया गया है।

इस पूरे मामले ने दिल्ली पुलिस के भीतर अधिकारियों और जवानों के बीच समन्वय, विभागीय फैसलों और पुलिसकर्मियों के सम्मान से जुड़े मुद्दों को फिर चर्चा में ला दिया है। प्रदर्शनकारियों की मांगें केवल दो अधिकारियों के तबादले तक सीमित नहीं थीं,बल्कि उन्होंने कानूनी मामलों में निष्पक्षता और विरोध में शामिल पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं किए जाने की बात भी उठाई थी। अब मनस्वी वशिष्ठ के निलंबन के बाद आगे विभाग क्या कदम उठाता है और शाहदरा विवाद से जुड़े तबादलों पर कोई पुनर्विचार होता है या नहीं, इस पर सबकी नजर रहेगी। फिलहाल,दिल्ली पुलिस मुख्यालय के बाहर हुआ यह प्रदर्शन विभाग के भीतर असंतोष का एक बड़ा घटनाक्रम बन गया है।