नई दिल्ली,7 अक्टूबर (युआईटीवी)- इजरायल पर 7 अक्टूबर, 2023 को हुए हुए कायरतापूर्ण हमले की दूसरी बरसी पर मिस्र में दोनों पक्षों के बीच हुई वार्ता ने एक बार फिर से मध्य-पूर्व की नाजुक स्थिति को उभारा है। दो साल से जारी इस सशक्त संघर्ष को रोकने और मानवीय राहत सुनिश्चित करने के मकसद से मिस्र ने दोनों पक्षों के प्रतिनिधि आमंत्रित कर के बातचीत का एक नया दौर शुरू कराया। परंतु घटनाक्रम ने स्पष्ट कर दिया कि मुद्दे सिर्फ शत्रुता रोके जाने तक सीमित नहीं हैं; सीमा-परिसरों,वायु गतिविधियों और बंधकों के पुनर्वतन जैसे संवेदनशील मामलों पर गहरा अविश्वास और जटिल माँगें बनी हुई हैं।
मिस्र की मध्यस्थता में हुई बैठकों में हमास ने स्पष्ट शर्तें रखीं। उसके प्रमुख आग्रहों में गाजा के आबादी वाले क्षेत्रों में इजरायली सैनिकों की मौजूदा उपस्थिति को हटाकर उन्हें अपने पुराने ठिकानों पर लौटाने की माँग शामिल है। यह माँग जनवरी में हुए पूर्ववर्ती सीजफायर समझौते के अनुरूप लौटने की शर्त के रूप में रखी गई है। दूसरी अहम माँग वायु-क्षेत्र और ड्रोन ऑपरेशनों को लेकर है। हमास ने प्रतिदिन कम-से-कम दस घंटे तक लड़ाकू विमानों और ड्रोन की उड़ानों पर रोक लगाने की माँग रखी और साथ ही बंधकों की रिहाई वाले दिनों में कम-से-कम बारह घंटे तक किसी भी प्रकार की हवाई गतिविधि न होने का अनुरोध किया। इन शर्तों का जिक्र इस इरादे से है कि बंधकों और नागरिकों की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के साथ-साथ रिहाई प्रक्रिया के समय किसी भी तरह की अनियंत्रित हिंसा की आशंका को घटाया जाए।
दूसरी ओर इजरायल की प्रतिक्रिया में भी कूटनीतिक असंतोष और वैश्विक भूमिकाओं को लेकर तीखी टिप्पणियाँ शामिल रहीं। इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने वार्ता के क्रम में यूरोपीय संघ की भूमिका पर कटाक्ष करते हुए कहा कि यूरोप इस प्रक्रिया में “रूढ़” और “अनुपस्थित” नजर आ रहा है। नेतन्याहू का आरोप था कि कुछ यूरोपीय राष्ट्रों ने फिलिस्तीनी राज्य को मान्यता दे कर अपनी प्राथमिकता और सुरक्षा हितों को समझने में विफलता दिखाई है,जिससे यूरोप अपर्याप्त और अप्रासंगिक बन गया है। उनके शब्दों में,जो काम यूरोपीय संघ को करना चाहिए था,वह कुछ हद तक अन्य वैश्विक खिलाड़ियों द्वारा किया जा रहा है।
नेतन्याहू ने यूरोपीय निर्णयों की तुलना एक विवादास्पद तर्ज पर की और कहा कि यदि 9/11 जैसे कुख्यात आतंकवादी घटनाओं के बाद बिन लादेन और अल-कायदा को राज्य दे देना सुझाया गया होता,तो कौन स्वीकार करता? उनके इस तर्क का उद्देश्य यह दर्शाना था कि कुछ अंतर्राष्ट्रीय निर्णय सुरक्षा-व्यवस्थाओं और संतुलन के नजरिए से खतरनाक परिणाम दे सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि पहले ताकत सुनिश्चित करनी होगी और फिर शांति की बात की जा सकती है। उनका मानना है कि सैन्य और सुरक्षा क्षमताओं में कटौती से राष्ट्रीय अस्तित्व पर सवाल उठ सकते हैं।
इन टिप्पणियों ने यूरोप और दूसरे अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ियों की भूमिका को फिर से बहस के केंद्र में ला दिया। जबकि कुछ वैश्विक साझेदार मानवीय राहत और राजनीतिक समाधान के लिए जोर दे रहे हैं, इजरायली नेतृत्व कड़ा रुख और सुरक्षा-तर्क पर लगातार बल दे रहा है। दोनों ही दृष्टिकोणों के बीच परस्पर अविश्वास वार्ता को आगे बढ़ने से रोकने वाली बड़ी बाधा बना हुआ है।
मिस्र में हो रही परोक्ष या मध्यस्थता वाली बैठकों में तकनीकी मसलों के साथ-साथ रिहाई की क्रमिक प्रक्रिया,अंतर्राष्ट्रीय निगरानी और मानवीय सहायता के वितरण के तरीक़े पर भी चर्चा हो रही है। परन्तु मैदान पर जारी हिंसा और समय-समय पर होने वाली हवाई और ज़मीन कार्रवाईयों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि केवल कूटनीति ही काफ़ी नहीं है,बल्कि सुरक्षा गारंटी और पारदर्शी निगरानी तंत्र भी अनिवार्य होंगे,ताकि समझौते का क्रियान्वयन भरोसेमंद बने।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस दौर की बातचीत अगर सार्थक होनी है,तो दोनों पक्षों को यथार्थपरक और परस्पर स्वीकार्य मॉडलों पर सहमति बनानी होगी। हमास की सुरक्षा-सम्बन्धी माँगें और इजरायली चिंताएँ दोनों ही संवेदनशील हैं। इसलिए कोई भी समाधान तभी टिकेगा,जब उसे लागू करने के तंत्र मजबूत और स्वतंत्र निगरानी के अधीन हों।
दो साल के इस विनाशकारी दौर ने भारी मानवीय संकट को जन्म दिया है,असीमित विनाश, जनजीवन के ठहराव और बंधकों व परिवारों पर अनिश्चितता की स्थिति। मिस्र में चल रही वार्ता इस संकट को अंतत: कम करने का एक मौका पेश करती है,पर सफलता तभी सम्भव है,जब कट्टर राजनीतिक भाषणों के बजाय व्यवहारिक समझौते और भरोसेमंद अंतर्राष्ट्रीय तंत्रों पर बल दिया जाए। वरना यह दौर भी एक अस्थायी अंतराल बनकर रह जाएगा और वास्तविक शांति की राह फिर टाल दी जाएगी।
